रविवार, 28 फ़रवरी 2010

होली की यादें- साहित्यकारों के बिखरे रंग -पुष्पा भारती

         (पुष्पा भारती)                


होली का नाम सुनते ही यादों के घोर धुर बचपन के दिनों से जा जुड़ते हैं। '7-8 साल' की रही होऊँगी यानि 'सन 1942-43' के समय मेरे माता-पिता लखनऊ में रहते थे। वहाँ की गंगा-जमुना की तहज़ीब के बीच पल रहे थे हम। पड़ोस में एक मुस्लिम परिवार रहता था। खाँ साहब हमारे ताऊजी थे और उनकी बेगम हमारी ताई। ईद पर उनके घर में सुबह-सुबह सेंवइयाँ लातीं और शाम को सजधज कर अपनी ईदी वसूलने जाते हम। होली के दिन सबसे पहली पिचकारी खाँ ताऊ को भिगोती। असमत और इस्तम आपा हमारे घर में भागतीं और हम उनके गालों पर गुलाल मले बिना उनका पीछा न छोड़ते। शाम को जब हम होली मिलने जाते तो वे सब हमारी लाई गुझियों-पपड़ियों को खूब स्वाद ले-लेकर खाते। बड़ी-ताई कपड़े की गुड़िया बहुत अच्छी बनाती थीं। हर होली पर एक गुड़िया हमें ज़रूर मिलती फिर हम अपनी गुल्लक तोड़ते और पैसे लेकर बाज़ार भागते। गुड़िया के लिए तरह-तरह के ज़ेवर लाते। लहंगा-ओढ़ानी और चुन्नी पहनाते हाय! कैसे सुहाने थे वे दिन।

मेरे पिताजी मुहल्ले भर के बच्चों को शाम को मुफ़्त पढ़ाया करते थे। तो तमाम कृतहा माता-पिता व मोहल्ले के तमाम लोग हमारे दालन में जमा होते। पिताजी सिर से पाँव तक गुलाल में डूब जाते।

ये लीजिए, एक और याद इस समय अपना सिर उचका रही है। वह ये कि घर में मैं और मेरा छोटा भाई (अब प्रख्यात विश्व ब्रह्मचारी) ही सबसे चंचल और शरारती थे। हमें ये ज़िम्मा दिया जाता था कि होली के '3-4 दिन' पहले से मोहल्ले भर का चक्कर लगाकर गाय का गोबर इकठ्ठा करके लाओ। गोबर इकठ्ठा करके हम तीनों बहनें उसके बहुत छोटे-छोटे उपले जैसे बनाकर उनमें बीच में ऊँगली में छेद करके सूखने रख देते थे। अपने पाँचों भाइयों का नाम ले-लेकर उनके लिए उस गोबर से ढाल और तलवार की शक्ल के उपले बनते थे और उन सबके बीच में छेद करके सूखने को रख देते थे। सूखने पर उन छेदों में सुल्ली पिरोकर मालाएँ बनाई जाती थी। फिर रंग-गुलाल खेलेनेवाली होली की पहली रात में आकार देखकर पहले सबसे बड़ी माला उसके ऊपर उससे छोटी फिर उससे छोटी लगाते-लगाते पिरामिड की शक्ल जैसी होली तैयार की जाती थी। रात को शुभ मुहुर्त में पिताजी और अम्मा उसे जलाते। हम सब बच्चे उस अग्नि में गन्ना और हरे चने के होरहे के गुच्छे भूनते। और होली की प्रदक्षिणा करते। बड़ा इंतज़ार रहता कि पिछले हफ्ते भर में पकवान बना-बनाकर अम्मा कलसों में छिपाकर रख रही थीं उसमें से आज प्रसादस्वरूप कुछ खाने को मिलेगा।

तब घर-घर में होली जला करती थी, पकवान बनते थे रंग की होली खेली जाती थी और शाम को घर-घर जाकर होली मिली जाती थी। सालभर की दुश्मनियाँ होली में जला दी जाती थीं। मन के मैल रंग से धो दिए जाते थे और खुले-खुले धुले-धुले मन से जीवन में फिर प्रेम-प्यार का वातावरण बना लिया जाता था। अब न वे परंपराएँ रहीं न वह मेल मुहब्बत। न त्योहारों के सही अर्थ और स्वरूप।

पर धर्मवीर भारती जी थे, ज़माने की दौड़ में सबसे आगे दौड़नेवालों में शुमार होते हुए भी अपनी संस्कृति, अपनी तहज़ीब और परंपराओं के हमेशा कायम रहे थे। '1960' में जब यहाँ मुंबई आए तो देखा कहीं पर आज तक छोटे बच्चे आपस में पानी के गुब्बारे मारकर एक-दूसरे को भिगो रहे होते और पीछे-पीछे भागकर मुँह पर गुलाल मल देते। ईं-ईं, ऊं-ऊं और हो-हो की हीं-हीं आवाज़ें और बस हो गई होली। तमामो-तमाम लोग झकाझक सफेद और कड़क इस्त्री किए कपड़े पहले एकदम पाक-साफ़ कपड़े पहनकर आते जाते रहते। मजाल है कि रंग का एक छींटा भी कहीं से पड़ जाए। यह सब देखकर भारती जी जब उदास हुए तो पता चला कि अरे! यहाँ तो सारे भइया लोग (जी हाँ, बंबई में उत्तर भारतीयों को भइया लोग ही कहा जाता हैं) जुहू के समुद्र तट पर इकठ्ठे होकर होली खेलते हैं। वहाँ जाकर देखिए होली की धूम। सो अगले बरस वहाँ जाकर भी देखा। रंग गुलाल की नज़ाकत कम और भांग यहाँ तक कि शराब के नशे से सराबोर हुड़दंग भरी बंबईया होली। मायूस होकर घर वापस आकर निश्चय किया कि अपनी परंपराओं और त्योहारों से कटकर तो नहीं ही जिएँगे। अब एक साल नई शुरुआत करेंगे यहाँ। सो अगले बरस पूरी तैयारी से लखनऊ-इलाहाबाद से टेसू के फूल मँगाए गए और रातभर गरम पानी में भिगोकर उनका महकदार रंग बनाया गया। हरा, नीला, पीला, लाल थाल भर-भर इकठ्ठा किया। खार के बनारसी हलवाई जी मोतीलाल मिश्र से कहकर होली के ख़ास पकवान बनाए गए। मिश्र जी स्वयं भी कवि हैं तो भारती जी के इस प्रस्ताव पूरी हौंस के साथ तैयारी में लग गए। बंबई में खुली जगह भला कहाँ नसीब। मगर सौभाग्य से तब हम नितामहल नामकी एक बड़ी बिल्डिंग के टेरेस फ्लैट में रहते थे, सो सारे दोस्तों के साथ खुली छत पर जी भरकर होली खेली।

पुराने दिन बहुरे, हर बरस मित्रों की संख्या में इज़ाफ़ा होता गया। बड़े चर्चे होने लगे थे इन होलियों के। बोरीवली और कुलाबा जैसी दूर-दूर जगहों से मित्र हमारे घर होली खेलो आते। और फिर जब कमलेश्वर जी भी मुंबई आ गए थे तो उनके घर के बाथरुम में बाथ टब में जब देवर लोग एक-एक करके हम भाभियों को डुबोते और भतीजे-भतीजियाँ मामाओं की दुर्गति होते देखकर सहमे से हो जाते तो गायत्री जी चाकलेटों की घूस देकर उनकी मासूम हँसी वापस दिलातीं।

होली की बहार जीवन में वापस आ गई थी कि '1970' में हम बांद्रा में रहने आ गए थे। बड़ी खूबसूरत हरियाली से चारों ओर से घिरी साहित्य-सहवास नामक यह कॉलॉनी हर तरह से भारती जी के मन को भा गई। पर यहाँ का भी वही हाल कि दीवाली पर तो खूब बम-पटाखे फूटते। सब घरों की बाल्कनियाँ झिलमिल रोशनी से जगमग रहती और होली पर वहीं साँय-साँय सूमसाम। तो हमने अपने बच्चों के दोस्तों को होली की अहमियत समझाई और एक टोली तैयार की जिसमें गणेश-चतुर्थी की परंपरानुसार अपनी कॉलॉनी के घर-घर जाकर वर्गणी इकठ्ठा की प्रसिद्ध मराठी कवयित्री शांता शेळके की देख-रेख में प्रभुणे जी को साथ लेकर होली जलाने के लिए लकड़ी ख़रीदी गई। प्रसाद के लिए नारियल और पेड़े लाए गए। कॉलॉनी के बीच में बच्चों के खेलने के लिए एक छोटा-सा मैदान है वहाँ होली जलाई गई। पहले बरस तो लोग अपनी-अपनी बालकनियों से झाँकते रहे। सिर्फ़ बच्चे ही मज़ा लेते रहे। अगले बरसों में धीरे-धीरे कई घरों से बड़े लोग भी जुटने लगे। तो जब भारती जी ने पाया कि माहौल बनने लगा है तो सोचा अब होली खेलने की भी परंपरा शुरू कर देनी चाहिए और एक नया तरीक़ा सोचा।

प्रसिद्ध नर्तक गोपीकृष्ण की शिष्या और खुद एक नामचीन लेखिका नीरुपमा सेवती जी जगुभाई के साथ नाच-गाने का माहौल बनाया गया। एक बड़ा-सा कंडाल लाकर उसमें रंग भरकर गाड़ी के गैरेज में रखा गया। दर्जनों पिचकारियाँ लाई गईं। वहीं भर-भर थाल गुलाल लाया। खूब-खूब सारी मिठाई, नमकीन और ठंड़ाई जब आलम यह कि प्रसिद्ध डोगरी कवयित्री पद्मा सचदेव टनटन ढोलक बजा रहीं हैं, फाग गाए जा रहे हैं और निरुपमा जी छमाछम नाच रही हैं। महाराष्ट्र में होली की ये रौनक कभी किसी ने जानी ही नहीं थी, पर चूँकि पिछले दो-तीन वर्षों से होली जलाकर जो माहौल बना दिया गया था उससे बड़ी खुशी-खुशी और चाव से तमाम मराठी और गुजराती मित्र भी इस रसभरे माहौल में शरीक होकर आनंद लेने लगे। फिर तो हर बरस होली की सुबह भारती जी अपने कुरते की जेबो में गुलाल भर-भरकर टोली बनाकर निकलते। सबसे पहले बगल की पत्रकार कॉलॉनी में जाते, चित्रा और अवध मुद्गल, मनमोहन सरल, गणेश मंत्री, वयोवृद्ध किशोरी रमण टंडा, श्रीधर पाठक, लतालाल आदि को एकत्र करते हुए पूरे मोहल्ले का चक्कर लगाते हुए अपनी टोली को और-और बड़ा बनाते हुए होली खेलते-खेलते शब्द कुमार के घर में जमा होते। इसलिए कि उनका घर ऐसा था जिसकी बाउंड्री के भीतर खूब सारी खाली जगह थी। वहाँ होली की ये मस्तानी टोली सुस्ताती। शब्द कुमार की पती कांजी के वड़े बहुत अच्छे बनाती थीं। सब लोग मिल कर कांजी पीते, गुझिया, दालमोठ खाते और एक बार फिर होली की भाँति नाच-गाने की महफ़िल जमती। शशिभूषण वाजपेयी की पत्नी सरोज सिर पर पल्ला डालकर नाचतीं। साथ में उनकी बेटियाँ रेखा, सुलेखा और बेबी गातीं -
"मैं हूँ नई रे नवेली, नार अलबेली, तुम तो राजा फूल गुलाब के मैं हूँ चंपा चमेली नार अलबेली।"
तुम तो राजा लड्डू और पेड़ा मैं हूँ गुड़ की भेली, नार अलबेली।

क्या बताएँ आपको कि क्या समां बँधता था। भारती जी तो जिस तरह चटकते, महकते और मटकते थे कि कोई देखे तो विश्वास ही न करे कि होली व्यक्ति के लिए मशहूर है कि ये बड़ा कट्टर अनुशासन प्रिय संपादक है जो अपना प्रतिक्षण धर्मयुग के काम में झोंक देता है और चाहता है कि सहयोगी भी उसी निष्ठा के साथ हर पल सिर्फ़ काम में लगे रहें।

आज भी सोच-सोच कर अचरज होता है कि अपने जीवन को कितने स्तरों, कितने लोगों के नाम कर लेते थे भारती जी। उनके चले जाने के बाद मेरी ज़िंदगी तो कितनी वीरान, कितनी अंधेरी हो गई है, मैं कभी ज़ाहिर भी नहीं करती। लेकिन यादों की जो विरासत वे मुझे दे गये हैं, उसमें आज भी गुलाब महकते हैं, रोशनी झिलमिलाती है, रंग बिखरे पड़ते है। विद्यानिवास जी ने भारती जी के बारे में लिखा "फागुन की धूप सरीखे भारती'', हर होली पर उनके उसी फागुनी गुनगुने पन को महसूस करती जिऊँगी। मेरा उदास होना वे सह ही नहीं पाते थे सो मुझे तो हँसते-खिलते ही जीना है, उनके साथ बिताया हर दिन होली था, हर रात दीवाली थी।
(अभिव्यक्ति ब्लॉग से साभार)

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपको भी मंगल-मिलन "होली" की हार्दिक शुभकामनाएं

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  2. जल के राख हो , नफरत की होलिका
    आल्हाद का प्रहलाद बचे , इस बार होली में !

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  3. बहुत बढ़िया .. रंगोत्सव पर्व की हार्दिक शुभकामनाये ....

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  4. आ प को " हो ली की बहुत बहुत शुभ कामनाएं "

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