सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

दूसरी परंपरा के अंत का आख्यान रच रहे हैं नामवर सिंह

                   (स्व.आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी )


                         ( नामवर सिंह )

इन दिनों विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं,टीवी चैनलों आदि में जो साहित्य समीक्षा आ रही है उसका साहित्य की बजाय मासकल्चर से संबंध है।वह मासकल्चर का हिस्सा है।यह अचानक नहीं है कि साहित्य के हिन्दी में सबसे बड़े आलोचक के रूप में नामवर सिंह जाने जाते हैं,इन्हें ही मासकल्चरीय पुस्तक समीक्षा का प्रमुख समीक्षक भी कहा जा सकता है। यही कार्य अपने-अपने तरीके से अनेक साहित्यिक पत्रिकाएं भी कर रही हैं।

इस समीक्षा का मूल लक्ष्य है किताब का बाजार तैयार करना,्रकाशक का मुनाफा बढ़ाना,लेखक की प्रतिष्ठा में इजाफा करना। इसमें लेखक और किताब को जनप्रिय बनाने और प्रशंसक पैदा करने का प्रमुख भाव है। यह दूसरी परंपरा का विघटन है। क्या टेलीविजन से प्रसारित नामवरजी की पुस्तक समीक्षा आलोचना का क्षय है। यह दूसरी परंपरा का अंत भी है। यह बाजारु समीक्षा है। ऐसी अवस्था में हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि हमें रोशनी प्रदान कर सकती है। 

 एडवर्ड सईद के शब्दों में 'आलोचना की भूमिका बुनियादी तौर पर मूलगामी, धर्मनिरपेक्ष,अन्वेषकीय और तुलनात्मक रूप से गतिशील होती है।' आलोचना मूलत: बौध्दिक और विवेकपूर्ण (रेशनल) गतिविधि है।                
हजारीप्रसाद द्विवेदी मानवतावादी आलोचक हैं। उनकी आलोचना की बुनियाद है अस्मिता और स्मृति की राजनीति। पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में स्थित विश्वभारती के माहौल में जिन दिनों भारत की अस्मिता बचाने की पुरजोर कोशिशें चल रही थीं उस समय द्विवेदीजी यहां आउस समय भारतीय अस्मिता की रक्षा में समूचा रवीन्द्र स्कूल लगा हुआ था,इस क्रम में जहां एक ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के द्वारा निर्मित अस्मिता की राजनीति को चुनौती दी जा रही थी, दूसरी ओर भारतीय कठमुल्लों के द्वारा निर्मित अस्मिता को भी चुनौती दी गयी। अस्मिता के इन दोनों ही रूपों को चुनौती देने के लिए जरूरी था कि अस्मिता और स्मृति का नया संसार रचा जाय।
    
ब्रिटिश राजनीति के मुताबिक हमारा अतीत अंधकारमय था,वहीं कठमुल्लों के लिए अतीत में सब कुछ सुंदर था, इन दोनों में एक बात पर एका था कि दोनों का अतीत के प्रति आलोचनात्मक रवैयया नहीं था,दोनों के पास चयन का परिप्रेक्ष्य नहीं था। दोनों के लिए अतीत पूर्णत: निष्पन्न था।

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अतीत की निष्पन्नता को निशाना बनाया और आलोचना में सबसे पहले यह तथ्य पध्दति के रूप में रेखांकित किया कि अतीत कोई निष्पन्न या कम्प्लीट,अपरिवर्तनीय तत्व नहीं है।बल्कि उसे बार-बार निर्मित किया गया है। अतीत का जो भी बोध हमारे पास है उसका अतीत से कम वर्तमान के नजरिए से ज्यादा संबंध है।

अतीत को अतीत के नजरिए से नहीं वर्तमान के नजरिए से देखा जाना चाहिए। वर्तमान के नजरिए से अतीत को देखने का अर्थ है अतीत को परिवर्तनीय,गतिशील और निरंतर अपडेटिंग की प्रक्रिया का हिस्सा बना देना। जिस तरह वर्तमान अपने को अपडेट करता है,अतीत भी मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन के जरिए अपडेट करता है।यह स्वाभाविक प्रक्रिया है।मजेदार बात यह है कि अतीत को अपडेट करने का यह काम हजारीप्रसाद द्विवेदी के बाद हिन्दी में बंद हो गया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना की केन्द्रीय विशेषता यह है कि इसमें विमर्श के सामंती,औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी इन तीनों ही पैराडाइम को आधार नहीं बनाया गया है। वे इनसे जुड़ी किसी भी केटेगरी का भी इस्तेमाल नहीं करते।इसके अलावा उनका समूचा विमर्श अवधारणाओं के रूप में सामने आता है।

हिन्दी में पहलीबार अवधारणाओं का खजाना सामने आता है।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने यदि मुकम्मल साहित्येतिहास दिया तो हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इतिहास और आलोचना को अवधारणाओं में सोचने का मंत्र दिया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी के पहले हमारे पास मौलिक अवधारणाएं बहुत कम थीं। अवधारणाओं में सोचने का अर्थ है अस्मिता के निर्माण का सैध्दान्तिक आधार तैयार करना। अस्मिता,अवधारणा और स्मृति इन तीन तत्वों का व्यापक स्तर पर प्रयोग द्विवेदीजी की आलोचना की केन्द्रीय विशेषता है।वे इन तीनों के बीच में अन्तस्संबंध भी मानते हैं। इन तीनों का लक्ष्य है मनुष्य की परिवर्तनीय अवस्था को सामने लाना।मनुष्य और साहित्य के अन्तस्संबंध को सामने लाना, इस क्रम में उन्होंने आलोचना पध्दति में प्रक्रिया और ऐतिहासिकता की धारणा का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया है। ऐतिहासिक प्रक्रिया बदलती है तो साहित्य भी बदलता है। परंपरा भी बदलती हैं।अस्मिता भी बदलती है।ऐतिहासिक प्रक्रिया के आधार पर ही परंपरा और संस्कृति का मूल्यांकन पेश किया ।

द्विवेदी जी के यहां ऐतिहासिक प्रक्रिया के साथ मूल्य,विश्वास,अभ्यास,व्यवहार,विमर्श आदि जुडे हैं।जबकि साम्राज्यवादी और सामंती दोनों ही दृष्टियों में इसके प्रति घृणा और विरोध का भाव है।दूसरी महत्वपूर्ण पध्दतिगत विशेषता यह है कि वे ऐतिहासिकता को प्रतिवाद के अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करते हैं। आलोचना पध्दति की चौथी विशेषता है वर्चस्व का अस्वीकार । आलोचना में भेदबुध्दि ,छोटे-बड़े,शिक्षित-अशिक्षित, जनप्रिय साहित्य और साहित्य, केटेगरी के यांत्रिक प्रयोग का निषेध।साहित्य के सभी रूपों को समानता की नजर से देखना।
      

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