शुक्रवार, 12 मार्च 2010

साहित्य में व्याख्या और अति-व्याख्या के खतरे


       हिन्दी आलोचना में व्याख्या और अति-व्याख्या के कई रूप मौजूद हैं। व्याख्या के रूप में वीरगाथाकाल और छायावाद है तो अतिव्याख्या के रूप में भारतेन्दुयुग और भक्ति आंदोलन है। ऐसे में यह बात तय करनी होगी कि 'अच्छी व्याख्या' और 'बुरी व्याख्या' किसे कहें ?

       बुरी व्याख्या को परिभाषित करने के लिए 'अच्छी व्याख्या' को पहले परिभाषित करना जरूरी है। बुरी व्याख्या के प्रयोग नयीकविता और प्रयोगवाद की व्याख्याओं में देख सकते हैं। जबकि अच्छी व्याख्या के प्रयोग वीरगाथाकाल और छायावाद की व्याख्या में मिलेंगे। हिन्दी में व्याख्या और अतिव्याख्या के रूप में अभी बहस नहीं की जा रही है। अतिव्याख्या क्या है ? अतिव्याख्या का आदर्श पाठ है रामचरितमानस। इस किताब के बारे में जितना लिखा गया है उतना शायद किसी किताब के बारे में नहीं लिखा गया और दूसरा विषय है भारतेन्दुयुग। ये दोनों अतिव्याख्या के आदर्श रूप हैं। दोनों ही धर्मनिरपेक्ष पाठ के प्रतीक हैं। रामचरितमानस तो आमजनता में पवित्र धार्मिक ग्रंथ के रूप में जाना जाता है।

रामचरितमानस की अतिव्याख्या सतह पर स्वाभाविक लगती है ऐसी अनुभूति किसी भी प्राचीन मिथककथा के साथ हो सकती है। प्राचीन मिथक कथा को हमेशा संदेह के साथ पढ़ा जाता है जिसके कारण अतिव्याख्याएं जन्म लेती हैं। अतिव्याख्या के बावजूद भी आजतक रामचरितमानस पवित्र ग्रंथ है। इसकी व्याख्या आप उलटे-पुलटे ढ़ंग से नहीं कर सकते। उसी तरह रामकथा की आप मनमानी व्याख्या भी नहीं कर सकते। क्योंकि यह एक पवित्रकथा है। रामचरितमानस की असल व्याख्या मानसपंडितों ने तैयार की है। यह जनता की मनोदशा के अनुसार बदलती रही है। इस व्याख्या का आधार पाठ नहीं पाठक है। जबकि साहित्यिक आलोचकों के यहां रामचरितमानस की व्याख्या का आधार पाठक नहीं पाठ है।

मध्यकाल में प्रत्येक चीज की व्याख्या के लिए बढ़ावा दिया गया। फलत: व्याख्याओं का अम्बार लग गया। व्याख्या के अम्बार में अनेक विकल्प भी हैं। इसके बावजूद मध्यकालीन पाठ पवित्र धार्मिकपाठ है, धर्मनिरपेक्ष पाठ है,एकाधिक अर्थों को अभिव्यंजित करने वाला पाठ है। इस पाठ के सुनिश्चित नियम हैं।जो पाठ में छिपे हैं। ये सतह पर नजर नहीं आते। छिपा अर्थ रहस्यमय नहीं होता जो मध्यकालीन पाठ को सही ढ़ंग से पढ़ना जानते हैं वे ही बता पाएंगे कि आखिरकार मूल अर्थ क्या है। यदि मध्यकालीन पाठ को पहली नजर में सही ढ़ंग से नहीं पढ़ पाते हैं तो धार्मिक लोग उसे पढ़ने की चाभी प्रदान करते हैं। रामचरितमानस का एक धार्मिक पाठ के रूप में विकास और फिर उसका धर्मनिरपेक्ष पाठ के रूप में रूपान्तरण्ा इस बात का संकेत है कि मध्यकालीन पाठ समय के साथ बदलता है ,उसकी व्याख्याएं उसके बुनियादी जनप्रिय चरित्र को बदलती हैं। रामचरितमानस की अतिव्याख्या ने पाठ में निहित अर्थों को खोलने में मदद की ,जिससे रामचरितमानस का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप उद्धाटित हुआ।

एक अन्य चीज जिसकी ओर ध्यान देने की जरूरत है वह है पाठ का जनप्रिय उपयोग। किसी भी पाठ का जनप्रिय उपयोग उस पाठ को वही नहीं रहने देता जिस रूप में उसे लेखक ने बनाया था। रामचरितमानस के साथ भी यही हुआ। अन्य भक्त कवियों के साथ भी यही हुआ है। पाठ का जनप्रिय उपयोग पाठ के चरित्र को बदलता है। यह परिवर्तन प्रतिगामी और प्रगतिशील कुछ भी हो सकता हैं। मूल बात यह है कि पाठककेन्द्रित पाठ की व्याख्या चंचल होती है।

पाठ के अनुगामियों का आग्रह पाठ के अर्थ को निर्धारित करता है। सवाल उठता है कि रामकथा पहले से चली आ रही थी रामचरितमानस लिखकर तुलसीदास ने इसे धार्मिक कथा बनाया अथवा धर्मनिरपेक्ष कथा बनाया ? ठीक यही सवाल कृष्णकथा के संदर्भ में सूरदास की रचनाओं को पढ़ते समय उठाया जाना चाहिए। क्या कृष्णकथा को सूरदास ने धर्मनिरपेक्ष कथा बनाया अथवा धार्मिककथा बनाया ? अथवा आधुनिककालीन आलोचना ने रामचरितमानस और कृष्णकथा को धर्मनिरपेक्ष बनाया ? आलोचना में यह पुरानी बहस है कि पाठ क्या कहता है अथवा लेखक क्या कहना चाहता है ? हम भारतेंदुकाल से यह बताते आ रहे हैं कि लेखक क्या कहना चाहता हैं। पाठ की पाठककेन्द्रित स्वायत्ता व्याख्या को हमने कभी तरजीह नहीं दी। पाठ और पाठक के अन्तस्संबंध, पाठ की स्वायत्ताता ,पाठ के कोहरेंस, मूल अन्तर्निहित अर्थ, पाठक की अपनी उम्मीदों के अनुरूप अर्थ की तलाश आदि विषयों पर हमने गंभीरता के साथ विचार ही नहीं किया।

रामचरितमानस की धर्मनिरपेक्ष व्याख्या के क्रम में पाठककेन्द्रित व्याख्या की पध्दति का ख्याल रखा गया। पाठक की मंशाओं को उभारा गया और उसके स्रोत के रूप में पाठ का इस्तेमाल किया गया। मंशाएं पाठक की और आधार था पाठ। पाठ की मंशा सतह पर दिखाई नहीं देती। बल्कि उसे तय करके खोजना पड़ता है। यदि पाठ का सतह पर अर्थ दिखाई दे रहा हो तो जब तक उसे बताया न जाए स्वीकार नहीं करते। कहने का तात्पर्य यह है कि पाठ की मंशा मूलत: पाठक की मंशा का परिणाम होती है। पाठ और पाठक की मंशा के योग के आधार पर आदर्श पाठक बनता है।

रामचरितमानस की कहानी मिथककथा की तरह आरंभ होती है। आप चाहें तो इसे परीकथा की तरह पढ़ सकते हैं और चाहें तो संकेतों और प्रतीकों के जरिए खोल सकते हैं अथवा इस कथा में निहित बिडम्बनाओं का अध्ययन कर सकते हैं। लेकिन इस सबके लिए आपको पाठ को खोलना होगा। पाठ में प्रवेश करना होगा। पाठ में प्रवेश करने के बाद उसका अर्थ खुलता है और यह अर्थ वही होता है जो पाठ को वैधता प्रदान करे। अथवा ऐसा अर्थ भी हो सकता है जो पाठ को खारिज करे अथवा चुनौती दे। अथवा पाठ के कुछ हिस्सों को खारिज करे और कुछ को चुनौती दे। जैसाकि रामचरितमानस के संदर्भ में होता रहा है। हम उसके अनेक हिस्सों को प्रक्षिप्त मानते हैं,खारिज करते हैं और अनेक को चुनौती भी देते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि रामचरितमानस में आंतरिक तौर पर टेक्स्चुअल नियंत्रण है। अन्यथा तो पाठक के अनियंत्रित प्रयास से पाठ कुछ का कुछ हो सकता था।

1 टिप्पणी:

  1. "इसका अर्थ यह भी है कि रामचरितमानस में आंतरिक तौर पर टेक्स्चुअल नियंत्रण है। अन्यथा तो पाठक के अनियंत्रित प्रयास से पाठ कुछ का कुछ हो सकता था। "
    तो यह मानी जाय अतिव्याक्ख्या की अंतिम निष्पत्ति ?

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