शुक्रवार, 5 मार्च 2010

खुली आलोचना के खतरे और संभावनाएं



(रामविलास शर्मा और नामवर सिंह)
   
    हिन्दी आलोचना में नामवर सिंह की आलोचना मूलत: मौलिक और खुली आलोचना है। इसमें मनवाने अथवा फुसलाने का भाव नहीं है और न यह अंतिम व्याख्या है।  यह आलोचना का आरंभ है समापन नहीं है। यह आलोचना बहस के लिए मजबूर करती है। असहमति के लिए मजबूर करती है। इसमें सबको संतुष्ट करने का भाव नहीं है, यह आलोचना का खुला पाठ है आप जहां से भी चाहें दाखिल हो सकते हैं।

    नामवरसिंह अपनी आलोचनात्मक पध्दति को खुला रखते हैं। उनकी आलोचना में पाठ के अधिकार और व्याख्याकार के अधिकार का समावेश है। इस पध्दति का उन्होंने व्यापक प्रचार किया है और इस क्रम में पाठ का अधिकार गायब हो गया और व्याख्याकार का अधिकार प्रतिष्ठित हो गया। व्याख्याकार के अधिकार की महत्ता स्थापित होने का परिणाम यह निकला है कि बगैर किसी क्राइटेरिया के व्याख्या होने लगी है। प्रत्येक व्याख्या का सुखद अंत होता है। व्याख्या के सुखद अंत का अर्थ है प्रशंसा,गुणचर्चा,हल्की आलोचना आदि।
     
    किसी भी पाठ की विश्वसनीय रीडिंग मिसरीडिंग होती है। तोदोरोव के शब्दों  में पाठ तो पिकनिक है जिसे शब्द और पाठक अर्थ प्रदान करते हैं। पाठककेन्द्रित व्याख्या को निर्मित करने में नामवरसिंह की आलोचना पध्दति का बड़ा योगदान है। वह बताते हैं आखिरकार किसी कहानी अथवा कविता अथवा पाठ में फलां-फलां पदबंध अथवा अवधारणा का इस्तेमाल क्यों किया गया और इस अवधारणा अथवा पदबंध के जरिए क्या-क्या अर्थ निकलते हैं।
   
    आजादी के बाद की आलोचना में 'मंशा' की अवधारणा सबसे बड़ी समस्या है। नामवरसिंह ने लेखक की मंशा ,रामविलासशर्मा ने 'पाठ की मंशा' और मुक्तिबोध के यहां 'आलोचकीयमंशा' के आधार पर आलोचना का विकास हुआ है।  लेखक की मूल मंशा के आधार पर लिखी आलोचना अपने को वैध मानती है।
    आलोचना में जिसे लेखकीय मंशा कहते हैं। वह रिचर्ड रोर्ती के शब्दों में मूलत: आलोचकीय मंशा है। रामविलासशर्मा ने छायावाद और निराला के मूल्यांकन के क्रम में 'पाठ की मंशा' को आधार बनाकर समूचा मूल्यांकन विकसित किया है। यही पध्दति नामवरसिंह ने 'छायावाद' और 'कहानी नयी कहानी' के निबंधों में इस्तेमाल की है।
      
     आधुनिक आलोचना में किसी भी घटना,विचार,परिघटना अथवा फिनोमिना की व्याख्या के क्रम में उसके 'कारणों' पर रोशनी ड़ाली जाती है। आधुनिककाल के पहले किसी भी घटना बगैरह पर विचार करते हुए भगवान पर रोशनी ड़ालते थे। अब भगवान पर नहीं 'कारण' की बातें करते हैं। किसी भी चीज का ज्ञान प्राप्त करने का अर्थ है उसके 'कारणों' को जानना। जाहिर है 'कारण' के परे कोई कारण नहीं होता। 
       
अब जगत की व्याख्या 'कारण' के आधार पर करने लगे हैं। 'कारण' के आधार पर सोचने लगे हैं। क्रमश: कारणों के विकास को देखने लगे। यानी कारण का विकास ए से बी की ओर ही होगा, बी से ए की ओर नहीं। क्रमश: 'कारण' के आधार पर सोचने का अर्थ है अस्मिता के आधार पर सोचना। दूसरा परिणाम यह निकलेगा है कि गैर-अन्तर्विरोधी भाव से सोचेंगे। मसलन् जब एकबार तय कर लिया  फलां माक्र्सवादी है तो फिर वह माक्र्सवादी है, उसका प्रतिक्रियावादी अथवा कभी गैर माक्र्सवादी होना संभव नहीं है। जब कि सच यह है जो व्यक्ति माक्र्सवादी है वह गैर मार्क्सवादी भी हो सकता है। ऐसा हिन्दी के कई मार्क्सवादी लेखकों में  देख सकते हैं।  जो तय है उसे बदल नहीं सकते। अर्थात् सच सच है उसे झूठ नहीं कह सकते। फलत: अन्य को बहिष्कृत करके रखने का भाव आलोचना में आ जाता है।  इन परिणामों के आधार पर आप  जगत को परख नहीं सकते।  सामाजिक संपर्क जरूर कर सकते हैं। असल में आलोचना में आए इस तरह के लक्षण पश्चिमी विवेकवाद की देन हैं।
    
    मध्यकाल का रामाश्रयी और कृष्णाश्रयी साहित्य वर्गीकरण अथवा कालविभाजन इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि साहित्य की सीमा क्या है ? आलोचना लिखते समय हमें 'सीमारेखा' का ख्याल रखना होगा। सीमाहीन ढ़ंग से न तो साहित्येतिहास लिखा जा सकता है और न आलोचना का ही विकास संभव है। अमूमन हम कहते हैं प्रत्येक चीज की समयसीमा होती है। समय के चक्र को उलटा नहीं जा सकता। समयसीमा को कोई नहीं मिटा सकता। 'समयसीमा' का सवाल कालविभाजन के सवाल के रूप में आता है। इसके अलावा नए आधार पर भी 'समयसीमा' तय की गई है और यह कार्य स्वयं रामविलासशर्मा ने किया। 
     शर्माजी ने साहित्य और समाज के बीच के अन्तस्संबंध को यांत्रिक भौतिकवादी आधार पर वर्गीकृत करते हुए नए रूप में प्राचीनकाल से लेकर आधुनिककाल का वर्गीकरण किया,वहीं दूसरी ओर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कालविभाजन के सवाल को भिन्न रूप में हल किया और कालविभाजन को नहीं माना। नामवरसिंह ने पध्दति के रूप में इतिहास की माक्र्सवादी पध्दति से जुड़े रूपों की चर्चा 'इतिहास और आलोचना'' में की। इस समस्त आलोचनात्मक बहस का निचोड़ था 'सीमा' अथवा 'साहित्य की समयसीमा' को नए सिरे से परिभाषित करना। पुराने वर्गीकरण के दायरे के बाहर आना। इस बहस का निष्कर्ष यह निकला कि समय को बांधना संभव नहीं है। अत: कालविभाजन आज प्रासंगिक नहीं है।









3 टिप्‍पणियां:

  1. आजादी के बाद की आलोचना में 'मंशा' की अवधारणा सबसे बड़ी समस्या है। नामवरसिंह ने लेखक की मंशा ,रामविलासशर्मा ने 'पाठ की मंशा' और मुक्तिबोध के यहां 'आलोचकीयमंशा' के आधार पर आलोचना का विकास हुआ है। लेखक की मूल मंशा के आधार पर लिखी आलोचना अपने को वैध मानती है।
    " आलोचना में जिसे लेखकीय मंशा कहते हैं। वह रिचर्ड रोर्ती के शब्दों में मूलत: आलोचकीय मंशा है। रामविलासशर्मा ने छायावाद और निराला के मूल्यांकन के क्रम में 'पाठ की मंशा' को आधार बनाकर समूचा मूल्यांकन विकसित किया है। यही पध्दति नामवरसिंह ने 'छायावाद' और 'कहानी नयी कहानी' के निबंधों में इस्तेमाल की है। "
    यह इस आलेख का महत्वपूर्ण अंश है ।

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  2. sriman ji,
    kripya apna postal address loksangharsha@gmail.com par bhejne ka kast karein jisse aapko loksangharsh patrika bheji ja sake.

    sadar
    aapka
    suman
    http://loksangharsha.blogspot.com/

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  3. साहित्य,समाज और सामयिक प्रश्नों पर गंभीर विमर्श चलाने के लिए बधाई।आज की हिन्दी आलोचना साहित्यिक न होकर शास्त्रीय ज्यादा होती जा रही है।पठक धीरे-धीरे हाशिये पर डाल दिये गये हैं।साहित्य को आलोचकों के प्रचंड प्रताप से मुक्ति ही अभी आवश्यक प्रतीत होता है।

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