मंगलवार, 26 जनवरी 2010

फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह- फिलीस्तीनी प्रतिवाद की धुरी है सर्जनात्मकता - सुधा सिंह




इस्राइल ने गाजापट्टी और वेस्टबैंक के बीच स्वघोषित सीमा निर्धारण और अवैध कब्जा कर रखा है। यह अंतर्राष्ट्रीय सीमारेखा नहीं है पर इसे पार करने के लिए बाकायदा पासपोर्ट और वीजा की जाँच इस्राइली ऑफिसरों द्वारा की जाती है। अक्टूबर 2007 के पहले तक यानि हम्मास के सत्ता में आने के पहले तक भी यही स्थिति थी। अन्य देश के लोगों का गाजापट्टी में घुसना लगभग दुष्कर काम था। आज भी यह उतना ही कठिन बना हुआ है। लोगों के आने-जाने के साथ -साथ सूचनाओं पर भी कठोर नियंत्रण रखा जाता है। सबसे पहले तो इस्राइली वर्किंग वीजा मिलना ही मुश्किल होता है। गाजा की तरफ से इस्राइल में घुसना आसान नहीं है। इरेज़ की तरफ से घुसा जा सकता है पर वहाँ इस्राइल की दादागिरी की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इस्राइली सेना की अनुमति से कुछ मानवाधिकार संगठनों के लोग , कुछ राजनीतिज्ञों और कुछ पत्रकारों आदि को ही जाने देते हैं। इरेज़ से निकलने पर इस्राइली अफसरों के द्वारा 'निर्गत' की मुहर लगाई जाती है। ऐसे ही गाजा पट्टी से निकलते समय 'आगत' की मुहर लगाई जाती है। इसी तरह से गाजा में काम कर रहे अंतर्राष्ट्रीय सहायता कार्यदल के कार्यकर्ताओं को वर्किंग वीजा के लिए इस्राइल में पन्द्रह दिनों तक काम करने को कहा जाता है। यह निहायत ही अपमानजनक ,श्रमसाध्य और थकानेवाली प्रक्रिया है।
  अंतर्राष्ट्रीय नियमों को ताक पर रखते हुए इस्राइल पूर्वी जेरूसलम को अपना हिस्सा बताता है। फिलिस्तीन में काम कर रहे ज्यादातर गैरसरकारी संगठनों का मुख्यालय यहाँ है। भौगोलिक सीमा की अस्पष्टता भयावह दिक्कतों को जन्म देती है। गाजा में प्रवेश करते ही असामान्य सुरक्षा व्यवस्था और इस्राइली धरती से भिन्न उजाड़ परिवेश का सामना करना होता है। यह एक स्वतंत्र राष्ट्र की घेराबंदी है। हर चीज पर पहरेदारी और दमघोंटू वातावरण। नागरिक अधिकारों से वंचित लोगों का अपराध समझ में नहीं आता। बड़े पैमाने पर सेना द्वारा की गई तबाही मानवीय अधिकारों का मजाक उड़ाती नजर आती हैं।
  इस्राइल द्वारा इरेज़ की घेराबंदी उसकी फिलिस्तीन संबंधी नीति का हिस्सा है। फिलीस्तीन से किसी भी तरह की सूचना बाहर जाने और आने पर इस्राइल की पूरी निगरानी है। घेराबंदी और सैन्य तबाही फिलिस्तीन के संबंध में उसकी यही नीति है। फिलिस्तीन की सही स्थिति बाहर आए यह तब तक नहीं संभव है जब तक कि फिलिस्तीन जाने-आनेवाले रास्तों और सूचनाओं के संजाल पर फिलिस्तीन के बजाए बाहरी देश इज़रायल का नियंत्रण है। अंतर्राष्ट्रीय समझौते के बाद भी फिलिस्तीन जानेवाले मार्गों पर इस्राइल का इस तरह अवैध कब्जा ताकतवर की लाठी ही है। किसी देश की स्वायत्तता और जनतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है। सभ्यता और जनतांत्रिक अधिकारों का दावा करनेवाले विश्व राजनीतिक चेतना पर एक धब्बा है। गाजा के अलबुरेज, नुसरायात, वादी अल सिकवा, जुहूर अल दिक और दक्षिणी जिले जैसे अल जाएतून और ताल अल हवा आदि शरणार्थी शिविर में तब्दील हो चुके हैं। पीने के पानी और जीवन जीने के लिए बुनियादी सुविधाओं के अभाव में गाजा शहर के मध्यवर्ती इलाके समेत अन्य हिस्से के लोग जीवनयापन कर रहे हैं। उत्तरी गाजा के हिस्से तुलनात्मक तौर पर बमों और मिसाइलों की मार से ज्यादा क्षतिग्रस्त हुए हैं। लोग बिना किसी सहायता के मलबों के बीच रहने के लिए बाध्य हैं। हजारों परिवारों की कहानी है कि वे मलबे के मालिक बनने पर मजबूर हैं। एन जी ओ की सहायता से ये परिवार थोड़ी बहुत सुविधाएं जैसे पानी -खाद्य सामग्री आदि हासिल कर लेते हैं।
 ज्यादातर युवा बेरोजगार हैं। स्त्रियों के लिए जीवन और भी कठिन है। आर्थिक अभाव में जीवनयापन करते हुए रोजमर्रा की जरुरत की चीजों के लिए मोहताज होने की जैसे उनकी आदत हो गई है। यह भयावह अमानवीय स्थिति है कि अमानुषिक परिस्थितियों के प्रति कण्डीशन्ड हो जाया जाए। लेकिन गाजावासियों की स्पिरिट को सलाम करना होगा कि इन स्थितियों में भी जीवन जीने की अदम्य ललक उनमें बाकि है। शादी-ब्याह, पर्व -त्योहार और अन्य सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का इजहार करते रहते हैं। चित्रकला, फिल्मी गीतों , नाच आदि को लेकर बुद्धिजीवी समूहों की बैठकें भी चलती रहती हैं। कलाओं में प्रतिरोधी स्वरों की प्रधानता देखी जा सकती है। गाजा के कुछ दीवाने लोगों में गाजा की तबाही को लेकर गहरा आक्रोश है पर वे इसका उत्तर सर्जनात्मकता से देना चाहते हैं। कम-से-कम के साथ जीने और तबाही के साथ एक अस्थिर वर्तमान में जिन्दा रहने की जद्दोजहद कहीं उनके इंसान होने के एहसास का खात्मा न कर दे। वे अपने इतिहास और अच्छे दिनों की किसी भी किस्म की कल्पना से रहित न बन जाएँ इसके लिए कई गाजावासी अपने स्तर पर मिशन भाव से नागरिक कर्तव्यों का निर्वाह कर रहे हैं। सूचनाविहीन और संस्कृतिरहित कर पशु बनाए जाने के खिलाफ खड़े हर ऐसे प्रतिरोधी प्रयत्न को सलाम। 
  ( एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली)





5 टिप्‍पणियां:

  1. तिब्बत मुक्ति सप्ताह कब मनाया जाता है, पता हो तो बताना. आँसू बहाने है.

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  2. बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने लेकिन एक शिकायत है कि आप कृपया करके देश के उन हिस्सों की भी जानकारी दे जो इससे भी ज्यादा भयावह स्थिति से गुजर रहे है,

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  3. आपकी सूचना से इंकार नहीं है. पर थोडा इतिहास भी खंगालें की इस स्थिति के लिए कौन कितना जिम्मेदार है. जिस देश का अस्तित्व मिटा देने की प्रतिग्याँ से इस्लामी जगत बंधा है और जिसके तहत दुर्दांत शत्रुत्व न जाने कितने आक्रमण लगातार कर चुका है ,करता रहता है ,वह देश अपनी सुरक्सा के लिए ही ऐसा कर रहा है . और वह प्रतिराक्सा के प्रति हम भारतीयों जैसा मूर्ख और कायर नहीं है न ही लापरवाह. कुछ और टिप्पणियां आयी हैं, उनके आलोक में भी कुछ लिखें.

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  4. @ begani ji
    तिब्बत मुक्ति सप्ताह कब मनाया जाता है, पता हो है aapko lekin khunnas hai musalmanon se jo har kahin nikalti rahti hai.
    aap patrkaar hain aapko saari maaloomaat rahti hai.
    tibbet ke liye kewal dilli mein hi 5oo sansthaayen ragistered hain.jo yahan se dharamshala tak bahut kuch karti rahti hain.sara bharat unke saath hai.hona bhi chahiye.

    jagdishverji aur sudha ji aapko salam filasteen ko yaad karne k liye.
    ajeed dard ka rishta hai saari duniya se
    kahin ho jalta makan apna ghar lage hai mujhe

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  5. हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें

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