शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

हिन्दी का रौरव नरक


        हिन्दी का अकादमिक जगत रौरव नरक में फंसा हुआ है। नए और चुनौतीपूर्ण विषयों के प्रति रूझान घटा है।वर्तमान के प्रति हमने आंखें बंद कर  हैं।शोध को दोयमदर्जे का लेखन मान लिया है।बगैर किसी अनुसंधान और गंभीर चिन्तन से रहित विवेक का ही चारों ओर जयगान हो रहा है। शोध के प्रति गंभीर उपेक्षा का ही आलम है कि शोध के प्रकाशन की कोई समुचित व्यवस्था का हमारे यहां कोई इंतजाम नहीं है। यहां तक कि प्रकाशक भी शोध को छापने के पैसे मांगते हैं। शोध को बेच लेते हैं किन्तु एक भी पैसा लेखक को नहीं देते। आलोचना, शोध और शिक्षण के बीच विराट अंतराल पैदा हो गया है। हमारे शोधार्थी जो अनुसंधान करते हैं उसे आलोचक और इतिहासकार कभी अपने लेखन और विमर्श का हिस्सा नहीं बनाते। स्थिति यहां तक बदतर हो गयी है कि प्रतिष्ठित समीक्षक कभी किसी अनुसंधान का अपने लेखन में उल्लेख तक नहीं करते।नामवर सिंह से लेकर परमानंद श्रीवास्तव तक हिन्दी के चर्चित प्राध्यापक-समीक्षकों में शोध के प्रति इस तरह के अलगाव,आलस्य और उपेक्षापूर्ण रवैयये की जड़ें हमारे आलोचना विवेक और इतिहास विवेक में गहरे छिपी हुई हैं।इसके कारणों की पड़ताल की जानी चाहिए।  
       हिन्दी में शोध की उपेक्षा का प्रधान कारण है खोज के प्रति एडवेंचर का अभाव,नए के प्रति अनास्था, परजीवीपन, इतिहास और आलोचना का शोध के साथ अलगाव, शिक्षकों में नए के प्रति खोज की मानसिकता का अभाव, वर्तमान समय को न जानने की प्रवृत्ति ,स्वयं को बड़ा दिखाने की प्रवृत्ति और अन्य को छोटा दिखाने की मानसिकता। इन सबसे बड़ा कारण है शिक्षक-आलोचक का यह मानना कि सब कुछ महत्वपूर्ण तो पहले वाले इतिहासकार कह गए हैं ,अब उसमें नया कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता।
   रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जो लिखा है वह पत्थर की लकीर है।नामवर ने जो कहा है वह स्वर्णाक्षर में लिखे जाने योग्य है।मुक्तिबोध ने जो लिख दिया है उसे प्रणाम करके स्वीकार करो।इन सबके अलावा जो लोग लिख रहे हैं उसमें नया कुछ भी नहीं है।इस तरह की मानसिकता हमारे साहित्यिक और अकादमिक परिदृश्य के पतन की द्योतक है। सवाल किया जाना चाहिए कि रामचन्द्र शुक्ल वगैरह को पत्थर की लकीर क्यों बनाया गया , रूढि क्यों बनाया गया ,शिक्षा में इस तरह के रूढिवाद को किसने जन्म दिया ?

असल में यह एक खास किस्म का सामंतवाद है जो हिन्दी में  पैदा हुआ है। इसकी जड़ें बड़ी गहरी हैं। यह नए से डरता है, विचारों का जोखिम उठाने से डरता है।साहित्य सैद्धान्तिकी से डरता है।अन्य से सीखने और स्वयं को उससे समृध्द करने में अपनी हेटी समझता है।स्वयं दूसरों का चुराता है और उसे मौलिकता के नाम पर परोसता है।साहित्य को अनुशासन के रूप में पढ़ने पढ़ाने में इसकी एकदम दिलचस्पी नहीं है।
        आज वास्तविकता यह है कि ज्यादातर शिक्षक और समीक्षक आजीविका और थोथी प्रशंसा पाने लिए अपने पेशे में हैं।वे किसी भी चीज को लेकर बेचैन नहीं होते। उनके अंदर कोई सवाल पैदा नहीं होते। एक नागरिक के नाते उनके अंदर वर्तमान की विभीषिकाओं को देखकर उन्हें गहराई में जाकर जानने की इच्छा पैदा नहीं होती।वे पूरी तरह अतीत के रेती के टीले में सिर गडाए बैठे हैं।

वे न तो कुछ सुनते और न कुछ देखते हैं। वे न तो कुछ सीखते और न कुछ सिखाते हैं। ऐसे ही शिक्षक-समीक्षक हमारे आराध्य बने हुए हैं।अन्नदाता हैं।नौकरी दिलाने वाले हैं। डिग्री दिलाने वाले हैं।ऐसे में हिन्दी अनुसंधान का भविष्य और वर्तमान आशाविहीन नजर आता है तो कोई आश्चर्य नहीं है।क्योंकि जिन पर हमने आशाएं टिकायी हुई हैं। वे इस लायक नहीं हैं कि किसी को आशान्वित कर सकें।

ऐसे शिक्षक-आलोचक बड़े पद हासिल कर सकते हैं। नौकरियां दिला सकते हैं। लेकिन हिन्दी को ज्ञानसंपन्न नहीं कर सकते। हिन्दी प्रोफेसरों की ज्ञान विपन्नता का ही यह दुष्परिणाम है कि आज हमारे पास हिन्दी का सुसंगत रूप में लिखा मुकम्मल इतिहास तक उपलब्ध नहीं है। कल्पना कीजिए रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आरंभिक कार्य न किया होता तो हम कितने गरीब होते , इन दोनों इतिहासकारों की इतिहास कृतियां हिन्दी के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए तैयार की गई थीं।
       हिन्दी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षक और आलोचक अपने नियमित अभ्यास और ज्ञान विनिमय का अनुसंधान को अभी तक जरिया नहीं बना पाए है।वे पढ़ाने और बोलने को प्रथमकोटि का काम मानते हैं और शोध को दूसरे दर्जे का काम मानते हैं। वे वादानुवाद के लिए तो किसी कृति पर चर्चा करेंगे किन्तु उस कृति को इतिहास और आलोचना के इतिहास में शामिल करके विद्यार्थियों को लाभान्वित नहीं होने देते।इस सबका प्रधान कारण है हमारे हिन्दी विभागों का वर्तमान की वास्तविकता के साथ एकदम संबंध विच्छेद।

     हिन्दी विभागों के शिक्षकों और विद्यार्थियों को देखकर लगता नहीं है कि ये लोग इस युग के लोग हैं।वे जिस मासूमियत और अज्ञानता के साथ वर्तमान के साथ पेश आते हैं उसके कारण सारा माहौल और भी बिगड़ा है।

विद्यार्थियों में मासूमियत और अज्ञानता को बनाए रखने में शिक्षकों की बड़ी भूमिका है।ये ऐसे शिक्षक हैं जो ज्ञान के आदान-प्रदान में एकदम विश्वास नहीं करते।वे ज्ञान को बांटने में नहीं ज्ञान को चुराने में सिध्दहस्त हैं।

कायदे से शिक्षक को पारदर्शी, निर्भीक और ज्ञानपिपासु होना चाहिए।किन्तु हिन्दी विभागों में मामला एकदम उल्टा नजर आता है। हिन्दी के शिक्षक भोंदू ,आरामतलब, ज्ञान-विज्ञान की चिन्ताओं से दूर और दैनन्दिन जीवन की जोड़तोड़ में ही मशगूल रहते हैं। ऐसी अवस्था में हिन्दी का शोध और शिक्षा का गतिरोध कैसे खत्म होगा ?

शिक्षकों ने हिन्दी शोध के बारे में मिथ बनाए हैं और बड़े घटिया मिथ बनाए हैं, यह कहावत प्रचलन में है रिसर्च यानी चार किताब पढ़कर पांचवी किताब लिखना या फिर नकल। हमारे शिक्षकों ने कभी इस मिथ के खिलाफ मुहिम नहीं चलायी। बल्कि इस धारणा को तरह-तरह से पुष्ट करते रहते हैं। इसके विपरीत होता यह है कि यदि कोई शिक्षक निरंतर शोध कर रहा है या निरंतर लिख रहा है तो उसका उपहास उडाने या केरीकेचर बनाने में हमारे समीक्षक- शिक्षक सबसे आगे होते हैं और यह कहते हुए मिलते हैं बड़ा कचरा लिख रहे हैं।हल्का लिख रहे हैं।यानी हमारे शिक्षकों को निरंतर लिखने वाले से खास तरह की एलर्जी है।वे यह भी कहते मिल जाते हैं कि फलां का लिखा अभी तक इसलिए नहीं पढ़ा गया या विवेचित नहीं हुआ  क्योंकि जब तक उनकी एक किताब पढकर खत्म भी नहीं हो पाती है तब तक दूसरी आ जाती है।इस तरह के अनपढों के तर्क उसी समाज में स्वीकार किए जाते हैं जहां लिखना अच्छा नहीं माना जाता। कहीं न कहीं गंभीर लेखन के प्रति एक खास तरह की एलर्जी या उपेक्षा जिस समाज में होती है वहीं पर ऐसी प्रतिक्रियाएं आती हैं।
       हिन्दी में देश में सबसे ज्यादा अनुसंधान होते हैं। आजादी के बाद से लेकर अब तक कई लाख शोध प्रबंध हिन्दी में लिखे जा चुके हैं। हिन्दी में शोध की दशा को देखना हो तो हमें यह देखना चाहिए कि आलोचक वर्तमान के सवालों पर कितना समय खर्च कर रहे हैं। कितना लिख रहे हैं।

       रामविलास शर्मा, नगेन्द्र,नामवर सिंह,विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पांडेय,शिवकुमार मिश्र, कुंवरपाल सिंह , चन्द्रबलीसिंह ,परमानन्द श्रीवास्तव,नन्दकिशोर नवल आदि आलोचकों ने कितना वर्तमान पर लिखा और कितना अतीत पर लिखा , इसका यदि हिसाब फैलाया जाएगा तो अतीत का पलड़ा ही भारी नजर आएगा। ऐसे में हिन्दी के वर्तमान जगत की समस्याओं पर कौन गौर करेगा , खासकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की जटिलताओं का मूल्यांकन तो हमने कभी किया ही नहीं है।
     रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक के स्वातन्त्र्योत्तर भारत के बारे में अब तक के विवेचन से भारत कम से कम समझ में नहीं आता। हिन्दी क्षेत्र और हिन्दी साहित्य की जटिलताओं का आभास तक नहीं मिलता। हिन्दी से जुड़े अधिकांश जटिल सवालों की हमारी समीक्षा ने उपेक्षा की है। किसी भी साहित्यिक और सांस्कृतिक बहस को मुकम्मल नहीं बना पाए हैं। हिन्दी में साहित्यिक बहसें विमर्श या संवाद के लिए नहीं होतीं,बल्कि यह तो एक तरह का दंगल है,जिसमें डब्ल्यू डब्ल्यू फाइट चलती रहती है।

हमने संवाद,विवाद और आलोचना के भी इच्छित मानक बना लिए हैं। इसे हम अनुशासन के रूप में नहीं चलाते।परंपरा के नाम पर जो विपुल सामग्री स्वातंत्र्योत्तर दौर में रची गयी है वह भी इच्छित तरीके से। उसमें भी हमने शोध के अनुशासन का पालन नही किया है। परंपरा पर विराट सामग्री ने और कुछ किया या नहीं हम नहीं जानते किन्तु इसने हमारे हिन्दी के परजीवी शिक्षक को परंपरापूजक जरूर बना दिया है।

     हम भूल ही गए कि परंपरा पर इकहिरे ढ़ंग से विचार करने से एक खास किस्म का सांस्कृतिक माहौल बनता है। जिसमें वर्तमान तो उपेक्षित होता ही है स्त्री और दलित भी उपेक्षित होते हैं। यही वजह है कि दलित और स्त्री को परंपरा से सख्त नफरत है। वे परंपरा के नाम पर किए गए किसी भी किस्म के प्रयास को स्वीकार नहीं करते। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा परंपरा का इन दोनों से सीधा अंतर्विरोध।
    परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमने सरलीकरण और साधारणीकरण से काम लिया है।परंपरा की इच्छित इमेज बनाई है।परंपरा की जटिलताओं को खोलने की बजाय परंपरा के वकील की तरह आलोचना का विकास किया है।

     परंपरा की इच्छित इमेज बनाने का सबसे अच्छा उदाहरण हैं रामविलास शर्मा का लेखन।इसमें वाद-विवाद और संवाद के लिए कोई जगह नहीं है। कुछ-कुछ यह भाव है हम बता रहे हैं और तुम मानो। मजेदार बात यह है कि परंपरा का मूल्यांकन करते हुए जो लेखक परंपरा के पास गया वह परंपरा का ही होकर रह गया।परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमें बार-बार परंपरापूजक का बोध पैदा करने की कोशिश की गई। इसकी साहित्य में गंभीर प्रतिक्रिया हुई है लेखकों का एक तबका एकसिरे से परंपरा को अस्वीकार करता है। परंपरा पर बातें करना नहीं चाहता।

खासकर प्रयोगवाद,नयीकविता और आधुनिकतावादी साहित्यकार के लिए परंपरा गैर महत्व की चीज है। कहने का अर्थ है कि परंपरा के बारे में हमारे यहां तीन तरह के नजरिए प्रचलन में हैं। पहला नजरिया परंपरावादियों का है जो परंपरा की पूजा करते हैं। परंपरा में सब कुछ को स्वीकार करते हैं।

दूसरा नजरिया प्रगतिशील आलोचकों का है जो परंपरा में अनुकूल की खोज करते हैं और बाकी पर पर्दा डालते हैं। तीसरा नजरिया आधुनिकतावादियों का है जो परंपरा को एकसिरे से खारिज करते हैं। इन तीनों ही दृष्टियों में अधूरापन है और स्टीरियोटाईप है।
    
     परंपरा को इकहरे,एकरेखीय क्रम में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। परंपरा का समग्रता में जटिलता के साथ मूल्यांकन किया जाना चाहिए।परंपरा में त्यागने और चुनने का भाव उत्तर आधुनिक भाव है।यह भाव प्रगतिशील आलोचकों में खूब पाया जाता है।

     परंपरा में किसी चीज को चुनकर आधुनिक नहीं बनाया जा सकता।नया नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के पास हम इसलिए जाते हैं कि अपने वर्तमान को समझ सकें वर्तमान की पृष्ठभूमि को जान सकें।हम यहां तक कैसे पहुँचे यह जान सकें।परंपरा के पास हम परंपरा को जिन्दा करने के लिए नहीं जाते। परंपरा को यदि हम प्रासंगिक बनाएंगे तो परंपरा को जिन्दा कर रहे होंगे। परंपरा को प्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के जो लक्षण हमें आज किसी भी चीज में दिखाई दे रहे हैं तो वे मूलत: आधुनिक के लक्षण हैं नए के लक्षण हैं।नया तब ही पैदा होता है जब पुराना नष्ट हो जाता है। परंपरा में निरंतरता होती है जो वर्तमान में समाहित होकर प्रवाहित होती है वह आधुनिक का अंग है।वर्तमान का रूप है,उसका हिस्सा है।
     

       साहित्य के लिए परंपरा का जो अर्थ है वही अर्थ दलित साहित्य, और स्त्री साहित्य के लिए नहीं है।साहित्य की परंपरा और इतिहास के साथ दलित साहित्य और स्त्री साहित्य का सीधा अन्तर्विरोध है।यह अंतर्विरोध कैसे खत्म हो इस पर हमने कभी विचार नहीं किया।समग्रता में देखें तो परंपरा वर्चस्वशाली ताकतों का हथियार रही है। वर्चस्व स्थापित करने का माध्यम रही है।यही वजह है कि वंचितों ने हमेशा परंपरा को चुनौती दी है। उसे अस्वीकार किया है।यही स्थिति कमोबेश इतिहास की भी है।वंचितों ने इतिहास को भी चुनौती दी है। परम्परा और इतिहास के जितने भी मूल्यांकन हमारे सामने हैं वे दलित और स्त्री को सही नजरिए से देखने में मदद नहीं करते।बल्कि इसके उलट सही नजरिए से देखने में बाधा देते हैं।
वर्चस्वशाली ताकतों की सेवा में साहित्य का इतिहास तब तक सेवा करता है जब तक उसे चुनौती नहीं मिलती। आजकल जमाना बदल चुका है। बदले जमाने की हवा वर्चस्वशाली ताकतों और उनके विचारकों के लिए सिरदर्द बन गयी है। वंचितों के वैचारिक और सामाजिक दबाव का ही सुफल है कि आज आलोचना के किसी एक स्कूल के आधार पर मूल्यांकन करने की बजाय अन्तर्विषयवर्ती समीक्षा पध्दति का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग हो रहा है। हिन्दी में इस पध्दति का चलन काफी धीमी गति से हो रहा है।
हिन्दी आनुसंधान की सबसे बड़ी बाधा है उसका आलोचक और आलोचना से एकदम संबंध विच्छेद। अनुसंधान और आलोचना में किसी भी किस्म का संपर्क ,संबंध और संवाद ही नहीं है। आलोचक इस संवाद में अपनी हेटी समझता है। वह आलोचना को उत्तम कोटि का कर्म और अनुसंधान को दोयमदर्जे का कर्म मानता है। सवाल किया जाना चाहिए कि आलोचना महान कैसे हो गयी और अनुसंधान निकृष्ट कोटि का कैसे हो गया ,ये दोनों वर्गीकरण किसने किए ?


मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

बहुसांस्कृतिकवाद के खेल का मर्म


    आज बौध्दिक विमर्श से क्या गायब किया जाय और किस पर चर्चा हो इसके सुनियोजित ढंग़ से फैसले लिए जा रहे हैं ,पूरा का पूरा विमर्श नियोजित होकर रह गया है। सच यह है कि धारणाएं ऐतिहासिक प्रक्रिया में निर्मित होती हैं ,जब तक धारणाओं को पैदा करने वाली परिस्थितियां बनी रहती हैं ,उनकी जरुरत बनी रहती तब तक धारणाओं का प्रयोग भी होता रहता है। किन्तु उत्तर-आधुनिक अवस्था में तर्क की बजाय तर्कहीन ढ़ंग से ,स्वाभाविक की बजाय नियोजित विमर्श पर जोर दिया जा रहा है। सब कुछ तात्कालिक एवं क्षणिक बना दिया गया है।
           
   आज विमर्श से समाजवाद गायब है और उसकी जगह बाजारवाद ने ले ली है।योजना की जगह उदारतावाद ,राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता की जगह भूमंड़लीकरण,वर्ग की जगह सामाजिक समूह, क्रान्ति की जगह स्वैच्छिक संगठनों के आन्दोलनों, राज्य की जगह नागरिक समाज, इतरा लिंगी कामुकता की जगह गे और लेस्बियन या समलैंगिक अधिकारों ,आधुनिकता की जगह उत्तर-आधुनिकता पर चर्चाएं प्रायोजित की जा रही हैं।

    इसी तरह समांगता की जगह बहुलतावाद ,विचार की राजनीति की जगह अस्मिता की राजनीति , राष्ट्र-राज्य की जगह उप -राष्ट्रीयता ,सामान्यत्व की जगह भिन्नता एवं विविधता ,जातीय संस्कृति की जगह संस्कृति ,राष्ट्रीय एकता की जगह बहुसांस्कृतिकवाद एवं स्वीकृति की धारणाओं पर चर्चाएं हो रही हैं। आज सबसे ज्यादा संस्कृति ,विविधता,बहुलतावाद,अस्मिता की राजनीति आदि पर विमर्श हो रहा है।
   
   सत्तर के दशक में सांस्कृतिक बहुलतावाद की शुरुआत सबसे पहले कनाड़ा और आस्ट्रेलिया में हुई।बाद में अमेरिका ,ब्रिटेन और जर्मनी में हुई। इन दिनों यह फ्रांस के राजनीतिक परिदृश्य का प्रमुख एजेण्डा है।प्रसिध्द चिंतक भिखु पारीख ने लिखा कि फ्रांस जैसे राष्ट्र -राज्य के मजबूत किले में प्रभुत्व जमाना काफी महत्व रखता है। उसने नागरिकों की जातीय,सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के रुपों को जनगणना के रिकॉर्ड तक में दर्ज नहीं किया है।

   चूंकि बहु सांस्कृतिकवाद का आंदोलन विश्व के अनेक राजनीतिक संदर्भों में अनियोजित ढ़ंग से शुरु हुआ और उसने अनेक सामाजिक समूहों को आकर्षित किया।अभी तक यह आंदोलन उसूलों के बारे में सुसंगत दार्शनिक दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति नहीं कर पाया है।वह अपनी पहचान और मुख्य बिंदुओं तक पर प्रकाश नहीं ड़ाल पाया है।अत: यह जानना जरुरी है कि इसका अर्थ क्या है और सरोकार क्या हैं ? बहुसांस्कृतिकवाद को देखने का सबसे सही पैमाना न तो राजनीति है और इतिहास है बल्कि मानव जीवन को वह किस परिप्रेक्ष्य में देखता है,यह प्रधान बिंदु है। 
   
   इस प्रसंग में पहली बात यह ध्यान रहे कि मनुष्य सांस्कृतिक निर्मिति है।वह सांस्कृतिक जगत में जीता है।वह इसी सांस्कृतिक जगत से अपनी जिन्दगी और सामाजिक संबंधों को अर्थवत्ता और प्रासंगिकता प्रदान करता है।इसका यह अर्थ नहीं है कि संस्कृति से उसका निर्ध्रारणवादी रिश्ता है।बल्कि कहने मतलब यह हैकि संस्कृति उसे निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।वह उसके कुछ प्रभावों को कम कर सकता है किन्तु पूरी तरह संस्कृति से मुक्त नहीं हो सकता। 

   दूसरी बात यह कि भिन्न-भिन्न किस्म की संस्कृति में भिन्न -भिन्न किस्म की व्यवस्थाओं की अभिव्यक्ति होती है।संस्कृति जिन्दगी की बेहतरी के विज़न को व्यक्त करती है।साथ ही यह ध्यान रहे कि प्रत्येक संस्कृति मनुष्य की क्षमता एवं भावनाओं का बहुत छोटा हिस्सा ही व्यक्त करती है अत: मनुष्य को समग्रता में बेहतर ढंग से जानने के लिए अन्य संस्कृतियों की मदद लेनी पड़ती है।जिससे बेहतर ढ़ंग से विकास किया जा सके। इससे जहां एक ओर संस्कृति के शुध्दतावादी दृष्टिकोण से बचेंगे वहीं दूसरी ओर संस्कृति के कल्पना जगत का विस्तार भी कर पाएंगे। इसका यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति अपनी संस्कृति के तहत बेहतर जिन्दगी जी नहीं सकता।बल्कि इसका मतलब यह है कि यदि अन्य संस्कृति मदद लेता है तो वह ज्यादा बेहतर ढ़ंग से जी सकता है। 

    आधुनिक युग में एक ही संस्कृति में जीना असंभव है।क्योंकि यह गतिशील और स्वतंत्र जगत है। इसका यह भी अर्थ नहीं है कि सभी संस्कृतियां समृध्द हैं , सभी को एक समान सम्मान मिलता है ,सभी अपने सदस्यों की खुशहाली के लिए तत्पर हैं ,सभी समान हैं और उनकी  आलोचना नहीं हो सकती। 

    कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी संस्कृति पूरी तरह उपयोगी नहीं होती।कोई भी संस्कृति पूर्ण नहीं होती।किसी भी संस्कृति को अन्य पर आरोपित करने का हक नहीं है। प्रत्येक संस्कृति आंतरिक रुप से बहुलतामूलक होती है और उसकी परंपराओं और विचारों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है। परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि वह'कोहरेंस' और पहचान को खो दे।बल्कि पहचान तो बहुलता ,तरलता और खुलेपन को समेटे होती है। संस्कृति सचेत और अचेत संपर्क के कारण विकास करती है। इन बातों के रचनात्मक संपर्क और अंत:संबंध से बहुसांस्कृतिकवाद का परिप्रेक्ष्य बनता है।
       
    ध्यान रहे प्रत्येक संस्कृति बहुलतामूलक और भिन्नता लिए होती है। जब संस्कृतियों को किसी एक स्रोत की उपज माना जाता है या किसी एक संस्कृति विशेष को आरोपित करने की कोशिश की जाती है तो बहुलतावाद की बुनियाद ही धराशायी हो जाती है। संस्कृति का उदय स्वयं के गर्भ से होता है। वह अन्य के गर्भ से पैदा नहीं होती।किन्तु वह अन्य से प्रभाव ग्रहण करती है ,अन्य के तत्वों को आत्मसात् करती है ,बृहत्तर आर्थिक , राजनीतिक आदि कारणों से उसकी इमेज बनती है। यही वजह है कि वह किसी भी किस्म के केन्द्रीयतावाद को स्वीकार नहीं करती। क्योंकि केन्द्रीयतावाद उसके इतिहास एवं अन्य तत्वों की भूमिका को अस्वीकार करता है। 

  बहुसांस्कृतिकवाद के परिप्रेक्ष्य के अनुसार कोई भी राजनीतिक सिध्दान्त या विचारधारा मानव जीवन के पूर्ण सत्य को व्यक्त नहीं करता।प्रत्येक -उदारतावाद ,अनुदारवाद ,राष्ट्वाद, समाजवाद - बेहतर जीवन के लिए खास संस्कृति और विशिष्ट विजन को व्यक्त करता है।अत: वह अनिवार्यत: संकुचित और एकांगी होता है।
     
   भीखू पारिख का मानना है कि बहुसांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के अनुसार  समाज की बेहतरी के लिए विविधता और विभिन्न समूहों के बीच उनके नैतिक विजन को लेकर रचनात्मक संवाद  बेहद जरुरी है।मसलन् ,समाज के सदस्यों में एक दूसरे की संस्कृति का आदर करने के अधिकार के प्रति सम्मान का भाव हो साथ ही वे अपनी पसंद का विस्तार कर सकें , आत्मालोचना ,दृढता , 
   कल्पनाशीलता ,बौध्दिक और नैतिक सहानुभूति की क्षमता का विकास करे जिससे उसका विकास और भला हो। यह संभव है कि कुछ ग्रुप अन्य संस्कृति से संपर्क न रखना चाहें और अपने समूह के सीमित दायरे में जीना चाहें।हमें ऐसे समूहों की इस तरह की भावनाओं और जीवन शैली का सम्मान करना चाहिए।        
    
    बहुसांस्कृतिक समाज को स्थिर बनाने के लिए जरुरी है कि इसके नागरिकों में एक -दूसरे के प्रति लगाव हो ,किन्तु लगाव का आधार नस्ल ,धर्म , एथनिक न हो अपितु बहुसांस्कृतिक समाज के उसूलों को आधार बनाया जाय। चूंकि बहुसांस्कृतिक समाज वैविध्यपूर्ण होता है अत: इसका आधार राजनीति को बनाया जाना चाहिए ,और साझी राजनीतिक प्रतिबध्दता के आधार पर राजनीतिक समूह के रुप में पहचान बनायी जाय। क्योंकि वे ऐतिहासिक तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हैं।
   
   इस प्रसंग में कुछ पदबंधों के उदार प्रयोगों के प्रति सावधान रहने की जरुरत है। मसलन् , 'प्लूरल' ,'डाइवर्स' ,और 'मल्टीकल्चरल' पदबंधों का आमतौर पर 'बहु' के लिए उदारतापूर्वक प्रयोग किया जाता है। किन्तु इन तीनों में 'बहु' का भिन्न-भिन्न अर्थ है। इसके कारण इनका अर्थ ,अवधारणा ,आधार ,संदर्भ बदल जाता है। ये एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं हैं।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

उत्तर आधुनिक खेल की पोल


उत्तर - आधुनिकता को समझने के लिए वृध्द पूंजीवाद की सही समझ होना बेहद जरुरी है। हिन्दी के अधिकांश बुध्दिजीवी इसका अमूमन उपहास उड़ाते रहते हैं।ये ऐसे बुध्दिजीवी हैं जो अभी तक सामंती खोल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। इनका जीवन और साहित्य को लेकर सामंती रवैय्या है। ज्ञान के स्तर पर पूंजीवाद की आधी - अधूरी समझ को मुकम्मल समझ कहते हैं। पिछड़ेपन का आलम यह है कि ये अपने ज्ञान को सही और अन्य के ज्ञान को गलत मानते हैं। हर विषय पर वगैर जाने लिखना और उसे लेकर अहंकार में डूबे रहना , अपने ही हाथों अपनी पीठ ठोकना,ज्ञान के पुस्तकीय एवं शोधपरक कार्यों की उपेक्षा करना, मौलिक लेखन और मौलिक ज्ञान के नाम पर ' कॉमनसेंस ' की बातों की पुनरावृत्ति करना, संदर्भों को न बताना।   

 उत्तर - आधुनिकतावाद पदबंध की यह सीमा है कि इसकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं है। इस पर की गयी बहस किसी न किसी रुप में आधुनिकतावाद से जुड़ती है। ' 'उत्तर' का वास्तव में क्या अर्थ है इसकी संतोषजनक व्याख्या नहीं मिलती । मसलन्, 'मॉडर्न' का संबंध वर्तमान से है तो 'पोस्ट मॉडर्न' का संबंध भविष्य से होगा। इस दृष्टि से 'पोस्ट मॉडर्न' साहित्य वह होगा जिसका भविष्य से संबंध है। ब्रैन मैक हॉल ने ''पोस्ट मॉडर्निस्ट फिक्शन'' में लिखा  'पोस्ट मॉडर्न' का अर्थ है ऐसी वस्तु का संदर्भ जो मौजूद नहीं है। 


ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उत्तर-आधुनिकतावाद पर विचार करें तो पाएंगे डिक हिंगिस ने '' ए डायलेक्टिक ऑफ सेंचुरी''[1978]में अंग्रेज चित्रकार जॉन वाटकिंस कैपमैन के बारे में लिखा कि उसने सन्1870 में 'पोस्ट मॉडर्न पेंण्टिग' पदबंध का सबसे पहले प्रयोग किया। सन् 1917 में लिखित रुडोल्फ पान्नविट्ज ने '' दि क्राइसिस इन यूरोपीयन कल्चर '' में 'उत्तर- आधुनिक' पदबंध का सैन्यवादी, राष्ट्रवादी,अभिजात मूल्यों की व्याख्या के संदर्भ में प्रयोग किया। बाद में यह प्रवृत्ति फासिज्म में प्रकट हुई। 


ब्रिटिश इतिहासकार अर्नाल्ड टायन्वी ने ''ए स्टैडी ऑफ हिस्ट्री'[1947]एवं डी.सी. सॉमरवेल की कृतियों में 'उत्तर-आधुनिक' का प्रारम्भ सन् 1875 से माना गया है। जबकि अमरीकी चिन्तन में सन् 1950 के बाद इस पदबंध का प्रयोग मिलता है। बर्नार्ड रोजेनबर्ग ने 'मासकल्चर'[1957]में मास सोसायटी की व्याख्या 'उत्तर -आधुनिक' पदबंध के तहत की है। अर्थशास्त्री पीटर डुकर की एक रिपोर्ट '' दि लैण्ड मार्क्स ऑफ टुमारो ''[1957]में ' ए रिपोर्ट ऑन दि न्यू पोस्टमॉडर्न वर्ल्ड ' शीर्षक से उप अध्याय है। इसी तरह सी. ब्राईट मिल्स ने ''दि सोशियोलॉजिकल इमेजिनेशन''[1959] में बताया है कि इस युग में आधुनिक युग की जगह उत्तर -आधुनिक युग ने ले ली है। उत्तर- आधुनिक विद्वानों की राय है कि सामयिक समाज उच्च प्रौद्यौगिकी और सूचना प्रणाली के अत्याधुनिक रुपों के विकास के कारण तेजी से बदल रहा है।
   ल्योतार की कृति '' पोस्ट मॉडर्न कण्डीशंस ''[1984] में लिखा कि उत्तर - आधुनिकतावाद का तीन कारणों से वैशिष्ट्य है ,पहला- सौन्दर्यात्मक अर्थ में,यहां वह आधुनिकतावाद से संबंध तोड़ता है। यह विघटन कला ,स्थापत्य ,साहित्य ,चित्रकला में विशेष रुप से दिखाई देता है। दूसरा -कला,विज्ञान एवं तकनीकी के संदर्भ में प्रगति ,स्वतंत्रता का विस्तार , मानवतावाद आदि प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।
 ' आधुनिक' ने सार्वभौम मुक्ति की जो बात कही थी,वह आज संभव नहीं है। हमारी परिस्थितियां बिगड़ रही हैं।इसका कारण है ''तकनीकी विज्ञानों का विकास ।''यह परिस्थितियों को बिगाड़ रहा है। यह विकास हमारी परेशानियों को दूर नहीं कर रहा , बल्कि जटिलता के प्रति अस्थिर कर रहा है।यह हमारी जरूरतों और सामाजिक विकास से असंबध्द है। तीसरा- बुद्धिजीवियों की संस्थागत भूमिका का क्षय ,प्रगति एवं मुक्ति के आख्यान का क्षय ,सुरक्षित जगह और पक्ष का अभाव, प्रतिरोध की राजनीति का उदय,आलोचना और विरोध की संभावनाओं को बनाए रखने की कोशिश। उत्तर- आधुनिकों में ल्योतार की यह रिपोर्ट आप्त वाक्य के रुप में स्वीकृति प्राप्त है। यह रिपोर्ट वृद्ध पूंजीवाद की व्याख्या का गंभीर प्रयास है।
            इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें पूंजीपति वर्ग के शोषक चरित्र को छिपाया गया है। पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपति वर्ग के शोषण से कैसे मुक्ति प्राप्त करें ?पूंजीवादी व्यवस्था का कारगर विकल्प क्या है ?बुर्ज़ुआ विचारधारा का क्या विकल्प है ?आधुनिक समाज के बुनियादी अन्तर्विरोध क्या हैं ?और उन्हें कैसे हल करें इत्यादि प्रश्नों की उपेक्षा की गयी है।
    इहाव हसन ने ''दि कल्चर ऑफ पोस्ट मॉडर्निज्म''[1985]में लिखा कि साहित्य में सबसे पहले इस पदबंध का प्रयोग स्पेनिश विद्वान् फेद्रिको दे ओनिस ने किया था। उसने सन् 1930 में इर्विंग हॉव,हेरी लेविन और लेसिली फील्डर की आलोचना के प्रसंग में इस पदबंध का प्रयोग किया था। सन् 1940-50 के दौरान स्थापत्य और कविता के मूल्यांकन के क्षेत्र में उत्तर- आधुनिक दृष्टिकोण का विकास हुआ। सत्तर के दशक में संस्कृति के क्षेत्र में उत्तर-आधुनिक मानदंडों का प्रयोग हुआ।
       
उत्तर - आधुनिकता से असहमत होना संभव है। किन्तु उसके प्रभाव से बचना असंभव है। उसने हमारे रवैय्ये,एटीटयूट्स,संस्कार,जीवन शैली और दृष्टिकोण को प्रभावित किया है। उन्हें बदला है।इस क्रम में पूंजीवाद की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में छलांग लगा चुके हैं। इस छलांग के कारण रैनेसां और औद्योगिक क्रान्ति के परिप्रेक्ष्य में निर्मित विचारों की शक्ति चुकी हुई नज़र आने लगी है। आधुनिकता के सवाल बेअसर लगने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है ? आधुनिकतावादी - विमर्श  या शास्त्रीय विमर्श इसके कारणों को अभी तक उद्धाटित नहीं कर पाया है। इन परिवर्तनों के संतोषजनक उत्तर न तो आधुनिकतावादियों के पास हैं और न उत्तर- आधुनिकतावादियों के पास हैं।


कब्र से कोई नहीं लौटा नामवर जी




इसबार के दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह की चार किताबों के लोकार्पण का विज्ञापन 3-4 दिन पहले पढ़ा था , पढ़कर झटका लगा और सवाल उठा कि क्या नामवरजी को भी लोकार्पण जैसे बेहूदे कर्मकांड की जरुरत है ? क्या गुरुदेव भी साहित्यिक कर्मकांड में विश्वास करते हैं ? आखिरकार कर्मकांड पर क्यों उतर आए हैं नामवर जी ? असल समस्या यह है कि आलोचना को कब्रिस्तान तक पहुँचाने वाले नामवरजी ही हैं ,अब वह चाहते हैं कि आलोचना कब्र से लौट आए, गुरुदेव जानते हैं कब्र से कोई नहीं लौटा। अब कुछ आलोचना के वर्तमान हालात पर बातें करें।


आधुनिक हिन्दी आलोचना इन दिनों ठहराव के दौर से गुजर रही है,आलोचना में यह गतिरोध क्यों आया ? आलोचना में जब गतिरोध आता है तो उसे कैसे तोड़ा जाए ? क्या गतिरोध से मुक्ति के काम में परंपरा हमारी मदद कर सकती है ? क्या परंपरागत आलोचना के दायरे को तोड़ने की जरूरत है ? 
       आलोचना की दो पद्धतियां प्रचलन में हैं,इनमें पहली है रामविलास शर्मा की,दूसरी है नामवर सिंह की। दोनों के अंधभक्तों की कमी नहीं है। आलोचना में इसी अंधभक्ति के कारण सबसे ज्यादा समस्याएं पैदा हुई हैं। आलोचना में ठहराव अंधभक्ति और अनुकरण के कारण पैदा होता है। दूसरी ओर आलोचना पध्दति में श्रध्दा के तत्व का कोई स्थान नहीं है। आलोचना के लिए श्रद्धा की बजाय आलोचनात्मक विवेक की जरूरत होती है।

 किसी भी आलोचक की आलोचना एकांगी ढ़ंग से,वकील की शैली में नहीं की जानी चाहिए। आलोचना का अर्थ वकील की दलीलें नहीं है। आलोचक को वकील नहीं होना चाहिए। इसके अलावा आलोचना मे ठहराव आत्मगतबोध के कारण भी आता है,आलोचना को इच्छित दिशा में मोड़ना,आत्मगतता के तत्व का हावी हो जाना,आलोचना के यथार्थ से कट जाने का संकेत है।आलोचना मूलत: संवाद है,सापेक्ष संवाद है,समस्याकेन्द्रित संवाद है,पध्दतिगत संवाद है,आलोचना विनिमय है। आलोचना देती है तो लेती भी है। जो आलोचना इस दोहरी प्रक्रिया से नहीं गुजरती वह ठहराव की शिकार हो जाती है।
            यह जनतंत्र का युग है,इस युग का नायक है मनुष्य। मनुष्य और मानवतावाद इस दौर के विचारधारात्मक संघर्ष की धुरी हैं। किसी भी विचारधारा अथवा व्यवस्था की कसौटी है मानवाधिकार,पितृसत्ता और साम्राज्यवाद के प्रति उसका रुख क्या है ? नामवरजी ने इन पहलुओं पर कुछ भी नहीं लिखा। पितृसत्ता और साम्राज्यवाद की आलोचना के बिना आलोचना अप्रासंगिक है। 
         आलोचना जब एकांगी हो जाती है तो आलोचना में गतिरोध पैदा होता है,गतिरोध को तोड़ने अथवा आलोचनात्मक विकास की बुनियादी शर्त है आलोचना के सकारात्मक तत्वों की मींमासा पर जोर। मौजूदा आलोचनात्मक गतिरोध का एक अन्य कारण है अकादमिक स्तर पर आलोचना की सैध्दान्तिकी और पध्दति के पठन-पाठन,अनुसंधान की संरचनाओं और परंपरा का अभाव। इसी के गर्भ से यह भाव भी पैदा हुआ है कि कम लिखो और ज्यादा कमाओ, कम लिखो और ज्यादा कॉमनसेंस से सोचो और बोलो, हिन्दी में ज्यादा लिखने वाले को खराब और कम लिखने वाले को ज्यादा बेहतर माना जाता है।गोया ज्यादा लिखना पतन की निशानी हो !
           आलोचना में गतिरोध का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है आलोचना का वाचिक परंपरा तक सीमित रहना।अकादमिक अनुशासन,लिखित रूप में आलोचना के कम से कम प्रयास हुए हैं। आलोचना में ढर्रे पर सोचने की आदत है। आलोचना के ठहराव का एक अन्य कारण यह भी है उसमें सामान्यत: हीनताबोध है ,कुछ लोग यह मानकर चलते हैं कि गंभीर आलोचना तो फलां-फंला आलोचक ही कर सकता है, हम तो बेहतर सोच ही नहीं सकते।वहीं दूसरी ओर सोचने वाले आलोचकों की हालत इस कदर पतली है कि वे सोचते और पढ़ते कम बोलते ज्यादा हैं। अथवा दोहराते ज्यादा हैं। दोहराने वालों अथवा वाचाल किस्म के आलोचकों में आलोचनात्मक विनम्रता नहीं है,वे अन्य को कम पढ़ते हैं,जिसे पढ़ते हैं उसका नाम ,संदर्भ छिपाते हैं, अन्य की बातों को अपने नाम से,मौलिक समीक्षा के नाम से चलाते हैं । अपने लेखन में हिन्दी के अनुसंधान कार्य को उल्लेख योग्य नहीं समझते। इस सबका परिणाम है आलोचना में पैदा हुआ मौजूदा गतिरोध। नामवर जी इसके आदर्श रहे हैं।
       संभवत: हमारे स्वनाम धन्य आलोचकों को आलोचना में गतिरोध नजर ही न आए। यदि वे स्वाभाविक रूप में सोच रहे हैं कि गतिरोध नहीं है तो वे गलत हैं।सवाल किया जाना चाहिए हिन्दी में 'कविता के नए प्रतिमान' के बाद आलोचना की कोई भी उल्लेखनीय कृति क्यों नहीं आयी ?यानी चालीस साल से ज्यादा समय गुजर चुका है और आलोचना में किसी कृति का न आना उल्लेखनीय दुर्घटना ही कही जाएगी। यह बात दीगर है कि इस दौर में नामवरजी के हजारों व्याख्यान हुए हैं,आलोचना में अनेक संपादकीय लेख आए हैं, किंतु उनके द्वारा आलोचना की किसी किताब का न आना,महज संयोग नहीं है। इसी तरह रामविलास शर्मा 'निराला की साहित्य साधना' के बाद आलोचना की कोई महत्वपूर्ण किताब नहीं दे पाए। जबकि इस बीच उनकी डेढ़ दर्जन किताबें आयीं। मै यहां आलोचना की मुकम्मल किताब के संदर्भ में ध्यान खींच रहा हूँ। इस तथ्य की ओर ध्यान खीचने का अर्थ यह नहीं है कि इस बीच आलोचना में कुछ भी लिखा ही नहीं गया। लिखा गया है ढ़ेरों किताबें आई हैं , हजारों लेख छपे हैं, हमने शब्दों और तर्कों के मैदान में परास्त करने का शास्त्र रचा है,आलोचना नहीं रची है।

 आलोचना जब परास्त करने, एक-दूसरे को ओछा दिखाने, मीन-मेख निकालने,छिद्रान्वेषण करने और बदनाम करने के लिए लिखी जाती है तो उसे आलोचना नहीं कहते। नामवर सिंह के द्वारा दिए गए असंख्य साक्षात्कार और लेख धीरे-धीरे किताबी शक्ल में आने शुरू हो गए हैं।उनका संवाद और साक्षात्कार विधा के रूप में मूल्यांकन होना अभी बाकी है। क्या यह सुनियोजित आलोचना है ? आलोचना के अनुशासन को केन्द्र में रखकर लिखी गयी आलोचना है ? इस बीच में यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आलोचना किसे कहते हैं ? 
आलोचना का कोई एक रूप,प्रकार,स्कूल आदि तय करना मुश्किल है,आलोचना अनेकरूपा है। आलोचना को किसी एक स्थान,एक विचारधारा आदि में सीमित करके देखना सही नहीं होगा। हम जब आलोचना का वर्गीकरण करते हैं तो यह एक स्वाभाविक कार्य है,क्योंकि प्रत्येक किस्म की आलोचना स्वयं की संरचनाओं की भी आलोचना होती है। अच्छी आलोचना वह है जो आत्म-चेतस हो। चूंकि हिन्दी में आलोचना की आकांक्षा अभी भी बची है,बिखरे हुए रूप में आलोचना लिखी जा रही है अत: वह मौजूदा ठहराव से भी मुक्त होगी। आलोचना का स्वरूप बदलेगा। 

आलोचना का नया बदला हुआ रूप बहुत कुछ सम-सामयिक विचार,संचार तकनीक,पध्दति और इण्टरडिसिपिलनरी एप्रोच पर निर्भर है।आलोचना जितना एकांगी दायरों की कैद से मुक्त होगी वह ज्यादा जनतांत्रिक होगी। मसलन् नए दौर में आलोचना भी अपने को वर्चुअल बना चुकी है। आलोचना के वर्चुअल होने का अर्थ है आलोचना का अकेलापन। पहले आलोचना साहित्य से जुड़ी थी,साहित्य के पाठक से जुड़ी थी,आलोचक,लेखक और कृति के बीच प्रत्यक्ष संबंध था,किंतु लंबे समय से यह संबंध टूट चुका है। लेखक और आलोचक के बीच अंतराल पैदा हो गया है।
         आज स्थिति यह है कि आलोचक और लेखक दोनों में अपना अस्तित्व बनाए रखने की इच्छा तो है किंतु दोनों में एक साथ रहने,संवाद करने और एक-दूसरे से सीखने और सिखाने की आकांक्षा खत्म हो गयी है। फलत: लेखक अकेला है और आलोचक भी अकेला है। दोनों में अलगाव पैदा हो गया है। अब ये दोनों एक-दूसरे से सिर्फ प्रशंसा चाहते हैं,आलोचना नहीं चाहते। आलोचना रचना का स्पर्श करके निकल जाती है जिसे हम पुस्तक समीक्षा के नाम से जानते है।पुस्तक समीक्षा आलोचना का स्पर्श है,आलोचना नहीं है। रचना से बड़ा लेखक का अहं हो गया है। लेखक आलोचक की कंपनी पसंद करता है किंतु आलोचना पसंद नहीं करता,आलोचना करते ही नाराज हो जाता है। आलोचना वह है जिसमें विश्लेषण हो,व्याख्या हो,गहराई में जाकर विवेचन किया गया हो,शब्दों के बाहुल्य या शब्दों के अभाव को आलोचना नहीं कहते। रचना के मर्म का उद्धाटन किया जाय। आलोचना का काम यह भी है कि वह रचना को उसके व्यक्त लक्ष्य के परे ले जाय,पाठक को अनुशासित करने की बजाय खास किस्म की गतिविधि के लिए प्रेरित करे। आलोचना का बुनियादी कार्य है प्रतिरोध करना और धर्मनिरपेक्ष बनाना।जो आलोचना कठमुल्लापन अथवा पोंगापंथीभाव पैदा करती है उसे आलोचना नहीं कहते। आलोचना को जनतंत्र चाहिए। आलोचना और जनतंत्र की प्रक्रियाओं के गर्भ से धर्मनिरेक्ष समीक्षा विमर्श पैदा होता है। हिन्दी आलोचना में पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष का अभाव। नामवर सिंह साक्षात प्रमाण हैं उन्होंने कभी पितृसत्ता के खिलाफ नहीं लिखा।