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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

आधुनिककाल का सार्वजनिक वातावरण


आधुनिकाल के आगमन के साथ विभिन्न किस्म के विनिमय रूपों का व्यापक विकास हुआ। परिवारों के बीच में विनिमय। वस्तुओं का विनिमय। वफादारी,आज्ञाकारिता और करवसूली आदि प्रशासन की नीतियों के परिणाम थे। राज्य और जनता के बीच में भी व्यापक विनिमय की प्रक्रिया शुरू हुई। एकल परिवार अच्छा परिवार था, सकारात्मक कदम था, किंतु भारत में इसका असमान ढ़ंग से विकास हुआ। एकल परिवार को हिन्दी क्षेत्र में आजादी के बाद ही विकास का मौका मिला। उसे संदेह और घृणा की नजर से देखा गया। सार्वजनिक व्यवस्था राज्य नियंत्रित थी । इसके विपरीत निजी व्यवस्था और निजी वातावरण का नियंत्रण राज्य नहीं करता था। निजी वातावरण और निजता का नियंत्रण पुराने मूल्यों के हवाले था। निजता पर प्राचीनता हावी थी। बड़ा ही सुंदर दायित्व विभाजन आजादी पूर्व के दौर में मिलता है सार्वजनिक वातावरण आधुनिक सत्ताा की शक्तियों के जिम्मे था तो निजी वातावरण प्राचीनतापंथियों के जिम्मे था। यह सार्वजनिक और निजी का 'व्यवस्था' के स्तर पर किया गया विभाजन था।
     नए उपभोक्तावर्ग का उदय हुआ। पहलीबार औरतों के निजी और सार्वजनिक वातावरण के बारे में विस्तार के साथ आमजीवन में बहस शुरू हुई। मध्यकाल में औरतों के सार्वजनिक और निजी में भेद नहीं था। उसे लेकर बहस भी नहीं थी। रैनेसां में औरतों की सामाजिक शिरकत को लेकर बहस शुरू हुई, औरतों के सवालों को सार्वजनिक तौर पर उठाया गया। मजदूरवर्ग का उदय हुआ। मजदूरवर्ग की भूमिका परिभाषित की गई। निजी अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक अर्थव्यवस्था में अंतर किया गया। मजदूरवर्ग के उदय का अर्थ है मर्दानगी के नए युग का उदय।मर्दानगी पहले घरेलू जीवन में वर्चस्व बनाए हुए थी अब यह मजदूरवर्ग और पूंजीपतिवर्ग के रूप में सार्वजनिक जीवन में वर्चस्व बनाए हुए है। पूंजीवादी व्यवस्था मजदूरवर्ग को आर्थिक और सांस्कृतिक तौर पर पामाल करती है।  मनोवैज्ञानिक तबाही लेकर आती है।
             
        मजदूरवर्ग की मर्दानगी के कारण औरतों को श्रम के लिए समान वेतन और सुविधाएं नहीं मिलीं। सहयोगी कार्यों के तौर पर औरतों के श्रम को देखा गया। औरतों के कार्य का स्त्रीकरण किया गया और स्त्री के काम को सेवाक्षेत्र के रूप में देखा गया। स्त्रीसेवा कार्यों  में सचिव,घरेलू नौकरानी, सेल्सगर्ल, वेश्या,हाल ही में हवाई यात्राओं और दूरसंचार के क्षेत्र में भी औरत को देख सकते हैं।

        साथ ही औरतों के सहयोगीकर्म के रूप में स्त्री के मातृत्ववाले गुणों से जुड़े कार्यों को रखा गया। जैसे नर्स,सामाजिक कार्यकर्त्ता, आया, प्राइमरी स्कूल शिक्षिका आदि। औरतों के उत्पीड़न के भी क्षेत्र तय रहे हैं जैसे शारीरिक उत्पीडन, कम मजदूरी, कम कौशल का काम,पार्टटाइम नौकरानी, दो शिफ्टों में काम करने वाले मजदूर ,दोनों शिफ्टों में काम करने वालों में बंधुआ घरेलू नौकर, वेतनभोगी घरेलू नौकर दोनों ही शामिल हैं। मजदूरों में मजदूरनी को दोयमदर्जा दिया गया। इसके अलावा लिंगाधारित कार्यक्षेत्र आ गए जिनमें कामकाजी माँ, कामकाजी पत्नी आदि पदबंधों का प्रयोग चल निकला इन पदबंधों का अर्थ है कि जो औरत काम कर रही है वह प्राथमिकतौर पर मॉ है और कमाई के लिए घर से बाहर निकली है। जिससे पूरक के रूप में कुछ कमाई कर सके। ये सारी चीजें मिलकर आजादी के पहले का सार्वजनिक वातावरण  बनाती हैं।     
    आजादी के बाद भारत विभाजन,साम्प्रदायिक हिंसाचार, लाखों लोगों का कत्ल। लोकतंत्र का आगमन। लोकतांत्रिक संरचनाओं का निर्माण। लोकतांत्रिक मूल्यों,नियमों आदि के प्रति वचनवध्दता। नए वर्ग के तौर पर क्षेत्रीय पूंजीपतिवर्ग का उदय, ठेकेदार, इंजीनियर, डाक्टर,राजनीतिज्ञ आदि पेशेवर तबकों का उदय और विस्तार। संरचनाओं में नए और पुराने का द्वंद्व। न्यायपालिका और कार्यपालिका में पुराने मूल्यों और रूढियों के प्रति गहरी आस्था, संविधान में पर्सनल लॉ के रूप में 750 से ज्यादा समुदायों के निजी कानूनों का बने रहना।  सामाजिक जीवन में पुराने मूल्यों,रीति-रिवाजों,मान्यताओं आदि को संविधान के द्वारा खुला संरक्षण। इसका समूचे सार्वजनिक और निजी जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ा। संविधान में पितृसत्ता और मर्दानगी को सर्वोच्च दर्जा और उसका महिमामंडन किया गया। इसने सार्वजनिक और निजी को नए सिरे से नियमित किया और निजता को विकसित ही नहीं होने दिया। निजता का व्यापक विकास तब ही हो पाया जब हम भूमंडलीकरण के दौर में दाखिल होते हैं। सार्वजनिक वातावरण के नाम उपभोक्तावादी वातावरण बनाने पर ज्यादा जोर दिया गया इसके कारण पितृसत्ता को नयी ऊर्जा मिली।
       

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

उत्तर आधुनिक खेल की पोल


उत्तर - आधुनिकता को समझने के लिए वृध्द पूंजीवाद की सही समझ होना बेहद जरुरी है। हिन्दी के अधिकांश बुध्दिजीवी इसका अमूमन उपहास उड़ाते रहते हैं।ये ऐसे बुध्दिजीवी हैं जो अभी तक सामंती खोल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। इनका जीवन और साहित्य को लेकर सामंती रवैय्या है। ज्ञान के स्तर पर पूंजीवाद की आधी - अधूरी समझ को मुकम्मल समझ कहते हैं। पिछड़ेपन का आलम यह है कि ये अपने ज्ञान को सही और अन्य के ज्ञान को गलत मानते हैं। हर विषय पर वगैर जाने लिखना और उसे लेकर अहंकार में डूबे रहना , अपने ही हाथों अपनी पीठ ठोकना,ज्ञान के पुस्तकीय एवं शोधपरक कार्यों की उपेक्षा करना, मौलिक लेखन और मौलिक ज्ञान के नाम पर ' कॉमनसेंस ' की बातों की पुनरावृत्ति करना, संदर्भों को न बताना।   

 उत्तर - आधुनिकतावाद पदबंध की यह सीमा है कि इसकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं है। इस पर की गयी बहस किसी न किसी रुप में आधुनिकतावाद से जुड़ती है। ' 'उत्तर' का वास्तव में क्या अर्थ है इसकी संतोषजनक व्याख्या नहीं मिलती । मसलन्, 'मॉडर्न' का संबंध वर्तमान से है तो 'पोस्ट मॉडर्न' का संबंध भविष्य से होगा। इस दृष्टि से 'पोस्ट मॉडर्न' साहित्य वह होगा जिसका भविष्य से संबंध है। ब्रैन मैक हॉल ने ''पोस्ट मॉडर्निस्ट फिक्शन'' में लिखा  'पोस्ट मॉडर्न' का अर्थ है ऐसी वस्तु का संदर्भ जो मौजूद नहीं है। 


ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उत्तर-आधुनिकतावाद पर विचार करें तो पाएंगे डिक हिंगिस ने '' ए डायलेक्टिक ऑफ सेंचुरी''[1978]में अंग्रेज चित्रकार जॉन वाटकिंस कैपमैन के बारे में लिखा कि उसने सन्1870 में 'पोस्ट मॉडर्न पेंण्टिग' पदबंध का सबसे पहले प्रयोग किया। सन् 1917 में लिखित रुडोल्फ पान्नविट्ज ने '' दि क्राइसिस इन यूरोपीयन कल्चर '' में 'उत्तर- आधुनिक' पदबंध का सैन्यवादी, राष्ट्रवादी,अभिजात मूल्यों की व्याख्या के संदर्भ में प्रयोग किया। बाद में यह प्रवृत्ति फासिज्म में प्रकट हुई। 


ब्रिटिश इतिहासकार अर्नाल्ड टायन्वी ने ''ए स्टैडी ऑफ हिस्ट्री'[1947]एवं डी.सी. सॉमरवेल की कृतियों में 'उत्तर-आधुनिक' का प्रारम्भ सन् 1875 से माना गया है। जबकि अमरीकी चिन्तन में सन् 1950 के बाद इस पदबंध का प्रयोग मिलता है। बर्नार्ड रोजेनबर्ग ने 'मासकल्चर'[1957]में मास सोसायटी की व्याख्या 'उत्तर -आधुनिक' पदबंध के तहत की है। अर्थशास्त्री पीटर डुकर की एक रिपोर्ट '' दि लैण्ड मार्क्स ऑफ टुमारो ''[1957]में ' ए रिपोर्ट ऑन दि न्यू पोस्टमॉडर्न वर्ल्ड ' शीर्षक से उप अध्याय है। इसी तरह सी. ब्राईट मिल्स ने ''दि सोशियोलॉजिकल इमेजिनेशन''[1959] में बताया है कि इस युग में आधुनिक युग की जगह उत्तर -आधुनिक युग ने ले ली है। उत्तर- आधुनिक विद्वानों की राय है कि सामयिक समाज उच्च प्रौद्यौगिकी और सूचना प्रणाली के अत्याधुनिक रुपों के विकास के कारण तेजी से बदल रहा है।
   ल्योतार की कृति '' पोस्ट मॉडर्न कण्डीशंस ''[1984] में लिखा कि उत्तर - आधुनिकतावाद का तीन कारणों से वैशिष्ट्य है ,पहला- सौन्दर्यात्मक अर्थ में,यहां वह आधुनिकतावाद से संबंध तोड़ता है। यह विघटन कला ,स्थापत्य ,साहित्य ,चित्रकला में विशेष रुप से दिखाई देता है। दूसरा -कला,विज्ञान एवं तकनीकी के संदर्भ में प्रगति ,स्वतंत्रता का विस्तार , मानवतावाद आदि प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।
 ' आधुनिक' ने सार्वभौम मुक्ति की जो बात कही थी,वह आज संभव नहीं है। हमारी परिस्थितियां बिगड़ रही हैं।इसका कारण है ''तकनीकी विज्ञानों का विकास ।''यह परिस्थितियों को बिगाड़ रहा है। यह विकास हमारी परेशानियों को दूर नहीं कर रहा , बल्कि जटिलता के प्रति अस्थिर कर रहा है।यह हमारी जरूरतों और सामाजिक विकास से असंबध्द है। तीसरा- बुद्धिजीवियों की संस्थागत भूमिका का क्षय ,प्रगति एवं मुक्ति के आख्यान का क्षय ,सुरक्षित जगह और पक्ष का अभाव, प्रतिरोध की राजनीति का उदय,आलोचना और विरोध की संभावनाओं को बनाए रखने की कोशिश। उत्तर- आधुनिकों में ल्योतार की यह रिपोर्ट आप्त वाक्य के रुप में स्वीकृति प्राप्त है। यह रिपोर्ट वृद्ध पूंजीवाद की व्याख्या का गंभीर प्रयास है।
            इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें पूंजीपति वर्ग के शोषक चरित्र को छिपाया गया है। पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपति वर्ग के शोषण से कैसे मुक्ति प्राप्त करें ?पूंजीवादी व्यवस्था का कारगर विकल्प क्या है ?बुर्ज़ुआ विचारधारा का क्या विकल्प है ?आधुनिक समाज के बुनियादी अन्तर्विरोध क्या हैं ?और उन्हें कैसे हल करें इत्यादि प्रश्नों की उपेक्षा की गयी है।
    इहाव हसन ने ''दि कल्चर ऑफ पोस्ट मॉडर्निज्म''[1985]में लिखा कि साहित्य में सबसे पहले इस पदबंध का प्रयोग स्पेनिश विद्वान् फेद्रिको दे ओनिस ने किया था। उसने सन् 1930 में इर्विंग हॉव,हेरी लेविन और लेसिली फील्डर की आलोचना के प्रसंग में इस पदबंध का प्रयोग किया था। सन् 1940-50 के दौरान स्थापत्य और कविता के मूल्यांकन के क्षेत्र में उत्तर- आधुनिक दृष्टिकोण का विकास हुआ। सत्तर के दशक में संस्कृति के क्षेत्र में उत्तर-आधुनिक मानदंडों का प्रयोग हुआ।
       
उत्तर - आधुनिकता से असहमत होना संभव है। किन्तु उसके प्रभाव से बचना असंभव है। उसने हमारे रवैय्ये,एटीटयूट्स,संस्कार,जीवन शैली और दृष्टिकोण को प्रभावित किया है। उन्हें बदला है।इस क्रम में पूंजीवाद की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में छलांग लगा चुके हैं। इस छलांग के कारण रैनेसां और औद्योगिक क्रान्ति के परिप्रेक्ष्य में निर्मित विचारों की शक्ति चुकी हुई नज़र आने लगी है। आधुनिकता के सवाल बेअसर लगने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है ? आधुनिकतावादी - विमर्श  या शास्त्रीय विमर्श इसके कारणों को अभी तक उद्धाटित नहीं कर पाया है। इन परिवर्तनों के संतोषजनक उत्तर न तो आधुनिकतावादियों के पास हैं और न उत्तर- आधुनिकतावादियों के पास हैं।