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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य, मासकल्चर और साहित्य

        हिन्दी साहित्य में नए मूल्यों और मान्यताओं के प्रति संदेह,हिकारत और अस्वीकार का भाव बार-बार व्यक्त हुआ है। इसका आदर्श नमूना है परिवार के विखंडन खासकर संयुक्त परिवार के टूटने पर असंतोष का इजहार। एकल परिवार को अधिकांश आलोचकों के द्वारा सकारात्मक नजरिए से न देख पाना। सार्वजनिक और निजी जीवन में 'तर्क' की बजाय 'अतर्क' के प्रति समर्पण और महिमामंडन। आजादी के बाद की आलोचना की केन्द्रीय कमजोरी है कल्याणकारी राज्य की सही समझ का अभाव। सार्वजनिक और निजी के रूपान्तरण की प्रक्रियाओं का अज्ञान। सच यह है कि कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की सांस्कृतिक भूमिका के बारे में हमने कभी विचार नहीं किया गया। उलटे कल्याणकारी राज्य का महिमामंडन किया। अथवा उसे एकसिरे से खारिज किया।

            प्रशंसा और खारिज करना ये दोनों ही अतिवादी नजरिए की देन हैं। इनका सही समझ के साथ कोई संबंध नहीं है। कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य का अर्थ सब्सीडी, राहत उपायों  अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों का निर्माण करना ही नहीं है। अपितु कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी भी पैदा करता है। कल्याणकारी राज्य ने दो बड़े क्षेत्रों के चित्रण पर जोर दिया पहला-परिवार,इसमें भी मध्यवर्गीय परिवार पर जोर रहा है, चित्रण का दूसरा क्षेत्र है राजसत्ता और बाजार । स्वातंत्र्योत्तर अधिकांश साहित्य इन दो क्षेत्रों का ही चित्रण करता है। 
   
सवाल उठता है कल्याणकारी राज्य हो और आंतरिक गुलामी न हो ? कल्याणकारी राज्य के परिप्रेक्ष्य में साहित्य के प्रति क्या नजरिया होना चाहिए ? साहित्य को प्रदर्शन की चीज बनाया जाए, अथवा आलोचनात्मक वातावरण बनाने का औजार बनाया जाए ? कल्याणकारी राज्य में 'सार्वजनिक' और 'निजी' स्पेयर या वातावरण का क्या रूप होता है ? इसके दौरान किस तरह का साहित्य लिखा जाता है ? किस तरह के मुद्दे बहस के केन्द्र में आते हैं ? साहित्य की धारणा,भूमिका और प्रभाव की प्रक्रिया में किस तरह के परिवर्तन आते हैं ?
     कल्याणकारी राज्य साहित्य को 'सेलीबरेटी',प्रदर्शन,नजारे,तमाशे,बहस आदि की केटेगरी में पहुँचा देता है, कृति और साहित्यकार को सैलीबरेटी बना देता है। अब साहित्य और साहित्यकार के प्रदर्शन और सार्वजनिक वक्तव्य का महत्व होता है किंतु उसका कोई असर नहीं होता।

लेखक का बयान अथवा कृति को साहित्येतिहास का हिस्सा माना जाता है। उसका सामाजिक -राजनीतिक तौर पर गंभीर असर नहीं होता, लेखक की जनप्रियता बढ़ जाती है। किंतु सामाजिक संरचनाओं पर उसका प्रभाव नहीं होता। साहित्य और लेखक अप्रभावी घटक बनकर रह जाता है। लिखे का सामाजिक रूपान्तरण नहीं हो पाता।

आप लिखे पर बहस कर सकते हैं किंतु भौतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में उसे रूपान्तरित नहीं कर सकते। अब साहित्य और साहित्यकार दिखाऊ माल बनकर रह जाते हैं। आलोचना का उपयोगितावाद के साथ चोली-दामन का संबंध बन जाता है। अब साहित्यालोचना उपयोगिता के नजरिए से लिखी जाती है,आलोचकगण सामयिक मंचीय जरूरतों के लिहाज से बयान देते हैं। यह एक तरह का साहित्यिक प्रमोशन है। साहित्य प्रमोशन और तद्जनित आलोचना का मासकल्चर के प्रसार के साथ गहरा संबंध है। मासकल्चर का प्रसार जितना होगा साहित्य में प्रायोजित आलोचना का उतना ही प्रचार होगा। प्रायोजित आलोचना मासकल्चर की संतान है।
                 
                भारत में कल्याणकारी राज्य का उदय साम्राज्यवाद के साथ आंतरिक अन्तर्विरोधों के गर्भ से हुआ । राज्य और जनता के संबंधों के बीच में गहरी गुत्थमगुत्था चल रही थी और सार्वजनिक और निजी में तनाव था, राज्य और जनता के बीच पैदा हुए संकट के 'प्रबंधन' तंत्र के रूप में कल्याणकारी राज्य का उदय हुआ। इस संकट के समाधानों को उपभोग और बाजार के तर्कों के बहाने हल करने की कोशिश की। उपभोग और बाजार की प्रबंधन में केन्द्रीय भूमिका रही है। संकट के प्रबंधन की इस पध्दति का लक्ष्य था राज्य निर्देशित सार्वजनिक वातावरण तैयार करना,सार्वजनिक क्षेत्र खड़ा करना, आमजनता को संकट से बचाने के लिए राहत देना, कल्याणकारी राहतों के तौर पर मजदूर संगठनों और सामाजिक आन्दोलनों को राहत देना।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

उत्तर आधुनिक खेल की पोल


उत्तर - आधुनिकता को समझने के लिए वृध्द पूंजीवाद की सही समझ होना बेहद जरुरी है। हिन्दी के अधिकांश बुध्दिजीवी इसका अमूमन उपहास उड़ाते रहते हैं।ये ऐसे बुध्दिजीवी हैं जो अभी तक सामंती खोल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। इनका जीवन और साहित्य को लेकर सामंती रवैय्या है। ज्ञान के स्तर पर पूंजीवाद की आधी - अधूरी समझ को मुकम्मल समझ कहते हैं। पिछड़ेपन का आलम यह है कि ये अपने ज्ञान को सही और अन्य के ज्ञान को गलत मानते हैं। हर विषय पर वगैर जाने लिखना और उसे लेकर अहंकार में डूबे रहना , अपने ही हाथों अपनी पीठ ठोकना,ज्ञान के पुस्तकीय एवं शोधपरक कार्यों की उपेक्षा करना, मौलिक लेखन और मौलिक ज्ञान के नाम पर ' कॉमनसेंस ' की बातों की पुनरावृत्ति करना, संदर्भों को न बताना।   

 उत्तर - आधुनिकतावाद पदबंध की यह सीमा है कि इसकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं है। इस पर की गयी बहस किसी न किसी रुप में आधुनिकतावाद से जुड़ती है। ' 'उत्तर' का वास्तव में क्या अर्थ है इसकी संतोषजनक व्याख्या नहीं मिलती । मसलन्, 'मॉडर्न' का संबंध वर्तमान से है तो 'पोस्ट मॉडर्न' का संबंध भविष्य से होगा। इस दृष्टि से 'पोस्ट मॉडर्न' साहित्य वह होगा जिसका भविष्य से संबंध है। ब्रैन मैक हॉल ने ''पोस्ट मॉडर्निस्ट फिक्शन'' में लिखा  'पोस्ट मॉडर्न' का अर्थ है ऐसी वस्तु का संदर्भ जो मौजूद नहीं है। 


ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उत्तर-आधुनिकतावाद पर विचार करें तो पाएंगे डिक हिंगिस ने '' ए डायलेक्टिक ऑफ सेंचुरी''[1978]में अंग्रेज चित्रकार जॉन वाटकिंस कैपमैन के बारे में लिखा कि उसने सन्1870 में 'पोस्ट मॉडर्न पेंण्टिग' पदबंध का सबसे पहले प्रयोग किया। सन् 1917 में लिखित रुडोल्फ पान्नविट्ज ने '' दि क्राइसिस इन यूरोपीयन कल्चर '' में 'उत्तर- आधुनिक' पदबंध का सैन्यवादी, राष्ट्रवादी,अभिजात मूल्यों की व्याख्या के संदर्भ में प्रयोग किया। बाद में यह प्रवृत्ति फासिज्म में प्रकट हुई। 


ब्रिटिश इतिहासकार अर्नाल्ड टायन्वी ने ''ए स्टैडी ऑफ हिस्ट्री'[1947]एवं डी.सी. सॉमरवेल की कृतियों में 'उत्तर-आधुनिक' का प्रारम्भ सन् 1875 से माना गया है। जबकि अमरीकी चिन्तन में सन् 1950 के बाद इस पदबंध का प्रयोग मिलता है। बर्नार्ड रोजेनबर्ग ने 'मासकल्चर'[1957]में मास सोसायटी की व्याख्या 'उत्तर -आधुनिक' पदबंध के तहत की है। अर्थशास्त्री पीटर डुकर की एक रिपोर्ट '' दि लैण्ड मार्क्स ऑफ टुमारो ''[1957]में ' ए रिपोर्ट ऑन दि न्यू पोस्टमॉडर्न वर्ल्ड ' शीर्षक से उप अध्याय है। इसी तरह सी. ब्राईट मिल्स ने ''दि सोशियोलॉजिकल इमेजिनेशन''[1959] में बताया है कि इस युग में आधुनिक युग की जगह उत्तर -आधुनिक युग ने ले ली है। उत्तर- आधुनिक विद्वानों की राय है कि सामयिक समाज उच्च प्रौद्यौगिकी और सूचना प्रणाली के अत्याधुनिक रुपों के विकास के कारण तेजी से बदल रहा है।
   ल्योतार की कृति '' पोस्ट मॉडर्न कण्डीशंस ''[1984] में लिखा कि उत्तर - आधुनिकतावाद का तीन कारणों से वैशिष्ट्य है ,पहला- सौन्दर्यात्मक अर्थ में,यहां वह आधुनिकतावाद से संबंध तोड़ता है। यह विघटन कला ,स्थापत्य ,साहित्य ,चित्रकला में विशेष रुप से दिखाई देता है। दूसरा -कला,विज्ञान एवं तकनीकी के संदर्भ में प्रगति ,स्वतंत्रता का विस्तार , मानवतावाद आदि प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।
 ' आधुनिक' ने सार्वभौम मुक्ति की जो बात कही थी,वह आज संभव नहीं है। हमारी परिस्थितियां बिगड़ रही हैं।इसका कारण है ''तकनीकी विज्ञानों का विकास ।''यह परिस्थितियों को बिगाड़ रहा है। यह विकास हमारी परेशानियों को दूर नहीं कर रहा , बल्कि जटिलता के प्रति अस्थिर कर रहा है।यह हमारी जरूरतों और सामाजिक विकास से असंबध्द है। तीसरा- बुद्धिजीवियों की संस्थागत भूमिका का क्षय ,प्रगति एवं मुक्ति के आख्यान का क्षय ,सुरक्षित जगह और पक्ष का अभाव, प्रतिरोध की राजनीति का उदय,आलोचना और विरोध की संभावनाओं को बनाए रखने की कोशिश। उत्तर- आधुनिकों में ल्योतार की यह रिपोर्ट आप्त वाक्य के रुप में स्वीकृति प्राप्त है। यह रिपोर्ट वृद्ध पूंजीवाद की व्याख्या का गंभीर प्रयास है।
            इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें पूंजीपति वर्ग के शोषक चरित्र को छिपाया गया है। पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपति वर्ग के शोषण से कैसे मुक्ति प्राप्त करें ?पूंजीवादी व्यवस्था का कारगर विकल्प क्या है ?बुर्ज़ुआ विचारधारा का क्या विकल्प है ?आधुनिक समाज के बुनियादी अन्तर्विरोध क्या हैं ?और उन्हें कैसे हल करें इत्यादि प्रश्नों की उपेक्षा की गयी है।
    इहाव हसन ने ''दि कल्चर ऑफ पोस्ट मॉडर्निज्म''[1985]में लिखा कि साहित्य में सबसे पहले इस पदबंध का प्रयोग स्पेनिश विद्वान् फेद्रिको दे ओनिस ने किया था। उसने सन् 1930 में इर्विंग हॉव,हेरी लेविन और लेसिली फील्डर की आलोचना के प्रसंग में इस पदबंध का प्रयोग किया था। सन् 1940-50 के दौरान स्थापत्य और कविता के मूल्यांकन के क्षेत्र में उत्तर- आधुनिक दृष्टिकोण का विकास हुआ। सत्तर के दशक में संस्कृति के क्षेत्र में उत्तर-आधुनिक मानदंडों का प्रयोग हुआ।
       
उत्तर - आधुनिकता से असहमत होना संभव है। किन्तु उसके प्रभाव से बचना असंभव है। उसने हमारे रवैय्ये,एटीटयूट्स,संस्कार,जीवन शैली और दृष्टिकोण को प्रभावित किया है। उन्हें बदला है।इस क्रम में पूंजीवाद की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में छलांग लगा चुके हैं। इस छलांग के कारण रैनेसां और औद्योगिक क्रान्ति के परिप्रेक्ष्य में निर्मित विचारों की शक्ति चुकी हुई नज़र आने लगी है। आधुनिकता के सवाल बेअसर लगने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है ? आधुनिकतावादी - विमर्श  या शास्त्रीय विमर्श इसके कारणों को अभी तक उद्धाटित नहीं कर पाया है। इन परिवर्तनों के संतोषजनक उत्तर न तो आधुनिकतावादियों के पास हैं और न उत्तर- आधुनिकतावादियों के पास हैं।