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मंगलवार, 27 जुलाई 2010

मीडियायुग में किताब को जिंदा रखो

       स्त्री और पुरूष दोनों किस्म के लेखन में संरक्षक का बड़ा महत्व है। वर्जीनिया वुल्फ ने संरक्षक के सवाल पर विचार करते हुए लिखा है कि आम तौर पर स्त्री पुरूष दोनों ही अव्यावहारिक सलाह के आधार पर लिखते हैं। सलाह देने वाले यह सोचते ही नहीं हैं कि उनके दिमाग में क्या है। लेखक चाहे या न चाहे वे अपनी सलाह दे देते हैं।
      लेखक को अपना आश्रयदाता,संरक्षक,सलाहकार सावधानी के साथ चुनना चाहिए। लेखक को लिखना होता है जिसे अन्य कोई पढ़ता है। आश्रयदाता आपको सिर्फ पैसा ही नहीं देता बल्कि यह भी बताता है कि क्या लिखो,इसकी प्रच्छन्न रूप में सलाह या प्रेरणा भी देता है। अत: आश्रयदाता या संरक्षक ऐसा व्यक्ति हो जिसे आप पसंद करते हों।लोग जिसे पसंद करें।यह पसंदीदा व्यक्ति कौन होगा ? कैसा होगा ?
       प्रत्येक काल में पसंदीदा व्यक्ति की अवधारणा बदलती रही है। मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक लेखक के आश्रयदाता और पसंदीदा व्यक्ति का विवेचन करने के बाद वर्जीनिया वुल्फ ने लिखा है प्रत्येक लेखक की अपनी जनता होती है। अपना पाठकवर्ग होता है। यह पाठकवर्ग आज्ञाकारी की तरह अपने लेखक का अनुसरण करता है। उसकी रचनाएं पढ़ता है।लेखक अपनी जनता के प्रति सजग भी रहता है। उससे ज्यादा श्रेष्ठ बने रहने की कोशिश भी करता है। लेखक की अपनी जनता में जनप्रियता अपने लेखन के कारण होती है। क्योंकि लेखन ही संप्रेषण है।
          आधुनिक लेखक का संरक्षक उसका पाठकवर्ग है,जनता है।आधुनिक काल में पत्रकारिता का लेखक पर दबाव होता है कि वह प्रेस में लिखे,पत्रकारिता पूरी कोशिश करती है कि किताब में लिखना बेकार है, कोई नहीं पढ़ता,अत: प्रेस में लिखो। वुल्फ ने लिखा है कि इस धारणा को चुनौती दी जानी चाहिए। किताब को हर हालत में जिन्दा रखा जाना चाहिए।किताब को पत्रकारिता के सामने जिन्दा रखने के लिए जरूरी है कि उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए।
      हमें ऐसे संरक्षक की खोज करनी चाहिए जो पढ़ने वालों तक पुस्तक ले जा सके। हमें किताब के साथ खेलने वालों की नहीं पढ़ने वालों की जरूरत है। ऐसा साहित्य लिखा जाए जो अन्य युग के साहित्य को निर्देशित कर सके,अन्य जाति के लोगों को आदेश दे सके।लेखक को अपने संरक्षक का चुनाव करना चाहिए,यह उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि उसे कैसे चुना जाए ? कैसे अच्छा लिखा जाए ? वर्जीनिया वुल्फ ने सवाल उठाया है कि हमारे साहित्य में स्त्री का चेहरा तो आता है।किन्तु उसकी इच्छाएं नहीं आतीं। उसके भाव नहीं आते। उसके प्रति सबके मन में सहानुभूति है,वह सब जगह दिखाई भी देती है। किन्तु उसकी इच्छाएं कहीं भी नजर नहीं आतीं।
         वुल्फ कहती है पुस्तक कैसे पढ़ें इसके बारे में कोई भी निर्देश नहीं दिए जा सकते। प्रत्येक पाठक को जैसे उचित लगे पढ़ना चाहिए। उसे अपने तर्क का इस्तेमाल करना चाहिए और अपने निष्कर्ष निकालने चाहिए। हमें स्वतंत्रता का प्रयोग करना चाहिए। किन्तु कहीं ऐसा न हो कि इसका दुरूपयोग होने लगे। पाठक की शक्ति का सही इस्तेमाल करने के लिए उसके प्रशिक्षण की भी जरूरत है।
     पुस्तक पढ़ते समय यह ध्यान रखा जाए कि हम कहां से शुरूआत करते हैं ? हम पाठ में व्याप्त अव्यवस्था में कैसे व्यवस्था पैदा करते हैं, उसे कैसे एक अनुशासन में बांधकर पढ़ते हैं। जिससे उसमें गंभीरता से आनंद लिया जा सके। पुस्तक पढते समय हमें विधाओं में प्रचलित मान्यताओं का त्याग करके पढ़ना चाहिए।
     मसलन् लोग मानते हैं कि कहानी सत्य होती है। कविता छद्म होती है। जीवनी में चाटुकारिता होती है, इतिहास में पूर्वाग्रह होते हैं। हमें इस तरह की पूर्व धारणाओं को त्यागकर साहित्य पढ़ना चाहिए। आप अपने लेखक को निर्देश या आदेश न दें। बल्कि उसे खोजने की कोशिश करें। लेखक जैसा बनने की कोशिश करें। उसके सहयात्री बनें। यदि आप पहले से ही किसी लेखक की आलोचना करेंगे तो उसकी कृति का आनंद नहीं ले पाएंगे। यदि खुले दिमाग और व्यापक परिप्रेक्ष्य में कृति को पढ़ने की कोशिश करेंगे तो कृति में निहित श्रेष्ठ अंश को खोज पाएंगे।
       निबंध विधा के बारे में वर्जीनिया वुल्फ का मानना था निबंध छोटा भी हो सकता है और लंबा भी।गंभीर भी हो सकता है और अगंभीर भी। वह पाठक को आनंद देता है। वह किसी भी विषय पर हो सकता है। निबंध का अंतिम लक्ष्य है पाठक को आनंद देना। निबंध को पानी और शराब की तरह शुध्द होना चाहिए। अपवित्रता का वहां कोई स्थान नहीं है।निबंध में सत्य को एकदम नग्न यथार्थ की तरह आना चाहिए।सत्य ही निबंध को प्रामाणिक बनाता है।उसको सीमित दायरे से बाहर ले जाता है।सघन बनाता है।विक्टोरियन युग में लेखक लंबे निबंध लिखते थे ? उस समय पाठक के पास समय था।वह आराम से बैठकर लंबे निबंध पढ़ता था। लंबे समय से निबंध के स्वरूप में बदलाव आता रहा है। इसके बावजूद निबंध जिन्दा है। अपना विकास कर रहा है।वुल्फ का मानना था कि निबंध सबसे सटीक और खतरनाक उपकरण है।इसमें आप भगवान के बारे में लिख सकते हैं।व्यक्ति के जीवन के दुख,सुख के बारे में लिख सकते हैं।निबंध ही था जिसके कारण लेखक का व्यक्तित्व साहित्य में दाखिल हुआ। निबंध शैली का बडा महत्व है। किसी लेखक के बारे में लिख सकते हैं।यह भी सच है कि इतिहास का उदय निबंध से हुआ है।










रविवार, 18 अप्रैल 2010

अमेरिकी विरोध के तर्कों को छिपाते चैनल

      टेलीविजन चैनलों का अमेरिका के साथ मूलत: वैचारिक याराना है।शायद ही कोई चैनल हो जिस पर अमेरिका का भूत सवार न हो।समाचार चैनलों की अंतर्राष्ट्रीय खबरों में अमेरिकी विदेश नीति का समर्थन आम बात है।वहीं दूसरी ओर मनोरंजन कार्यक्रमों में अमेरिकी मूल्यों,विश्वासों और संस्कारों का देशज चरित्रों और देशज कथानकों की आड़ में व्यापक तौर पर इस्तेमाल सामान्य फिनोमिना है।चैनल संस्कृति वस्तुत: अमेरिकी संस्कृति का पर्याय बन चुकी है।ऐसी अवस्था में चैनलों में अमेरिकी विरोध के स्वर खोजना बेहद मुश्किल कार्य है। इसके बावजूद अल-जजीरा जैसे चैनल भी हैं जिनमें अमेरिकी विरोध को व्यापक अभिव्यक्ति का अवसर मिला है।
    अरब देशों की अधिकांश सरकारों के अमेरिकी समर्थक हो जाने के बावजूद अधिकांश अरब जनता अमेरिका विरोधी है। यह स्थिति तब है जबकि अरब देशों में जनतंत्र का विकास नहीं हो पाया है। चैनलों की दुनिया पर अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की इजारेदारी है।इसके बावजूद विश्व स्तर और खासकर अरब जगत में अमेरिकी विरोध तेजी से बढ़ रहा है। इसके निम्न कारण हैं -
   (1)अमेरिका अबाधित उपभोग का प्रतीक है।यही वजह है कि मैकडोनाल्ड के रेस्तारांओं पर आए दिन हमले या विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं। आए दिन अमेरिकी मालों के बहिष्कार की मांग उठती रहती है।अमेरिकी मालों या मैकडोनाल्ड के उपभोक्ता ऐसे वर्ग के लोग हैं जो सिर्फ खाते हैं। खाने के अलावा और कुछ नहीं करते। मैकडोनाल्ड संस्कृति ऐसी अवस्था की ओर संकेत करती है  जिसमें धनी लोग मरणासन्न अवस्था की ओर जा रहे हैं।शरीर को इकहरा बनाए रखने के लिए अरबों डालर की डाइटिंग इण्डस्ट्री का निर्माण किया गया है।एक अनुमान के अनुसार डाइटिंग इण्डस्ट्री का सालाना कारोबार 33 विलियन डालर से ज्यादा का है।धनी लोग डाइटिंग पर अरबों डालर ऐसी अवस्था में खर्च कर रहे हैं जब सारी दुनिया में सालाना लाखों गरीब बगैर भोजन के मर रहे हैं।यह एक तरह का आत्म विध्वंसक निहित स्वार्थ है जिसका विरोध किया जाना चाहिए।
     (2)अमेरिका ऐसी सत्ता है जिसे दण्डित नहीं किया जा सकता।इसे कैसे दण्डित किया जाए इस पर सोचा जाना चाहिए।बेल्जियम की अदालत में एक याचिका इराक में युद्धापराधों के संदर्भ में अमेरिकी गठबंधन सेना के प्रमुख टॉमी फ्रैंक एवं अन्य सैन्य अधिकारियों के खिलाफ दायर की है। जिसमें 21युद्धापराधों को सूचीबद्ध किया है। यदि इस याचिका के आधार पर अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होती है तो बड़ी बात होगी। हमें सोचना चाहिए कि अमेरिका के खिलाफ आज तक कभी युद्धापराध का कोई फैसला क्यों नहीं हुआ ?निकारागुआ के मामले में एक मर्तबा फैसला हुआ था किंतु लागू नहीं हो पाया।अमेरिका विरोधी भावबोध के लिए यह जरूरी है कि युद्धापराध, मानवाधिकारों के हनन,किसी भी संप्रभु राष्ट्र की संप्रभुता पर हमले के खिलाफ मुकदमा चलाने का प्रावधान होना चाहिए।
     (3)अमेरिकी संस्कृति से घृणा का संभवत: यह भी कारण हो सकता है कि अमेरिकी चैनलों की पैकेजिंग की नकल संभव नहीं है।सीएनएन या फॉक्स जैसे चैनलों में समाचारों में रिपोर्टिंग के दौरान साफ-सुथरे,चमकीले दांतों वाले,चमकदार,सलीके से बाल काड़े हुए,सब समय मुस्कराते, हमेशा  प्रत्येक परिस्थिति में निर्भीक और सुंदर दिखने वाले संवाददाताओं को देखकर सिर्फ यही विचार पैदा होता है कि यह सब सिर्फ काले जादू से ही संभव है।ये ऐसे लोग हैं जो कभी बूढ़े नहीं होते,कभी मुरझाते नहीं हैं,उनके चेहरों पर कभी उदासी नहीं आती,कष्ट दिखाई नहीं देता,वे कभी थकते नहीं हैं,जनता से डरते नहीं हैं।
     (4)सारी दुनिया में अमेरिका के खिलाफ घृणा का यह भी कारण है कि अमेरिका ने धर्म का अपहरण कर लिया है। धर्म को साम्राज्यवाद और धार्मिक तत्ववादियों के हवाले कर दिया है।आज धर्म बंदूक की नोंक पर जिंदा है।यही वजह है कि धर्मप्राण जनता में अमेरिका के प्रति तीव्र घृणा दिखाई दे रही है।
     (5)बहुराष्ट्रीय चैनलों को गौर से देखें तो पाएंगे कि वहां पर वही जाने-पहचाने चेहरे रोज,प्रति घंटे आते हैं। और सिर्फ बातें करते हैं।उल्लेखनीय है कि अमेरिकी हमेशा बहस करते हैं, बातें करते हैं, घटनाओं पर चर्चा करते हैं किंतु कभी एक्शन का सामना करते नजर नहीं आएंगे।वे ऐसे मनुष्य हैं जो गूंगे हैं।ये ऐसे लोग हैं जो झूठ बोलते हैं।सच को छिपाते हैं।साधारण और निर्दोष लोगों की हत्या के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।इराक के मामले में यही सब कुछ देखा गया।
     (6)सच यह है कि अमेरिका के साथ रहकर कोई तटस्थ नहीं रह सकता।साथ ही अमेरिका का पक्ष लेकर सत्य भी नहीं बोल सकता।
    (7)अमेरिका का मानवाधिकारों को लेकर दोमुंहा व्यवहार रहा है।वह मानवाधिकारों पर किस तरह का रूख रखता है इसका सबूत यह है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग में अमेरिका ने इराक में मानवाधिकारों के हनन को लेकर पेश किए गए प्रस्ताव को ठुकरा दिया।यह प्रस्ताव रूस,सीरिया,सूडान,मलेशिया, लीविया, बुरखीना पासो,जिम्बाबे और अल्जीरिया ने पेश किया था। जबकि इसी संस्था ने चेचेन्या,यूगोस्लाविया,रवाण्डा,पूर्वी तीमूर,इजराइल द्वारा अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर बहस की थी।किंतु यह खबर चैनलों से नदारत थी।
   समाचार चैनलों की मुश्किल यह है कि वे जो खबरें देते हैं उनके बारे में विस्तार से या विश्लेषण के साथ सूचनाएं नहीं देते। 
   

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

गुलामी से मुक्ति का अवरुद्ध मार्ग



कल्याणकारी राज्य के आने के साथ सार्वजनिक और निजी के बीच का भेद कम होने लगता है। कल्याणकारी राज्य वस्तुओं की खपत,मांग,आकांक्षा आदि को बढ़ावा देता है ,उपभोक्ता के असंतोष में इजाफा करता है। वस्तुओं के उपभोग में इजाफा और उपभोक्ता असंतोष को विस्तार देता है। वस्तुओं के उपभोग में वृद्धि और नागरिक अधिकारों का क्षय, पत्रकारिता का मासमीडिया में रूपान्तरण, सार्वजनिक वातावरण के प्रति सम्मानभाव, निजता की उपेक्षा, राजनीतिक दलों में नौकरशाहाना रवैयये का विकास, साहित्य में सैलेबरेटी भाव,पूजाभाव,समाज और साहित्य से आलोचना का अलगाव,साहित्य और पाठक के बीच महा-अंतराल कल्याणकारी राज्य की सौगात है।  कल्याणकारी राज्य में नौकरशाही सबसे ज्यादा ताकतवर और आम जनता शक्तिहीन होती है। कल्याणकारी राज्य आम जनता को निरस्त्र बनाता है। प्रतिरोधहीन बनाता है। जो लोग सोचते हैं कि आज की तुलना में कल्याणकारी राज्य ठीक था, वे गलत सोचते हैं, कल्याणकारी रास्ते से ही परवर्ती पूंजीवाद का विकास होता है। कल्याणकारी राज्य स्वभावत: बर्बर होता है। आपात्काल को कल्याणकारी राज्य ने ही लागू किया था। आपात्काल में ही हमारे संविधान में बदनाम 44वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान के आमुख में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जोड़े गए थे।
कल्याणकारी नीतियों के कारण जीवन के बुनियादी क्षेत्रों शिक्षा,स्वास्थ्य, परिवार कल्याण,पानी,बिजली आदि क्षेत्रों की समस्त संरचनाएं खोखली हो जाती हैं। इसका असर साहित्य और अन्य कलारूपों पर भी पड़ता है ऐसा साहित्य और आलोचना बड़ी मात्रा में सामने आता है जो कृत्रिम है अथवा निर्मित है अथवा खोखली अवधारणाओं को व्यक्त करता है। अब हम निर्मित आलोचना को ही वास्तव आलोचना समझने लगते हैं। सारी मुश्किलें आलोचना के इसी रूप के गर्भ से पैदा हो रही हैं। उल्लेखनीय है निर्मित साहित्य,निर्मित आलोचना मूलत: स्टीरियोटाइप आलोचना है। इसका समाज की वास्तविकता,साहित्य की वास्तविकता और आम जनता के जीवन की वास्तविकताओं के साथ कोई संबंध नहीं है। मजेदार बात यह है जो आलोचना के पुरस्कत्तर्ाा हैं वे ही निर्मित आलोचना के भी सर्जक हैं।
                कल्याणकारी राज्य प्रतीकात्मक सामाजिकीकरण करता है। व्यवस्था से जोड़े रखता है। कल्याणकारी राज्य के संस्थान प्रतीकात्मक भूमिका निभाते हैं। प्रतीकात्मक भूमिका की ओट में बर्बरता, मूल्यहीनताऔर आंतरिक उपनिवेशवाद का निर्माण किया जाता है।  कल्याणकारी राज्य के लक्ष्यों से नाभिनालबध्द आलोचना का लक्ष्य है आलोचनात्मक विवेक से मनुष्य को मुक्त करना ,आलोचना के वातावरण को नष्ट करना और मनुष्य को आंतरिक तौर पर गुलाम बनाना। अब जीवन और व्यवस्था के बीच 'पैसा' और 'पावर' के नियम निर्णायक भूमिका अदा करने लगते हैं। वे जीवन के आंतरिक आयामों में गहरे पैठ बना लेते हैं।
      अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक संरचनाओं के द्वारा सार्वजनिक और निजी को मातहत बनाकर रखने का भाव खत्म हो जाता है। अब प्रशासन के द्वारा तय मूल्य,नियम,मान्यताएं व्याख्याओं आदि का दैनन्दिन जीवन में महत्व खत्म हो जाता है। मजदूरवर्ग  और नागरिकों की जीवनमूल्यों ,आंतरिक जिंदगी और व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता खत्म हो जाती है। अब नए किस्म का विरेचन शुरू हो जाता है।  अब नागरिक की बजाय उपभोक्ता और ग्राहक महान बन जाता है। अब मूल्याधारित परिवर्तनों की बजाय भेदपूर्ण संचार का संदर्भ भूमिका अदा करने लगता है। सांस्कृतिक संसाधनों में नए सिरे से प्राणसंचार संभव नहीं रहता। अब सांस्कृतिक संसाधन व्यक्तिगत और सामुदायिक की प्रतीकात्मक पहचान का हिस्साभर बनकर रह जाते हैं।  प्रतीकात्मक पुनर्रूत्पादन अस्थिर हो जाता है। अस्मिता के लिए खतरा पैदा हो जाता है और सामाजिक संकट की आम फिनोमिना के तौर पर फूट पड़ता प्रवृत्ति है।
     उल्लेखनीय है कल्याणकारी राज्य शीतयुध्द के परिप्रेक्ष्य में विकसित होता है जिसका हमारे समूचे चिन्तन पर असर पड़ता है। आलोचना से लेकर राजनीति तक सभी क्षेत्रों में शीतयुध्दीय केटेगरी और अवधारणाओं का उत्पादन और पुनर्रूत्पादन बढ़ जाता है।  हिन्दी के सन् 1972-73 के बाद के प्रगतिशील साहित्य,नयी कविता, जनवादी साहित्य,आधुनिकतावादी साहित्य पर शीतयुध्द की अवधारणाओं का गहरा असर साफ तौर पर देखा जा सकता है।
    कल्याणकारी राज्य में आंतरिक उपनिवेशवाद के कारण नए किस्म के अन्तर्विरोध और संकट पैदा होते हैं। नयी उन्नत तकनीक के आने के कारण पेशेवर पहचान बदलती है , निजी जीवन में पैसे की भूमिका निर्णायक हो जाती है। उपभोक्ता की भूमिका बढ जाती है। वर्गसंघर्ष और बुर्जुआ क्रांति के कार्यभारों को कल्याणकारी राज्य स्थगित कर देता है। अब मजदूर संघर्ष नहीं करते बल्कि ज्यादा से ज्यादा अन्य गैर बाजिव समस्याओं में मशगूल रहते हैं।  संकट को प्रतीकात्मक तौर पर भौतिक पुनर्रूत्पादन का विरोध करते हुए सम्बोधित किया जाता है। फलत: नए किस्म के मुक्तिसंग्राम शुरू हो जाते हैं। ऐसे संग्राम सामने आ जाते हैं जिनके बारे में पहले कभी सोचा नहीं था । इन तमाम संग्रामों का बुनियादी आधार है आंतरिक गुलामी से मुक्ति। स्त्री मुक्ति, दलित मुक्ति,स्त्री साहित्य,दलित साहित्य ,पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण आदि ऐसे ही नए प्रसंग हैं।


शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य, मासकल्चर और साहित्य

        हिन्दी साहित्य में नए मूल्यों और मान्यताओं के प्रति संदेह,हिकारत और अस्वीकार का भाव बार-बार व्यक्त हुआ है। इसका आदर्श नमूना है परिवार के विखंडन खासकर संयुक्त परिवार के टूटने पर असंतोष का इजहार। एकल परिवार को अधिकांश आलोचकों के द्वारा सकारात्मक नजरिए से न देख पाना। सार्वजनिक और निजी जीवन में 'तर्क' की बजाय 'अतर्क' के प्रति समर्पण और महिमामंडन। आजादी के बाद की आलोचना की केन्द्रीय कमजोरी है कल्याणकारी राज्य की सही समझ का अभाव। सार्वजनिक और निजी के रूपान्तरण की प्रक्रियाओं का अज्ञान। सच यह है कि कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की सांस्कृतिक भूमिका के बारे में हमने कभी विचार नहीं किया गया। उलटे कल्याणकारी राज्य का महिमामंडन किया। अथवा उसे एकसिरे से खारिज किया।

            प्रशंसा और खारिज करना ये दोनों ही अतिवादी नजरिए की देन हैं। इनका सही समझ के साथ कोई संबंध नहीं है। कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य का अर्थ सब्सीडी, राहत उपायों  अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों का निर्माण करना ही नहीं है। अपितु कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी भी पैदा करता है। कल्याणकारी राज्य ने दो बड़े क्षेत्रों के चित्रण पर जोर दिया पहला-परिवार,इसमें भी मध्यवर्गीय परिवार पर जोर रहा है, चित्रण का दूसरा क्षेत्र है राजसत्ता और बाजार । स्वातंत्र्योत्तर अधिकांश साहित्य इन दो क्षेत्रों का ही चित्रण करता है। 
   
सवाल उठता है कल्याणकारी राज्य हो और आंतरिक गुलामी न हो ? कल्याणकारी राज्य के परिप्रेक्ष्य में साहित्य के प्रति क्या नजरिया होना चाहिए ? साहित्य को प्रदर्शन की चीज बनाया जाए, अथवा आलोचनात्मक वातावरण बनाने का औजार बनाया जाए ? कल्याणकारी राज्य में 'सार्वजनिक' और 'निजी' स्पेयर या वातावरण का क्या रूप होता है ? इसके दौरान किस तरह का साहित्य लिखा जाता है ? किस तरह के मुद्दे बहस के केन्द्र में आते हैं ? साहित्य की धारणा,भूमिका और प्रभाव की प्रक्रिया में किस तरह के परिवर्तन आते हैं ?
     कल्याणकारी राज्य साहित्य को 'सेलीबरेटी',प्रदर्शन,नजारे,तमाशे,बहस आदि की केटेगरी में पहुँचा देता है, कृति और साहित्यकार को सैलीबरेटी बना देता है। अब साहित्य और साहित्यकार के प्रदर्शन और सार्वजनिक वक्तव्य का महत्व होता है किंतु उसका कोई असर नहीं होता।

लेखक का बयान अथवा कृति को साहित्येतिहास का हिस्सा माना जाता है। उसका सामाजिक -राजनीतिक तौर पर गंभीर असर नहीं होता, लेखक की जनप्रियता बढ़ जाती है। किंतु सामाजिक संरचनाओं पर उसका प्रभाव नहीं होता। साहित्य और लेखक अप्रभावी घटक बनकर रह जाता है। लिखे का सामाजिक रूपान्तरण नहीं हो पाता।

आप लिखे पर बहस कर सकते हैं किंतु भौतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में उसे रूपान्तरित नहीं कर सकते। अब साहित्य और साहित्यकार दिखाऊ माल बनकर रह जाते हैं। आलोचना का उपयोगितावाद के साथ चोली-दामन का संबंध बन जाता है। अब साहित्यालोचना उपयोगिता के नजरिए से लिखी जाती है,आलोचकगण सामयिक मंचीय जरूरतों के लिहाज से बयान देते हैं। यह एक तरह का साहित्यिक प्रमोशन है। साहित्य प्रमोशन और तद्जनित आलोचना का मासकल्चर के प्रसार के साथ गहरा संबंध है। मासकल्चर का प्रसार जितना होगा साहित्य में प्रायोजित आलोचना का उतना ही प्रचार होगा। प्रायोजित आलोचना मासकल्चर की संतान है।
                 
                भारत में कल्याणकारी राज्य का उदय साम्राज्यवाद के साथ आंतरिक अन्तर्विरोधों के गर्भ से हुआ । राज्य और जनता के संबंधों के बीच में गहरी गुत्थमगुत्था चल रही थी और सार्वजनिक और निजी में तनाव था, राज्य और जनता के बीच पैदा हुए संकट के 'प्रबंधन' तंत्र के रूप में कल्याणकारी राज्य का उदय हुआ। इस संकट के समाधानों को उपभोग और बाजार के तर्कों के बहाने हल करने की कोशिश की। उपभोग और बाजार की प्रबंधन में केन्द्रीय भूमिका रही है। संकट के प्रबंधन की इस पध्दति का लक्ष्य था राज्य निर्देशित सार्वजनिक वातावरण तैयार करना,सार्वजनिक क्षेत्र खड़ा करना, आमजनता को संकट से बचाने के लिए राहत देना, कल्याणकारी राहतों के तौर पर मजदूर संगठनों और सामाजिक आन्दोलनों को राहत देना।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

बहुसांस्कृतिकवाद के खेल का मर्म


    आज बौध्दिक विमर्श से क्या गायब किया जाय और किस पर चर्चा हो इसके सुनियोजित ढंग़ से फैसले लिए जा रहे हैं ,पूरा का पूरा विमर्श नियोजित होकर रह गया है। सच यह है कि धारणाएं ऐतिहासिक प्रक्रिया में निर्मित होती हैं ,जब तक धारणाओं को पैदा करने वाली परिस्थितियां बनी रहती हैं ,उनकी जरुरत बनी रहती तब तक धारणाओं का प्रयोग भी होता रहता है। किन्तु उत्तर-आधुनिक अवस्था में तर्क की बजाय तर्कहीन ढ़ंग से ,स्वाभाविक की बजाय नियोजित विमर्श पर जोर दिया जा रहा है। सब कुछ तात्कालिक एवं क्षणिक बना दिया गया है।
           
   आज विमर्श से समाजवाद गायब है और उसकी जगह बाजारवाद ने ले ली है।योजना की जगह उदारतावाद ,राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता की जगह भूमंड़लीकरण,वर्ग की जगह सामाजिक समूह, क्रान्ति की जगह स्वैच्छिक संगठनों के आन्दोलनों, राज्य की जगह नागरिक समाज, इतरा लिंगी कामुकता की जगह गे और लेस्बियन या समलैंगिक अधिकारों ,आधुनिकता की जगह उत्तर-आधुनिकता पर चर्चाएं प्रायोजित की जा रही हैं।

    इसी तरह समांगता की जगह बहुलतावाद ,विचार की राजनीति की जगह अस्मिता की राजनीति , राष्ट्र-राज्य की जगह उप -राष्ट्रीयता ,सामान्यत्व की जगह भिन्नता एवं विविधता ,जातीय संस्कृति की जगह संस्कृति ,राष्ट्रीय एकता की जगह बहुसांस्कृतिकवाद एवं स्वीकृति की धारणाओं पर चर्चाएं हो रही हैं। आज सबसे ज्यादा संस्कृति ,विविधता,बहुलतावाद,अस्मिता की राजनीति आदि पर विमर्श हो रहा है।
   
   सत्तर के दशक में सांस्कृतिक बहुलतावाद की शुरुआत सबसे पहले कनाड़ा और आस्ट्रेलिया में हुई।बाद में अमेरिका ,ब्रिटेन और जर्मनी में हुई। इन दिनों यह फ्रांस के राजनीतिक परिदृश्य का प्रमुख एजेण्डा है।प्रसिध्द चिंतक भिखु पारीख ने लिखा कि फ्रांस जैसे राष्ट्र -राज्य के मजबूत किले में प्रभुत्व जमाना काफी महत्व रखता है। उसने नागरिकों की जातीय,सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के रुपों को जनगणना के रिकॉर्ड तक में दर्ज नहीं किया है।

   चूंकि बहु सांस्कृतिकवाद का आंदोलन विश्व के अनेक राजनीतिक संदर्भों में अनियोजित ढ़ंग से शुरु हुआ और उसने अनेक सामाजिक समूहों को आकर्षित किया।अभी तक यह आंदोलन उसूलों के बारे में सुसंगत दार्शनिक दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति नहीं कर पाया है।वह अपनी पहचान और मुख्य बिंदुओं तक पर प्रकाश नहीं ड़ाल पाया है।अत: यह जानना जरुरी है कि इसका अर्थ क्या है और सरोकार क्या हैं ? बहुसांस्कृतिकवाद को देखने का सबसे सही पैमाना न तो राजनीति है और इतिहास है बल्कि मानव जीवन को वह किस परिप्रेक्ष्य में देखता है,यह प्रधान बिंदु है। 
   
   इस प्रसंग में पहली बात यह ध्यान रहे कि मनुष्य सांस्कृतिक निर्मिति है।वह सांस्कृतिक जगत में जीता है।वह इसी सांस्कृतिक जगत से अपनी जिन्दगी और सामाजिक संबंधों को अर्थवत्ता और प्रासंगिकता प्रदान करता है।इसका यह अर्थ नहीं है कि संस्कृति से उसका निर्ध्रारणवादी रिश्ता है।बल्कि कहने मतलब यह हैकि संस्कृति उसे निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।वह उसके कुछ प्रभावों को कम कर सकता है किन्तु पूरी तरह संस्कृति से मुक्त नहीं हो सकता। 

   दूसरी बात यह कि भिन्न-भिन्न किस्म की संस्कृति में भिन्न -भिन्न किस्म की व्यवस्थाओं की अभिव्यक्ति होती है।संस्कृति जिन्दगी की बेहतरी के विज़न को व्यक्त करती है।साथ ही यह ध्यान रहे कि प्रत्येक संस्कृति मनुष्य की क्षमता एवं भावनाओं का बहुत छोटा हिस्सा ही व्यक्त करती है अत: मनुष्य को समग्रता में बेहतर ढंग से जानने के लिए अन्य संस्कृतियों की मदद लेनी पड़ती है।जिससे बेहतर ढ़ंग से विकास किया जा सके। इससे जहां एक ओर संस्कृति के शुध्दतावादी दृष्टिकोण से बचेंगे वहीं दूसरी ओर संस्कृति के कल्पना जगत का विस्तार भी कर पाएंगे। इसका यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति अपनी संस्कृति के तहत बेहतर जिन्दगी जी नहीं सकता।बल्कि इसका मतलब यह है कि यदि अन्य संस्कृति मदद लेता है तो वह ज्यादा बेहतर ढ़ंग से जी सकता है। 

    आधुनिक युग में एक ही संस्कृति में जीना असंभव है।क्योंकि यह गतिशील और स्वतंत्र जगत है। इसका यह भी अर्थ नहीं है कि सभी संस्कृतियां समृध्द हैं , सभी को एक समान सम्मान मिलता है ,सभी अपने सदस्यों की खुशहाली के लिए तत्पर हैं ,सभी समान हैं और उनकी  आलोचना नहीं हो सकती। 

    कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी संस्कृति पूरी तरह उपयोगी नहीं होती।कोई भी संस्कृति पूर्ण नहीं होती।किसी भी संस्कृति को अन्य पर आरोपित करने का हक नहीं है। प्रत्येक संस्कृति आंतरिक रुप से बहुलतामूलक होती है और उसकी परंपराओं और विचारों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है। परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि वह'कोहरेंस' और पहचान को खो दे।बल्कि पहचान तो बहुलता ,तरलता और खुलेपन को समेटे होती है। संस्कृति सचेत और अचेत संपर्क के कारण विकास करती है। इन बातों के रचनात्मक संपर्क और अंत:संबंध से बहुसांस्कृतिकवाद का परिप्रेक्ष्य बनता है।
       
    ध्यान रहे प्रत्येक संस्कृति बहुलतामूलक और भिन्नता लिए होती है। जब संस्कृतियों को किसी एक स्रोत की उपज माना जाता है या किसी एक संस्कृति विशेष को आरोपित करने की कोशिश की जाती है तो बहुलतावाद की बुनियाद ही धराशायी हो जाती है। संस्कृति का उदय स्वयं के गर्भ से होता है। वह अन्य के गर्भ से पैदा नहीं होती।किन्तु वह अन्य से प्रभाव ग्रहण करती है ,अन्य के तत्वों को आत्मसात् करती है ,बृहत्तर आर्थिक , राजनीतिक आदि कारणों से उसकी इमेज बनती है। यही वजह है कि वह किसी भी किस्म के केन्द्रीयतावाद को स्वीकार नहीं करती। क्योंकि केन्द्रीयतावाद उसके इतिहास एवं अन्य तत्वों की भूमिका को अस्वीकार करता है। 

  बहुसांस्कृतिकवाद के परिप्रेक्ष्य के अनुसार कोई भी राजनीतिक सिध्दान्त या विचारधारा मानव जीवन के पूर्ण सत्य को व्यक्त नहीं करता।प्रत्येक -उदारतावाद ,अनुदारवाद ,राष्ट्वाद, समाजवाद - बेहतर जीवन के लिए खास संस्कृति और विशिष्ट विजन को व्यक्त करता है।अत: वह अनिवार्यत: संकुचित और एकांगी होता है।
     
   भीखू पारिख का मानना है कि बहुसांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के अनुसार  समाज की बेहतरी के लिए विविधता और विभिन्न समूहों के बीच उनके नैतिक विजन को लेकर रचनात्मक संवाद  बेहद जरुरी है।मसलन् ,समाज के सदस्यों में एक दूसरे की संस्कृति का आदर करने के अधिकार के प्रति सम्मान का भाव हो साथ ही वे अपनी पसंद का विस्तार कर सकें , आत्मालोचना ,दृढता , 
   कल्पनाशीलता ,बौध्दिक और नैतिक सहानुभूति की क्षमता का विकास करे जिससे उसका विकास और भला हो। यह संभव है कि कुछ ग्रुप अन्य संस्कृति से संपर्क न रखना चाहें और अपने समूह के सीमित दायरे में जीना चाहें।हमें ऐसे समूहों की इस तरह की भावनाओं और जीवन शैली का सम्मान करना चाहिए।        
    
    बहुसांस्कृतिक समाज को स्थिर बनाने के लिए जरुरी है कि इसके नागरिकों में एक -दूसरे के प्रति लगाव हो ,किन्तु लगाव का आधार नस्ल ,धर्म , एथनिक न हो अपितु बहुसांस्कृतिक समाज के उसूलों को आधार बनाया जाय। चूंकि बहुसांस्कृतिक समाज वैविध्यपूर्ण होता है अत: इसका आधार राजनीति को बनाया जाना चाहिए ,और साझी राजनीतिक प्रतिबध्दता के आधार पर राजनीतिक समूह के रुप में पहचान बनायी जाय। क्योंकि वे ऐतिहासिक तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हैं।
   
   इस प्रसंग में कुछ पदबंधों के उदार प्रयोगों के प्रति सावधान रहने की जरुरत है। मसलन् , 'प्लूरल' ,'डाइवर्स' ,और 'मल्टीकल्चरल' पदबंधों का आमतौर पर 'बहु' के लिए उदारतापूर्वक प्रयोग किया जाता है। किन्तु इन तीनों में 'बहु' का भिन्न-भिन्न अर्थ है। इसके कारण इनका अर्थ ,अवधारणा ,आधार ,संदर्भ बदल जाता है। ये एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं हैं।

रविवार, 31 जनवरी 2010

मुक्ति की गारंटी है जनोन्मुखी विज्ञान



            
 अंधविश्वास से लड़ने के लिए विज्ञान के बुनियादी क्षेत्रों में अनुसंधान और विज्ञानसम्मत चेतना के निर्माण पर जोर दिया जाना चाहिए। कुछ विज्ञान संगठन हैं जो सचमुच में अंधविश्वास से लड़ना चाहते हैं किंतु इसके लिए ये लोग लोकप्रिय विज्ञान का सहारा लेते हैं। प्रसिध्द वैज्ञानिक जे.डी. बरनाल के शब्दों में 'लोकप्रिय विज्ञान वास्तविक विज्ञान से उतनी ही दूर की चीज है जितनी लोकप्रिय संगीत, शास्त्रीय संगीत से है।'

इस फर्क के बावजूद लोकप्रिय विज्ञान के जरिए टुकड़ों-टुकड़ों में विज्ञान के परिणामों को आम जनता तक पहुंचाने में मदद मिलती है। या जब इन्हें सनसनीखेज ढंग से पुनर्प्रस्तुत किया जाता है तो भी परिणाम आम लोग जान ही जाते हैं। लेकिन यह टुकड़ों-टुकड़ों में होता है और लोग विज्ञान की विधि और भावना से अपरिचित ही रह जाते हैं।

आज विज्ञान और लोकप्रिय विचारों के बीच आदान-प्रदान टूट चुका है। विज्ञान को लेकर वैसी सघन और प्रशिक्षित गुणग्राहकता कहीं नहीं मिलती जैसी क्रिकेट या फुटबाल मैचों को लेकर देखी जाती है। इसकी व्याख्या केवल वैज्ञानिक आनंद में वित्तीय हितों की कमी या इस विषय की अंतर्निहित कठिनाई के जरिए नहीं की जा सकती।

आम लोग महीनों क्रिकेट की बारीकियों को लेकर चर्चाएं करते रहते हैं यहां तक कि सट्टे में पैसा तक दांव पर लगाते हैं। यदि विज्ञान में लोगों की रुचि होती तो एक बड़ा दिलचस्प खेल दिखाई देता और वह यह कि आम लोग किसी समस्या पर प्रोफेसर 'क' के सिध्दांत पर प्रोफेसर 'ख' के सिध्दांत की अपेक्षा दस और एक का दांव लगाते।

अंधविश्वास को हमारे जनमाध्यम सबसे पहले कवरेज देते हैं। खासकर हिंदी मीडिया की स्थिति तो बेहद खराब है। हिंदी में किसी भी दैनिक मीडिया में विज्ञान के स्थायी पेज या स्तंभ नहीं हैं। न विज्ञान संवाददाता हैं, न विज्ञान संपादक हैं, और न विज्ञान पर लिखने वाले वैज्ञानिक लेखक ही हैं। विज्ञान की यदा-कदा खबरें आती हैं तो लगता है चिप्पियां जोड़कर खबर बनाई गई है। अथवा सनसनीखेज ढंग से विज्ञान खबर प्रकाशित होती है। जनमाध्यमों का विज्ञान के प्रति इस तरह का उपेक्षा भाव जनमाध्यमों की सामाजिक भूमिका पर सवालिया निशान लगाता है।

आमतौर पर यह देखा जाता है वैज्ञानिक खबरों को हिंदी का कोई अखबार छापता ही नहीं या छापता है तो छपी हुई चीजें आती हैं। वे पूरी तरह टुकड़ों-टुकड़ों में होती हैं। लोकप्रिय अखबार किसी खोज के बारे में सिर्फ इसलिए छापते हैं क्योंकि
वह चौंकाने वाली लगती है और हमारे स्वीकृत दृष्टिकोण में कुछ उलटफेर करती है। अधिक गंभीर अखबार भी यथार्थत: इससे बेहतर कुछ नहीं करते।

 जब वे विज्ञान संबंधी खबर बनाते हैं तो किसी वैज्ञानिक से एक पैराग्राफ उधार मांग लेते हैं और वह विशेषज्ञ न सिर्फ यह मानकर चलता है कि बाकी लोग भी उसके जितने ही जानकार हैं बल्कि जानकार और गैर-जानकार सारे ही लोग इस नई पहेली का कोई मतलब नहीं निकाल पाते जो विज्ञान नाम की समूची पहेली में आ चिपकी है। ऐसी खबरों में कोई बौध्दिक रुचि लेने के बजाय उन्हें एक सरसरी उत्सुकता के साथ ही, पढ़ा जा सकता है। हमारे लिए इन टुकड़ों में से छांटना, छानना और जोड़ना तब तक और भी कठिन होता है जब तक हम यह न देख सकें कि विज्ञान की विकासमान सीमाओं में इस तरह की खबरें क्या जोड़ती हैं।

अधिकतर लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाएं बेहतर होती हैं किंतु इनमें से अधिकांश हिस्सा आश्चर्यजनक कथाओं और व्यावहारिक गुरों से भरा होता है। इनमें यदाकदा ही गंभीर और सटीक लेख प्रकाशित होते हैं। ऐसा एक भी प्रकाशन नहीं है जिसकी अकेली भूमिका समकालीन आर्थिक और राजनीतिक विकास के संदर्भ में विज्ञान की प्रगति को सहज ग्राह्य रूप में पेश करने की हो। लोकप्रिय विज्ञान पर लिखी पुस्तकों की अवस्था इससे भी खराब है। अंधविश्वास के खिलाफ लड़ने के लिए हमें इस स्थिति को बदलना होगा।
हमें विज्ञान और लोकप्रिय विचारों के बीच आदान-प्रदान पर जोर देना होगा। आज विज्ञान और वैज्ञानिक अलगाव की स्थिति में हैं। अलगाव का आलम यह है कि वैज्ञानिक दूसरी दुनिया का हो गया है।

वैज्ञानिक का सामाजिक अलगाव वस्तुत: विज्ञान के सामाजिक अलगाव का द्योतक है। अपने विषय से इतर वह साधारण व्यक्ति लग सकता है, गोल्फ खेल सकता है, अच्छे किस्से सुना सकता है और एक समर्पित पति और पिता भी हो सकता है, लेकिन उसका विषय उसकी अपनी 'दुकान' है, जो उसे समझने वाले चंद लोगों को छोड़कर उसे पूरी तरह आत्मकेंद्रित बना देती है। साहित्यिक संस्कृति के लोगों में विज्ञान के बारे में कुछ भी न जानने का एक आकर्षण होता है, स्वयं वैज्ञानिक भी इस आकर्षण से बच नहीं पाते। उनके बारे में भी यह बात अन्य विज्ञानों पर लागू होती है।

वैज्ञानिक विषयों पर अच्छी सामान्य बातचीत दुर्लभतम अवसरों में से एक होती है और यदि किसी समूह में वैज्ञानिकों की बहुतायत हो तो भी यह बात लागू
होती है।

आज स्थिति यह है कि संस्कृति और विज्ञान का अलगाव बढ़ गया है।
इस अलगाव की शुरुआत विज्ञान की शिक्षा शुरू होने के बाद हुई। यह एक भारी
विरोधाभास है। इसके बाद से ही विज्ञान का शौकिया चरित्रा खत्म हुआ और व्यापक जनता की रुचि भी इसमें से जाती रही। अब खुद से विज्ञान के बारे में सोचने की जरूरत किसी को नहीं है, विज्ञान के क्षेत्रा में अब ऐसे ही लोग मिलते हैं जो बस अपने काम से काम रखते हैं।

अंधविश्वास सिर्फ जनता तक सीमित नहीं हैं बल्कि प्रशासन और राजनीति के क्षेत्रा में भी इसका गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। इसी तरह विज्ञान के प्रति अज्ञान सिर्फ जनता तक सीमित नहीं है बल्कि प्रशासन और राजनीति तक इसका क्षेत्रा फैला हुआ है। यह अचानक नहीं है कि लोकचेतना, राजनीति और प्रशासन में विज्ञान इतना तिरस्कृत है।

विज्ञान के प्रति हमारा मौजूदा रवैया हमारी मौजूदा सामाजिक व्यवस्था का अनिवार्य और मौलिक अंग है। समाज की मौजूदा जरूरतें अपनी संतुष्टि के लिए विज्ञान को जाग्रत रखना चाहती हैं, लिहाजा ये जरूरतें कुछ भी हों, कुछ विज्ञान इनके लिए जरूरी है। लेकिन इन जरूरतों की पूर्ति के लिए आया विज्ञान नई जरूरतें पैदा करता है और पुरानी जरूरतों की आलोचना करता है। ऐसा करते हुए समाज में सुधार करने में उससे भी कहीं ज्यादा और भिन्न भूमिका अदा करने लगता है। यही कारण है कि शासक वर्ग यह कोशिश करता है कि विज्ञान और वैज्ञानिक दोनों को सामाजिक अलगाव की अवस्था में रखा जाए और विज्ञान को एक उपयोगी नौकर की तरह इस्तेमाल किया जाए।

विज्ञान का यदि सामाजिक अलगाव खत्म हो जाएगा तो वह सामाजिक परिवर्तन का अस्त्र बन जाएगा, मालिक बन जाएगा। यही वजह है कि वैज्ञानिकों को अपने-अपने पेशों में मगन रहने दिया जाता है। समाज में जिन लोगों का वर्चस्व है वे नहीं चाहते कि विज्ञान आम लोगों तक पहुंचे और आम जनता विज्ञानसम्मत चेतना से संपन्न बने। विज्ञानसम्मत चेतना के माध्यम से ही आम लोगों में आलोचनात्मक ढंग से सोचने और देखने का नजरिया विकसित होता है। जो नजरिया सिर्फ आलोचनात्मक हो और विज्ञानसम्मत न हो तो उसमें अंधविश्वासों को अपदस्थ करने की क्षमता नहीं होती।

विज्ञान को जनप्रिय बनाने के काम में सबसे बड़ी बाधा है धन की। आज अंध-
विश्वास के कार्यों के लिए जिस तरह बेशुमार धन उपलब्ध है उसकी तुलना में विज्ञान के अनुसंधान कार्यों के लिए धन उपलब्ध नहीं है। राज्य और निजी क्षेत्रा दोनों ही की तरफ से विज्ञान के बुनियादी अनुसंधान के लिए सकल घरेलू उत्पाद का एक फीसदी हिस्सा भी खर्च नहीं होता। जो कुछ खर्च होता है उस पर बाजार की शक्तियों की नजर लगी हुई है।

इसके अलावा फासीवादी ताकतें विज्ञान का अपने हितों और राजनीतिक विस्तार के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैं। वे इसका युध्द सामग्री के निर्माण के लिए इस्तेमाल करने के पक्ष में सक्रिय हैं। वहीं दूसरी ओर आम जनता में पौराणिक मिथों, कथाओं और रहस्यवादी अतार्किकता का जमकर प्रचार कर रही हैं। यहां तक कि गणेश दूध पी रहे हैं जैसे चमत्कारों का प्रचार करते रहे हैं। बहुत सारे संत-महंत अपने जादुई चमत्कारों के नाम पर जादूगरी के करतबों और विज्ञान के नुस्खों का प्रयोग कर रहे हैं और आम जनता में अंधविश्वास फैला रहे हैं।

फासीवादी ताकतें पोंगापंथी बातों का दृढ़ सत्यों के साथ घालमेल कर रही हैं। आज यह प्रचार किया जा रहा है कि हिंदू जन्मना श्रेष्ठ होते हैं, उनमें सिर्फ अनुशासन की कमी है यदि वे अनुशासित हो जाएं, कद काठी मजबूत कर लें और संघर्ष के लिए तैयार हो जाएं तो वे अपनी नियति बदल सकते हैं, भारत पर राज कर सकते हैं और सारी दुनिया फिर उनका लोहा मानने के लिए मजबूर होगी। इस तरह के विचारों का विज्ञानसम्मत ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि इस तरह की बातें अंधविश्वास का हिस्सा हैं।
फासीवादी दृष्टिकोण भारतीय परंपरा में हिंदुओं के अलावा किसी अन्य समुदाय के योगदान को स्वीकार ही नहीं करता और बार-बार यह प्रचार किया जा रहा है कि भारतीय परंपरा में मुसलमानों की विध्वंसक भूमिका रही है। वे लुटेरे और हमलावर रहे हैं। इस तरह के तर्क भारतीय संगीत, दर्शन, स्थापत्य, विज्ञान, समाजविज्ञान, राजनीति, ललित कला आदि के क्षेत्रों में मुसलमानों के योगदान को एकसिरे से खारिज करते हैं और परंपरा के बारे में अंधविश्वास का फासीवादी प्रपंच निर्मित करते हैं।

ये लोग विज्ञान के फौजी इस्तेमाल के पक्ष में हैं किंतु सामाजिक जीवन में विज्ञानसम्मत चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के सख्त खिलाफ हैं। सामाजिक जीवन में पोंगापंथ, दंतकथाएं, विज्ञान विरोधी बातें और अंधविश्वास इन्हें पसंद है। आज ये ही ताकतें अंधविश्वास का सबसे ज्यादा प्रचार कर रही हैं। इससे इन्हें अपना सामाजिक-राजनीतिक आधार बढ़ाने में मदद मिली है। इस सबको देखते हुए और भी जरूरी है कि अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष को ज्यादा व्यापक पैमाने पर चलाया जाए।






शनिवार, 30 जनवरी 2010

संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 3-




नकल की प्रवृत्ति को पूंजीवाद का प्रधान गुण माना जाता है। इस अर्थ में पूंजीवाद अपने विकास के साथ-साथ सामंती और पूर्व सामंती कला रूपों और मूल्यबोध को बरकरार रखता है।

कलाओं में अंधानुकरण आधुनिक काल में नकल में रूपांतरित कर लेता है। इससे जहां कभी न खत्म होने वाले मनोरंजन की सृष्टि करने में मदद मिलती है वहीं दूसरी ओर अंधानुकरण के एटीटयूट्स, रवैए और संस्कार का विकास होता है। कलाओं से यथार्थ गायब हो जाता है। उसकी जगह काल्पनिक यथार्थ या आभासी यथार्थ ले लेता है।

इसी तरह अंधविश्वास या नकल की संस्कृति का परजीवीपन और पेटूपन की संस्कृति से गहरा संबंध है। इसका स्वतंत्राता के विचार से विरोध है, यह उन तमाम विचारों को अस्वीकार करती है जो नकल या अंधानुकरण के विरोधी हैं। 

पूंजीवाद अपनी सामान्य प्रकृति के अनुसार अंधविश्वासों को भी वस्तु के रूप में बदल देता है, उन्हें संस्थागत रूप दे देता है। अंधविश्वासों को कामुकता एवं रोमांस के साथ प्रस्तुत करता है और यह कार्य फिल्म, टी.वी. और वीडियो फिल्मों के संगठित औद्योगिक माल के उत्पादन के रूप में करता है। 

कामुकता, पोर्नोग्राफी, अतिलयात्मक गीत और संगीत तथा नकल के आधार पर निर्मित कलाएं जितनी ज्यादा बनेंगी उतना ही ज्यादा अंधविश्वास भी बढ़ेगा। उतनी ही ज्यादा सामाजिक असुरक्षा, भेदभाव और तनाव की सृष्टि होगी। इसका प्रधान कारण यह है कि आज अंधविश्वास को मासकल्चर ने अपना सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया है। 

अंधविश्वास की रणनीति और धार्मिक संप्रेषण की शैलियों को अपनाकर विज्ञापन, फिल्म और टी.वी. उद्योग तेजी से अपना विकास कर रहा है। पहले अंधविश्वास के माध्यम से राज्य अपने लिए जहां एक ओर धन जुटाता था वहीं दूसरी ओर जनता के दिलो-दिमाग पर शासन करता था। 
आज भी इस स्थिति में बुनियादी फर्क नहीं आया है। सिर्फ तरीका बदला है और इस कार्य में परंपरागत अंधविश्वास प्रचारकों के अलावा जो नया तत्व आकर जुड़ा वह है पूंजीपति वर्ग, बाजार और संस्कृति उद्योग। 

अब अंधानुकरण की प्रवृत्ति का बाजार की शक्तियां खुलकर अपने मुनाफों के विस्तार के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। अंधानुकरण के लिए जरूरी है कि स्टीरियोटाइप प्रस्तुतियों पर जोर दिया जाए। इनमें खर्च कम और मुनाफा ज्यादा होता है और प्रस्तुतियां जल्दी ही समझ में आ जाती हैं। इस तरह की प्रस्तुतियां यथार्थ के निषेध और स्वतंत्रा सृजन या मौलिक सृजन के निषेध को व्यक्त करती हैं। 

वे ऐसे उन्माद, आनंद और मनोरंजन की सृष्टि करती हैं जो प्रभेदों का सृजन करता है। ध्यान रहे, प्रभेद वहीं पैदा होते हैं जहां भय हो, अंधविश्वास हो या जहां एक-दूसरे को धोखा देकर हराने का प्रयत्न किया जाता है। वहां परस्पर व्यवहार में सहज भाव नहीं होता।

अंधविश्वास मूलत: ऐसी स्वाधीनता की हिमायत करते हैं जो मनुष्य को पीड़ित करती है। यह संबंधहीन स्वाधीनता है। यह बुनियादी तौर पर नकारात्मक स्वाधीनता है। अंधविश्वास तरह-तरह के धार्मिक उपकरणों को जमा करने और धार्मिक उपकरणों के माध्यम से अंधविश्वासों से राहत पाने का रास्ता सुझाते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में, 'मानव जीवन में जहां अभाव है वहीं उपकरण जमा होते हैं। ... इस अभाव और उपकरण के पक्ष में ईर्ष्या है, द्वेष है, वहां दीवार है, पहरेदार है, वहां व्यक्ति अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है और दूसरों पर आघात करना चाहता है।'

अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल के सिध्दांत से मुक्ति पाने के लिए जरूरी है कि तर्क और विमर्श के पुराने पैराडाइम को बदलें। पुराने पैराडाइम से जुड़े होने के कारण हम प्रभावी ढंग से अंधविश्वास का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। तर्क के पैराडाइम को बदलते ही हम विकल्प की दिशा में बढ़ जाएंगे। पैराडाइम को बदलते ही विचारों में मूलगामी परिवर्तन आने लगेगा। 

आम तौर पर हमारे बहुत से बुध्दिजीवी पुराने पैराडाइम को बनाए रखकर तर्कों में परिवर्तन कर लेते हैं। ध्यान रहे, अंधविश्वास को तर्क और विवेक से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। जब तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर नया पैराडाइम निर्मित नहीं किया जाता तब तक अंधविश्वास को अपदस्थ करना मुश्किल है। 

अंधविश्वास का जबाव तर्क नहीं विज्ञान है। जो लोक तर्क में विश्वास करते हैं वे पैराडाइम बदलते ही असली शक्ल में सामने आ जाते हैं। ध्यान रहे, जब पैराडाइम बदलते हैं तो उसके साथ ही, सारी दुनिया भी बदल जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि पैराडाइम बदलते ही हमारा विश्व दृष्टिकोण बदल जाता है, नए का जन्म होता है, वैज्ञानिक चेतना के विकास की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। यही वह बिंदु है जिस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। 

अंधविश्वास का जबाव तर्क से देंगे तो अंतत: पराजय हाथ लगेगी यदि पैराडाइम बदलकर विज्ञानसम्मत चेतना से इसका जबाव देंगे तो अंधविश्वास को अपदस्थ कर पाएंगे। हमारे रैनेसां के चिंतकों ने अंधविश्वास का प्रत्युत्तार तर्क से देने की चेष्टा की और इसका अंतत: परिणाम यह निकला कि हम आज अंधविश्वास से संघर्ष में बहुत पीछे चले गए हैं। 

तर्क को आज अंधविश्वास ने आत्मसात कर लिया है। अंधविश्वास का तर्क से बैर नहीं है उसकी लड़ाई तो विज्ञानसम्मत चेतना के साथ है।

अंधविश्वास के कारण बौध्दिक अधकचरापन पैदा होता है। इन दिनों विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के बजाय मिथकीय चेतना पर जोर दिया जा रहा है। आज विज्ञान को सत्य की खोज के काम से हटाकर व्यावहारिक उपयोग, उद्योग और युध्द के साजो-सामान के निर्माण में लगा दिया गया है। यहां तक कि धर्म और विज्ञान में सहसंबंध स्थापित करने की कोशिशें चल रही हैं। अब विज्ञान को पूंजीवाद ने महज एक चिंतन का रूप या शुध्द विज्ञान बना दिया है या उपयोगी रूप तक सीमित कर दिया है। 

एक जमाना था विज्ञान पर विश्वास था। किंतु एक अर्से के बाद विज्ञान के प्रति संशय का भाव पैदा हुआ। शुरू में विज्ञान के प्रति प्रशंसाभाव था। बाद में मोहभंग हुआ और विज्ञान के प्रति संशय भाव पैदा हुआ। आज पूंजीवादी वैज्ञानिक निराश और हताश हैं कि क्या करें? वे पीछे मुड़ नहीं सकते। आगे किस तरह बढ़ना है? बढ़ गए तो कहां पहुचेंगे? आज विज्ञान के पूंजीवादी पक्षधर परेशान हैं कि विज्ञान के इतने विराट जुलूस को कहां ले जाएं? इसके कारण विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के प्रति अविश्वास और गहरा हुआ है। 

आम लोगों से लेकर बुध्दिजीवियों तक संशयवाद बढ़ा है। इसके कारण पुन: एकसिरे से अंधविश्वास और आध्यात्मिकता की बाढ़ आ गई है। कुछ लोग मानव स्वभाव की उन्नतिशीलता को लेकर कुछ भी होता न देखकर हताशा में डूबे जा रहे हैं और विज्ञान को तिलांजलि दे रहे हैं।

 कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पहले से ही यह मानकर चल रहे हैं कि विज्ञान की सामाजिक परिणतियों पर कोई भी विचार-विमर्श हानिकर होने को बाध्य है।कुछ ऐसे लोग भी हैं जो विज्ञान के व्यावहारिक उपयोग के अलावा और किसी भूमिका पर सोचने के लिए तैयार नहीं हैं। 

कुछ लोगों के लिए विज्ञान का विनाश के अलावा और किसी काम में उपयोग संभव नहीं है। कुछ के लिए यह संपत्ति और मुनाफों के अंबार खड़ा कर देने का साधन मात्रा है। यह सही है कि पूंजीवाद समाजों में विज्ञान का सही उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। यह भी सच है कि वैज्ञानिक वेतनभोगी कर्मचारी होकर रह गए हैं। 

आज वैज्ञानिक या तो किसी विश्वविद्यालय में काम करता है या किसी उद्योग या संस्था में काम करता है। निजी साधनों से वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिक अब दुर्लभ हो गए हैं। जाहिरा तौर पर वैज्ञानिक जहां काम करता है वहां के हितों की उसे सबसे पहले पूर्ति करनी होगी। यही बिंदु है जहां पर हमें विज्ञान की सामाजिक भूमिका पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि विज्ञान बंदी है और वैज्ञानिक खरीदा जा चुका है तब अंधविश्वास के खिलाफ विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना की भूमिका शून्य के बराबर होगी।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 2-

आज हम रोम की महानता के गुण गाते हैं किंतु यह भूल जाते हैं कि रोम की महानता का आधार अंधविश्वास था। रोम की महानता के बारे में पोलिबियस ने लिखा कि मैं साहसपूर्वक यह बात कहूंगा कि संसार के शेष लोग जिस चीज का उपहास करते हैं, वह रोम की महानता का आधार है और उस चीज का नाम अंधविश्वास है। इस तत्व का उसके निजी और सार्वजनिक जीवन के सभी अंगों में समावेश कराया गया है और इसने ऐसी खूबी से उनकी कल्पनाशक्ति को आक्रांत कर लिया है कि उस खूबी को बेहतर नहीं बनाया जा सकता। संभवत: बहुत से लोग इसकी विशेषता समझ नहीं पाएंगे, लेकिन मेरा मत है कि ऐसा लोगों को प्रभावित करने के लिए किया गया है। यदि किसी ऐसे राज्य की संभावना होती, जिसके सभी नागरिक तत्वज्ञ होते तो इस तरह की चीज से हम बचे रह सकते थे। लेकिन सभी राज्यों में जनता अस्थिर है, निरंकुश भावनाओं, अकारण क्रोध और हिंसक आवेगों से ग्रस्त है। इसलिए केवल यही किया जा सकता है कि जनता को अदृश्य के भय से, और इसी किस्म के पाखंडों से काबू में रखा जाए। यह अकारण नहीं, बल्कि सुविचारित चाल थी कि पुराने जमाने के लोगों ने जनता के दिमाग में देवताओं और मृत्यु के बाद के जीवन की बातें बैठाईं। हमारी मूर्खता और विवेकहीनता यह है कि हम इस प्रकार की भ्रांतियों को दूर करना चाहते हैं।
इसके अलावा जिस विधा का निर्माण किया गया वह है चमत्कारवर्णन और दंतकथा। चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं ने अंधविश्वासों को आम जनता के जीवन में उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। किसी भी दर्शनवेत्ता और धर्मशास्त्री के उपदेशों के द्वारा पुरुषों और औरतों के समूहों को श्रध्दा, भक्ति और विश्वास की ओर नहीं मोड़ा जा सकता था। इनको प्रभावित करने के लिए अंधविश्वास का लाभ उठाना पड़ता था। यह कार्य चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं के बिना संभव नहीं था। कालांतर में इसने नागरिक जीवन की प्राचीन व्यवस्था और साथ ही, वास्तविक सृष्टि संबंधी स्थापनाओं में मिथकशास्त्र के रूप में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर लिया।
कौटिल्य का अंधविश्वास में विश्वास नहीं था किंतु उन्होंने राज्य के कौशल के तौर पर अर्थशास्त्र में अंधविश्वास की चर्चा की है। उनका न तो राजा के दैवी अधिकार और उसकी सर्वज्ञता की सच्चाई में विश्वास था और न वे यह चाहते थे कि स्वयं शासक इस तरह की वाहियात बात को सच मानें। वे सुझाव देते हैं कि राज्य को अपनी आंतरिक और बाह्य स्थितियों को सुदृढ़ करने के लिए सामान्य लोगों की अंधमान्यताओं का लाभ उठाना चाहिए।

कौटिल्य अर्थशास्त्र में अनेक ऐसे सुझाव देते हैं जो अंधविश्वासों पर आधारित हैं। संयोग से जिन उपायों को सुझाया गया है वे थोड़े फेरबदल के साथ अब भी लागू किए जाते हैं। कौटिल्य ने कुछ ऐसे साधनों को अपनाने की सलाह दी जो बहुत ही भद्दे थे और जिनका दोहरा उद्देश्य था। वे न केवल जनता के बीच अंधविश्वासमूलक भय उत्पन्न करते थे, बल्कि अंधविश्वास के विरोध में यथार्थ और ठोस कदम उठाने वाले प्रचारकों का शारीरिक रूप से सफाया करने की ओर भी लक्षित थे।

अंधविश्वास के साथ-साथ पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति की धारणा का भी व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इसका साहित्य पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार साहित्य में काव्य-रूढ़ियों का चलन शुरू हुआ।

यह मान लिया गया कि जो कुछ हो रहा है उसका उचित कारण है ज़िस कार्य में असामंजस्य है, वह अवश्य भविष्य में करने वाले को दंड देने का साधन बनेगा। इस विचार ने भारतीय साहित्य में सामंजस्यवादी दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा की है। समाज की विषमताओं और अनमेल परिस्थितियों को कभी विद्रोही दृष्टि से नहीं देखा गया।

यह मान लिया गया नाटक दुखांत नहीं होना चाहिए। असंतोष और विद्रोह के अभाव में कवि की बुध्दि अधिकाधिक सूक्तियों और चमत्कारों में उलझती गई। साहित्य में सिर्फ रस और रस में भी सिर्फ श्रृंगार रस की रचनाओं का बाहुल्य इस मार्ग के अनुसरण का स्वाभाविक परिणाम था।
   उल्लेखनीय है रस की अवधारणा की उत्पत्ति का समय तकरीबन वही है जब अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति के सिध्दांत का जन्म हुआ। रसों में हमारे प्राचीन लेखकों ने सिर्फ श्रृंगार रस पर ही मुख्यत: जोर दिया और अन्य रसों की उपेक्षा की।

तात्पर्य यह है कि अंधविश्वास के साथ आनंदमूलक मनोरंजन, कामुकता, स्त्री के सौंदर्यमूलक हाव-भावों का गहरा संबंध है। यह संबंध मध्यकाल से विकसित हुआ और आधुनिक काल तक चला आया है। अंधविश्वास के समूचे कार्य-व्यापार को यदि इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि समाज में कलाओं में नकल की प्रवृत्ति वस्तुत: अंधविश्वास के प्रति सहिष्णु भाव पैदा करती है।