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रविवार, 18 अप्रैल 2010

अमेरिकी विरोध के तर्कों को छिपाते चैनल

      टेलीविजन चैनलों का अमेरिका के साथ मूलत: वैचारिक याराना है।शायद ही कोई चैनल हो जिस पर अमेरिका का भूत सवार न हो।समाचार चैनलों की अंतर्राष्ट्रीय खबरों में अमेरिकी विदेश नीति का समर्थन आम बात है।वहीं दूसरी ओर मनोरंजन कार्यक्रमों में अमेरिकी मूल्यों,विश्वासों और संस्कारों का देशज चरित्रों और देशज कथानकों की आड़ में व्यापक तौर पर इस्तेमाल सामान्य फिनोमिना है।चैनल संस्कृति वस्तुत: अमेरिकी संस्कृति का पर्याय बन चुकी है।ऐसी अवस्था में चैनलों में अमेरिकी विरोध के स्वर खोजना बेहद मुश्किल कार्य है। इसके बावजूद अल-जजीरा जैसे चैनल भी हैं जिनमें अमेरिकी विरोध को व्यापक अभिव्यक्ति का अवसर मिला है।
    अरब देशों की अधिकांश सरकारों के अमेरिकी समर्थक हो जाने के बावजूद अधिकांश अरब जनता अमेरिका विरोधी है। यह स्थिति तब है जबकि अरब देशों में जनतंत्र का विकास नहीं हो पाया है। चैनलों की दुनिया पर अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की इजारेदारी है।इसके बावजूद विश्व स्तर और खासकर अरब जगत में अमेरिकी विरोध तेजी से बढ़ रहा है। इसके निम्न कारण हैं -
   (1)अमेरिका अबाधित उपभोग का प्रतीक है।यही वजह है कि मैकडोनाल्ड के रेस्तारांओं पर आए दिन हमले या विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं। आए दिन अमेरिकी मालों के बहिष्कार की मांग उठती रहती है।अमेरिकी मालों या मैकडोनाल्ड के उपभोक्ता ऐसे वर्ग के लोग हैं जो सिर्फ खाते हैं। खाने के अलावा और कुछ नहीं करते। मैकडोनाल्ड संस्कृति ऐसी अवस्था की ओर संकेत करती है  जिसमें धनी लोग मरणासन्न अवस्था की ओर जा रहे हैं।शरीर को इकहरा बनाए रखने के लिए अरबों डालर की डाइटिंग इण्डस्ट्री का निर्माण किया गया है।एक अनुमान के अनुसार डाइटिंग इण्डस्ट्री का सालाना कारोबार 33 विलियन डालर से ज्यादा का है।धनी लोग डाइटिंग पर अरबों डालर ऐसी अवस्था में खर्च कर रहे हैं जब सारी दुनिया में सालाना लाखों गरीब बगैर भोजन के मर रहे हैं।यह एक तरह का आत्म विध्वंसक निहित स्वार्थ है जिसका विरोध किया जाना चाहिए।
     (2)अमेरिका ऐसी सत्ता है जिसे दण्डित नहीं किया जा सकता।इसे कैसे दण्डित किया जाए इस पर सोचा जाना चाहिए।बेल्जियम की अदालत में एक याचिका इराक में युद्धापराधों के संदर्भ में अमेरिकी गठबंधन सेना के प्रमुख टॉमी फ्रैंक एवं अन्य सैन्य अधिकारियों के खिलाफ दायर की है। जिसमें 21युद्धापराधों को सूचीबद्ध किया है। यदि इस याचिका के आधार पर अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होती है तो बड़ी बात होगी। हमें सोचना चाहिए कि अमेरिका के खिलाफ आज तक कभी युद्धापराध का कोई फैसला क्यों नहीं हुआ ?निकारागुआ के मामले में एक मर्तबा फैसला हुआ था किंतु लागू नहीं हो पाया।अमेरिका विरोधी भावबोध के लिए यह जरूरी है कि युद्धापराध, मानवाधिकारों के हनन,किसी भी संप्रभु राष्ट्र की संप्रभुता पर हमले के खिलाफ मुकदमा चलाने का प्रावधान होना चाहिए।
     (3)अमेरिकी संस्कृति से घृणा का संभवत: यह भी कारण हो सकता है कि अमेरिकी चैनलों की पैकेजिंग की नकल संभव नहीं है।सीएनएन या फॉक्स जैसे चैनलों में समाचारों में रिपोर्टिंग के दौरान साफ-सुथरे,चमकीले दांतों वाले,चमकदार,सलीके से बाल काड़े हुए,सब समय मुस्कराते, हमेशा  प्रत्येक परिस्थिति में निर्भीक और सुंदर दिखने वाले संवाददाताओं को देखकर सिर्फ यही विचार पैदा होता है कि यह सब सिर्फ काले जादू से ही संभव है।ये ऐसे लोग हैं जो कभी बूढ़े नहीं होते,कभी मुरझाते नहीं हैं,उनके चेहरों पर कभी उदासी नहीं आती,कष्ट दिखाई नहीं देता,वे कभी थकते नहीं हैं,जनता से डरते नहीं हैं।
     (4)सारी दुनिया में अमेरिका के खिलाफ घृणा का यह भी कारण है कि अमेरिका ने धर्म का अपहरण कर लिया है। धर्म को साम्राज्यवाद और धार्मिक तत्ववादियों के हवाले कर दिया है।आज धर्म बंदूक की नोंक पर जिंदा है।यही वजह है कि धर्मप्राण जनता में अमेरिका के प्रति तीव्र घृणा दिखाई दे रही है।
     (5)बहुराष्ट्रीय चैनलों को गौर से देखें तो पाएंगे कि वहां पर वही जाने-पहचाने चेहरे रोज,प्रति घंटे आते हैं। और सिर्फ बातें करते हैं।उल्लेखनीय है कि अमेरिकी हमेशा बहस करते हैं, बातें करते हैं, घटनाओं पर चर्चा करते हैं किंतु कभी एक्शन का सामना करते नजर नहीं आएंगे।वे ऐसे मनुष्य हैं जो गूंगे हैं।ये ऐसे लोग हैं जो झूठ बोलते हैं।सच को छिपाते हैं।साधारण और निर्दोष लोगों की हत्या के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।इराक के मामले में यही सब कुछ देखा गया।
     (6)सच यह है कि अमेरिका के साथ रहकर कोई तटस्थ नहीं रह सकता।साथ ही अमेरिका का पक्ष लेकर सत्य भी नहीं बोल सकता।
    (7)अमेरिका का मानवाधिकारों को लेकर दोमुंहा व्यवहार रहा है।वह मानवाधिकारों पर किस तरह का रूख रखता है इसका सबूत यह है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग में अमेरिका ने इराक में मानवाधिकारों के हनन को लेकर पेश किए गए प्रस्ताव को ठुकरा दिया।यह प्रस्ताव रूस,सीरिया,सूडान,मलेशिया, लीविया, बुरखीना पासो,जिम्बाबे और अल्जीरिया ने पेश किया था। जबकि इसी संस्था ने चेचेन्या,यूगोस्लाविया,रवाण्डा,पूर्वी तीमूर,इजराइल द्वारा अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर बहस की थी।किंतु यह खबर चैनलों से नदारत थी।
   समाचार चैनलों की मुश्किल यह है कि वे जो खबरें देते हैं उनके बारे में विस्तार से या विश्लेषण के साथ सूचनाएं नहीं देते। 
   

बुधवार, 27 जनवरी 2010

मध्यपूर्व के बारे में मीडिया में इस्राइली मिथ






                     
(गाजा की इस्राइल द्वारा की गई नाकेबंदी के प्रतिवाद में फिलीस्तीन कलाकारों द्वारा बनायी पेंटिंग)                                                
    




इस्राइली सेना के बारे में पश्चिमी मीडिया यह मिथ प्रचारित कर रहा है कि वह कभी गलती नहीं कर सकता। इस्राइली हमेशा जीतेंगे। इस्राइली सेना इस्राइली जनता की रक्षा करेगी। इस्राइली चैनलों में 'हम' की केटेगरी के तहत पश्चिम की प्रशंसा और पश्चिम के साथ इस्राइली रिश्ते के साथ जोड़कर पेश किया जा रहा है। इस्राइल के द्वारा 'अन्य' या पराए की केटेगरी में समूचे अरब जगत को पेश किया जा रहा है। फिलीस्तीनी और अरब जनता को 'न्यूसेंस' और आतंकी के रूप में पेश किया जा रहा है।

इस्राइली प्रचार में कहा जा रहा है इस्राइल का लक्ष्य है 'न्यूसेंस' और आतंकवाद का विरोध करना,उसका सफाया करना।ऐसा करने में किसी भी किस्म के पश्चाताप करने की जरूरत नहीं है। अरब जनता को शक्लविहीन और आतंकी बनाने में पश्चिमी मीडिया का बड़ा हाथ है,खासकर चैनलों का।
      मीडिया आसानी से यह बात भूलता जा रहा है कि इस्राइली सैनिकों के द्वारा फिलिस्तीनी जनता पर निरंतर अमानवीय अत्याचार किए जा रहे हैं।  वे इन लोगों को अपमानित और परेशान कर रहे हैं। ऐसे में फिलीस्तीनी जनता के मन में गुस्सा,घृणा या प्रतिवाद या बदला लेने की भावना पैदा होती है या नहीं ? इस्राइल के सैनिकों के द्वारा गाजा के इलाकों में किया जा रहा अपमानजनक व्यवहार गुस्सा पैदा करता है।मीडिया इसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं देता।

गाजा और बेस्ट बैंक के इलाकों में निरंतर बमबारी बच्चों और गर्भवती औरतों के लिए गंभीर रूप से क्षति पहुँचा रही है। बच्चे और औरतें रात में सो नहीं पाते,बच्चों के कान के पर्दे फट रहे हैं,गर्भवती औरतों के बमबारी के धमाकों के कारण गर्भ गिर रहे हैं। पश्चिमी मीडिया में ये सारी बातें एकसिरे से गायब हैं।

इसके अलावा फिलीस्तीनी इलाकों में चली आ रही आर्थिक नाकेबंदी के कारण भी फिलीस्तीनी जनता का जीना दूभर हो गया है। आर्थिक नाकेबंदी के कारण इस्राइल सामूहिक तौर पर फिलीस्तीनी जनता को उत्पीडित कर रहा है। इस सारे अमानवीय कार्यकलाप का आख्यान मीडिया से गायब है। यहीं पर हमें मैनस्ट्रीम मीडिया की भूमिका के बारे में गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

खासकर आतंकवादी हमलों, युध्द और प्राकृतिक आपदा जैसे संकट के समय मैनस्ट्रीम मीडिया को वस्तुगत भूमिका अदा करनी चाहिए। संकट के समय राजनीतिक ध्रुवीकरण सबसे ज्यादा होता है। मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। ऐसी अवस्था में ही जनता के हितरक्षक के रूप में मीडिया सक्रिय भूमिका अदा करता है। संकट की अवस्था में मैनस्ट्रीम मीडिया में जो चीज सबसे पहले गायब होती है वह है वस्तुगतता।
     वस्तुगत रिपोर्टिंग के अभाव के कारण अनेक किस्म के अ-जनतांत्रिक पूर्वाग्रहों को मीडिया हवा देने लगता है। मध्य-पूर्व के संदर्भ में खासतौर पर यह बात ध्यान रखने की है कि वहां पर अरब देशों को लेकर मीडिया अपने पूर्वाग्रहों से पूरी तरह बंधा हुआ है। अरब जनता को शैतान के रूप में चित्रित करता रहा है।
  मध्यपूर्व की समस्या की बुनियादी वजह है अमेरिका का इस्राइल की तुलना में अरब देशों के साथ भेदभावपूर्ण संबंध। अमेरिका-इस्राइल के द्वारा अरब देशों के ऊपर कब्जा,उत्पीडन ,बर्बरता और अरब जनता के जीवन का अवमूल्यन।
अमेरिका की नीति है कि वह मध्यपूर्व के संकट को चुनिंदा रूप में सम्बोधित करता रहा है,कभी समग्रता में इस संकट का समाधान खोजने की कोशिश नहीं की गई।वह कभी मध्यपूर्व की समग्र जनता को सम्बोधित नहीं करता। वह उन्हें अपने शांति प्रयासों में शामिल नहीं करता। अमेरिका का सारा जोर इस्राइल की सुरक्षा पर है। यही स्थिति अमेरिकी मीडिया में भी देखी जा सकती है। अमेरिकी जनता को अपने चैनलों पर कभी इस्राइली बर्बरता के चित्र देखने को नहीं मिलते। फिलीस्तीनी इलाकों में इस्राइल ने किस तरह का संकट और तबाही पैदा की है उसके विवरण और ब्यौरे कभी दिखाए नहीं जाते। इस्राइल जहरीले रासायनिक अस्त्रों का इस्तेमाल कर रहा है,जिसके ब्यौरे गैर अमेरिकी मीडिया में मिल जाएंगे। किन्तु अमेरिकी -इस्राइली मीडिया में इसकी एकसिरे से अनुपस्थिति है।

मीडिया में मध्यपूर्व का जो थोड़ा-बहुत कवरेज आ रहा है उसमें ऐतिहासिक नजरिए का अभाव है। समस्त रिपोर्टिंग घटना केन्द्रित रहती है,समस्या और उसके ऐतिहासिक कारणों को कभी पाठक या दर्शक को नहीं बताया जाता। कहने का तात्पर्य यह है कि इस्राइली जुल्म और अरब देशों पर अमेरिका-इस्राइल के अवैध कब्जे के आख्यान के बिना मीडिया मध्यपूर्व की खबरें दे रहा है। चैनलों में यदि कभी अरब विशेषज्ञ शामिल किए जाते हैं तो बहस में एक पक्ष के रूप में,विवादी स्वर के रूप में।

यदि कभी किसी चैनल में अरब देशों के पक्षधर विशेषज्ञों से सवाल किए जाते हैं तो सवाल इस तरह का होता है कि विशेषज्ञ को रक्षात्मक मुद्रा अपनानी पड़ती है। मीडिया की मूल समस्या यह है कि उसे मध्यपूर्व में असमानता और वैषम्य नजर नहीं आता। असमानता और वैषम्य जब तक रहेगा हिंसा जारी रहेगी।

 हिंसा के लिए सिर्फ बहाना चाहिए। हिंसा का मूल कारण घटना विशेष को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। घटना विशेष तो बहाना है,मूल कारण है अमेरिका-इस्राइल का मध्यपूर्व के प्रति असमान नजरिया और भेदभावपूर्ण विदेशनीति। समस्या है इसे को चुनौती देने की।

चैनलों के द्वारा सुनियोजित ढ़ंग से ऐसी भाषा और पध्दति का इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे अमेरिकी-इस्राइली हितों और नजरिए के पक्ष में माहौल बना रहे।मसलन् बहुराष्ट्रीय मीडिया ने फिलीस्तीनी नाकेबोदी ,अहर्निश बमबारी और तबाही को युध्द की संज्ञा नहीं दी है। बहुराष्ट्रीय मीडिया ने इसे 'मध्यपूर्व संकट' , 'इस्राइल - हम्मास झगड़ा' 'इस्राइल और आतंकवाद' के बीच के संघर्ष के नाम से ही पेश किया है। इसमें इस्राइली-अमेरिकी विशेषज्ञों ,सैन्य अधिकारियों को ही बार-बार प्रमाण के रूप में पेश किया है।
इस्राइल के द्वारा फिलीस्तीनी इलाकों में किए जा रहे हमलों को आतंकवादी ठिकानों पर किए जा रहे हमले कहा है,जबकि ये सारे हमले रिहायशी इलाकों पर किए गए हैं। इस्राइली बमबारी में बच्चे,औरतें और निर्दोष नागरिक ही मारे गए हैं।ऐसे में इस्राइल का यह दावा कि उसकी सारी कार्रवाई आतंकवादियों के खिलाफ है। गलत साबित होता है। समाचार चैनलों में नंगे रूप में इस्राइली प्रचार अभियान चल रहा है। इसमें मध्यपूर्व का यथार्थ एकसिरे से गायब है। समूचा बहुराष्ट्रीय मीडिया सेंसरशिप और आत्म-सेंसरशिप से गुजर रहा है।