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रविवार, 14 फ़रवरी 2010

गोरों का मायालोक और आनंद का गद्य






हजारीप्रसाद द्विवेदी के मन पर ब्रिटिश शासन का सकारात्मक असर था। सामान्यत: हमने उनके अंग्रेजी शासन के प्रति रूख के बारे में कभी ध्यान ही नहीं दिया। यह सच है कि उनके लेखन और आलोचना में अनेक सकारात्मक तत्व हैं,उनकी आलोचना आज भी रोशनी देती है,अवधारणाओं का खजाना है। इसके बावजूद ब्रिटिश शासन की भूमिका की समग्र समझ का अभाव है। यह उनके लेखन की सबसे बड़ी कमजोरी है।

'हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास' (1952) में उन्होंने लिखा है '' सन 1860 के बाद देश में पूर्ण रूप से शांति और व्यवस्था कायम हो गई।'' सवाल उठता है कि क्या 1857 के बाद देश में शांति स्थापित हो गई थी ? क्या देश में कहीं बगावत नहीं हुई ? जी नहीं, तथ्य द्विवेदीजी के इस निष्कर्ष की पुष्टि नहीं करते।

इसके अलावा यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि 1857 के प्रति द्विवेदीजी का रूख क्या है ? वे किसके साथ हैं ? यह साल 1857 के स्वाधीनता संग्राम का शताब्दी वर्ष है और द्विवेदीजी का भी जन्म शताब्दी वर्ष है। द्विवेदीजी का मानना है कि 1860 के बाद देश में शांति और व्यवस्था स्थापित हो गई। इस संदर्भ में सिर्फ एक ही तथ्य का जिक्र करना समीचीन होगा।

सन् 1859 में सरकार की तरफ से व्यापारियों,डाक्टरों,वकीलों आदि पर लाइसेंस टैक्स का प्रस्ताव पेश किया गया,इस प्रस्ताव का सारे देश में जमकर विरोध हुआ था।इस विरोध के अग्रवर्ती गैर-ब्रिटिश लोग थे। एक अगस्त 1860 से आयकर कानून सारे देश में लागू कर दिया गया, इस कानून का उस समय नाम रखा गया 'गदर कर'।

इस कानून के खिलाफ विरोध किस कदर बढ़ गया था,इसका अंदाजा लगाने के लिए उस जमाने के कुछ वक्तव्य हमें संकेत देते हैं। पायनियर ने 3 जनवरी 1871 को लिखा '' भारत में ब्रिटिश सत्ता को पिछले नौ महीनों में लोगों की दुर्भावनाओं के कारण जितना धक्का लगा है ,वह रणक्षेत्र की आधा दर्जन पराजयों से ज्यादा है।'' पत्र ने स्वीकार किया कि ब्रिटिश भारत में सब वर्ग और जातियां एक हो गई हैं।''

 कलकत्ता के 'इंडियन डेली न्यूज' ने 22 नवंबर 1870 को स्वीकार किया कि ''कर विरोधी आंदोलन ने 1857 से ज्यादा एकता कायम कर दी है। 1857 में बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसी ने दिल्ली और लखनऊ का साथ न दिया था,लेकिन जाति,भाषा,धर्म और स्वार्थों की विषमता आयकर के मोहन मंत्र के सामने शक्तिहीन हो गयी है। ... आयकर ने साम्राज्य की देशी जातियों को एकता का एक साधारण बिंदु दे दिया है;ऐसी बात जो भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं पाई गई है।'' 

कलकत्ता के ही इंग्लिशमैन ने 30 जून 1870 को लिखा '' सरकार के खिलाफ इतना असंतोष पहले कभी नहीं देखा गया।ब्रिटिश शासकों को सारे देश में विद्रोह की आशंका दिखाई पड़ने लगी। उन्होंने मुल्ला- मौलवियों, पंडा-पुरोहितों से फतवे निकलवाए कि ब्रिटिश राज के खिलाफ जेहाद करना अनुचित है।'' क्या इन अखबारों के वक्तव्यों के बावजूद यह कह सकते हैं कि 1860 के बाद देश में शांति स्थापित हो गई थी ?

एक जगह द्विवेदीजी ने फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना के बारे में लिखा ''  अंग्रेज अफसरों ने गंभीरतापूर्वक इस देश की भाषाओं के अध्ययन का प्रयत्न किया।''  सवाल यह है कि क्या फोर्ट विलियम कॉलेज का लक्ष्य सिर्फ उतना ही था जितना द्विवेदीजी बता रहे हैं ? द्विवेदीजी ने यह भी लिखा है '' देश में नवीन युग का आरंभ हो गया था,यह यूरोपियन संपर्क का फल था।''

 इसके अलावा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का 1857 के संग्राम के प्रति जो नजरिया है वह संतुलित नहीं है,उन्होंने लिखा है ,'' और 1857 ई. में सारी भारतीय जनता विदेशी शासन-नीति से  ऊबकर विद्रोह कर बैठी।'' सवाल पैदा होता है कि क्या भारतीय जनता ने 'ऊबकर' विद्रोह किया था ?

आगे लिखा है, ''एक तरफ तो अंग्रेजों का देशी राज्यों पर अनुचित अधिकार और दूसरी तरफ ईसाई धर्म का इस प्रकार सोत्साह प्रचार,इन दो बातों ने भारतीय जनता को सशंक कर दिया,और शुभ वृध्दि से किए जाने वाले सुधारों के प्रति भी उनके चित्त में संदेह उत्पन्न कर दिया। इसका विस्फोट सन् 1857 ई. के विद्रोह के रूप में हुआ था।इस विद्रोह की प्रेरणा किसी बड़े लक्ष्य से प्राप्त नहीं हुई थी,इसीलिए इसका परिणाम भी किसी बड़े फल के रूप में नहीं  प्रकट हुआ।वह केवल भारतीय जनता के विक्षोभ को प्रकट करके समाप्त हो गया।''

क्या 1857 के संग्राम के पीछे कोई कारण अथवा लक्ष्य नहीं था ? क्या इस विद्रोह का कोई परिणाम नहीं निकला ? क्या भारतीय जनमानस को इस विद्रोह ने कोई प्रेरणा नहीं दी ? ''हिन्दी साहित्य:उद्भव और विकास'' में द्विवेदीजी का अंग्रेजों के प्रति आकर्षण साफ देखा जा सकता है।

सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम को रामविलास शर्मा ने 'महान् जन-क्रान्ति' कहा है। रामविलास शर्मा ने लिखा है, '' यह संघर्ष जनक्रान्ति इसलिए था कि सारा युध्द जनता को आधार बनाकर चला था।''

'' इस क्रान्ति की मूल धारा अंग्रेजी राज्य के विरूध्द थी।उसका मूल उद्देश्य राजनीतिक था-अंग्रेजों को निकालकर देश में अपनी सत्ता कायम करना।इस राजनीतिक उद्देश्य के अन्तर्गत और भी सामाजिक उद्देश्य थे।''

'' क्रान्ति ने गरीब आदमियों को सबसे अधिक आन्दोलित किया।''[1] '' इस क्रान्ति में उच्च वर्णों के अलावा निम्न वर्णों ने भी भाग लिया।'' रामविलास शर्मा ने इसके मूल कारणों पर रोशनी डालते हुए लिखा , '' क्रान्ति का मूल कारण अंग्रेजों की भूमि व्यवस्था, उनका शोषण और लूट ,उनकी न्याय-व्यवस्था थी। इस व्यवस्था से उत्पन्न क्षोभ ही जनता को एक कर रहा था। यह गहरा असन्तोष हिन्दुओं और मुसलमानों को अंग्रेजों के विरूध्द संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए प्रेरित कर रहा था,यह तथ्य भुलाया नहीं जा सकता।''

रामविलास शर्मा ने व्यापक परिप्रेक्ष्य बनाते हुए लिखा '' सन सत्तावन की भारतीय राज्य क्रांति उन युध्दों की श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है जिन्हें उपनिवेशों की जनता ने उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप के आतताइयों के विरूद्ध छेड़ा था।'' 
इस क्रांति की सबसे बड़ी सफलता है '' अंग्रेज शासक वर्ग और भारतीय जनता में ''परस्पर विश्वास'' फिर कभी कायम नहीं हुआ।सन् सत्तावन की राज्यक्रांति की यह सबसे बड़ी सफलता थी।''

 आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 1857 के विद्रोह का परवर्ती हिन्दी साहित्य पर कोई प्रभाव भी दर्ज नहीं किया है। जबकि समकालीन साहित्य पर इस विद्रोह ने गहरी छाप छोड़ी। 

इसके बावजूद एक महत्वपूर्ण तथ्य द्विवेदीजी ने रेखांकित किया है और यह वह तथ्य है जिसको रामविलास शर्मा नहीं मानते। द्विवेदीजी ने लिखा है , '' रेल तो सन् सत्ताावन के विद्रोह का प्रमुख कारण थी और तार उस विद्रोह को दबाने का सफल अस्त्र साबित हुआ था।''

हजारीप्रसाद द्विवेदी के 1857 संबंधी नजरिए का मूल्यांकन करने का यह निष्कर्ष न निकाला जाए कि वे अंग्रेजभक्तथे,ब्रिटिशपरस्त थे। द्विवेदीजी पर बंगाल के प्रभाव का यह नकारात्मक पहलू है।

बंगाल के प्रभाव के अनेक सकारात्मक पक्षों की नामवर सिंह ने 'दूसरी परंपरा की खोज' में चर्चा की है। किंतु 1857 के संबंध में द्विवेदीजी के नजरिए के बारे में वे किनारा करके निकल गए हैं। 1857 वाले सवाल को छोड़ दें तो द्विवेदीजी के इतिहासबोध में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के सैंकड़ों तीर भरे पड़े हैं।

द्विवेदीजी की आलोचना पध्दति का खासकर सबसे ज्यादा महत्व है। वे आलोचना या इतिहास लिखते समय सिर्फ सकारात्मक तत्व पर नजर रखते हैं, नकारात्मक तत्व की अमूमन उपेक्षा करते हैं अथवा हाशिए पर रखते हैं या चलताऊ ढ़ंग से जिक्र करते हैं। 

द्विवेदीजी ने भारतेंदु के बारे में जो बातें लिखी हैं ,उनमें से अनेक बातें स्वयं द्विवेदीजी पर घटती हैं,उन्होंने लिखा है कि  '' उनमें एक विचित्र प्रकार की अंतर्दृष्टि और सहजबोध था।'' भारतेंदु ने यदि जीवन्त साहित्य की रचना की तो द्विवेदीजी ने जीवन्त आलोचना की रचना की,ऐसे गद्य की सृष्टि की जिसे आप पढ़ते जाइए और सिर्फ पढ़ते जाइए,आप कभी बोर नहीं होंगे।

रोलां बार्थ के शब्दों में यह 'पाठ का आनंद' है। भारतेंदु की तरह ही उनकी आलोचना में दानशीलता का वर्चस्व है। वे अपना सर्वोत्तम लुटाना चाहते हैं। सर्वोत्तम देकर भी जाते हैं।

''दूसरी परंपरा की खोज'' में दिए गए विवरण बताते हैं कि द्विवेदीजी काफी सहज और सरल स्वभाव के थे। भारतेंदु के बारे में वे लिखते हैं '' जो व्यक्ति सहज होता है ,वही महान् होता है। क्रूरता और वक्रता मनुष्य को सामयिक सफलता देती है,परंतु उनसे स्थायी लाभ नहीं होता।'' द्विवेदीजी ने भारतेंदु के जिन तीन गुणों की चर्चा की है वे स्वयं उनमें कूट-कूटकर भरे थे। 





मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

नामवरजी की आलोचना भक्तों की दासी है




 नामवर सिंह की आलोचना की सामान्य विशेषता है सच से पलायन। भक्तों को परेशानी हो सकती है। दो ही उदाहरण काफी हैं। कुछ साल पहले अलका सरावगी को जब साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था तब नामवर जी ने कहा था विगत 50 सालों में ऐसा शानदार उपन्यास नहीं लिखा गया, हाल ही में अपने शिष्य पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब के लोकार्पण के अवसर पर कहा कि आलोचना में यह किताब हजारीप्रसाद द्विवेदी की लिखी कबीर किताब के बाद की सबसे श्रेष्ठ आलोचना किताब है। ये दोनों बयान तथ्य और आलोचना के अनुसार गलत हैं।सच यह है आलोचना में गलतबयानी के लिए नामवरजी जाने जाते हैं।
  सवाल यह है कि आलोचक की गलतबयानी का आलोचना पर क्या असर होता है ? गलतबयानी अफवाह है, इससे फासीवाद या प्रतिक्रियावाद का सामाजिक-वैचारिक आधार तैयार होता है। नामवरी टिप्पणियां यह काम सुंदर ढ़ंग से करती रही हैं। नामवरजी का इस तरह का चलताऊ भाव चेलों को मोटा बना सकता है,आलोचना को नहीं। यह ज्ञान का शासकीय तर्कशास्त्र है। इसका दूसरी परंपरा से कोई संबंध नहीं है। जरा नामवरजी अपने गुरुवर को याद करें शायद रास्ता नजर आए।
           
साम्राज्यवादी चिंतकों का मानना था सभ्यता और संस्कृति का प्रकाश भारत में तब आया जब उनका शासन आया, द्विवेदीजी ने इस धारणा का अपनी अनेक कृतियों में बार-बार खण्डन किया है। इस क्रम में संस्कृति के विमर्श को औपनिवेशिकता और साम्राज्यवाद के पैराडाइम के बाहर ले जाते हैं। संस्कृति को साम्राज्यवादी निर्मिति नहीं मानते। संस्कृति के विमर्श को साम्राज्यवादी हमले और वर्चस्व के दायरे के बाहर ले जाकर विश्लेषित करते हैं। संस्कृति को औपनिवेशिक परिवेश के बाहर रखते हैं। साम्राज्यवादी विचारधारा के द्वारा किए गए लिंगभेद को भी नहीं मानते।

लिंगभेद की साम्राज्यवादी समझ है कि लिंगभेद स्वाभाविक है। वह जैसा है उसे वैसा ही मानो,बनाए रखो। साम्राज्यवादी विचारकों ने संस्कृति के विमर्श को लिंगभेद,राष्ट्रवाद, नस्ल, बॉयोलॉजी आदि के साथ जोड़कर पेश किया।संस्कृति के साथ ये सारे पदबंध द्विवेदीजी अस्वीकार करते है।संस्कृति को मानवीय विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया में रखकर परिवर्तनीय रूप में देखते हैं। बल्कि अनेक स्थानों पर संस्कृति को कारण और प्रभाव के दायरे से आगे ले जाकर ज्यादा जटिल रूप में देखते हैं।

द्विवेदीजी के लिए संस्कृति ज्ञान का आधार है,ज्ञान अर्जित करने का प्रकार है। इस क्रम में वे संस्कृति और ज्ञान के अन्तस्संबंध को उद्धाटित करते हैं। इसका प्रधान कारण यही है कि साम्राज्यवादी विचारकों के द्वारा संस्कृति के बहाने हमारे ज्ञान को ही प्रदूषित करने ,विकृत करने, साधारण जनता को ज्ञान से वंचित करने का प्रयास किया था,संस्कृति हमारे सांस्कृतिक रूपों का ही खजाना नहीं है,बल्कि ज्ञान का भी खजाना है,संस्कृति को जानने का अर्थ है नॉलेज सोसायटी में दाखिल होना।

संस्कृति के जरिए अवधारणा,वस्तु,विचार,मूल्य आदि के निर्माण की प्रक्रिया का ज्ञान होता है। यही वजह है कि वे सांस्कृतिक रूपों को प्रतिरोध के रूपों के तौर पर विकसित करते हैं। साम्राज्यवादी विचारकों ने संस्कृति को नस्ल,साम्प्रदायिकता, धर्म, राष्ट्रवाद और जीवन शैली से जोड़ा,इसके प्रत्युत्तर में द्विवेदीजी ने संस्कृति को ज्ञान और प्रतिरोध से जोड़ा।ज्ञान और प्रतिरोध उनकी अस्मिता की धुरी हैं। साम्राज्यवादी अस्मिता की धारणा में सब कुछ अनालोचनात्मक रूप से स्वीकार कर लेने का भाव है। जबकि द्विवेदीजी द्वारा वर्णित या निर्मित अस्मिता में आलोचनात्मक विवेक मूलाधार है।

इसके अलावा अस्मिता के लिए परिप्रेक्ष्य की धारणा का महत्व है। परिप्रेक्ष्य के आधार पर ही वे साम्राज्यवादी आधुनिकता से अपने को  अलगाते हैं। साम्राज्यवादी आधुनिकता में परिप्रेक्ष्य का कोई महत्व नहीं है।जो परंपरा में है वह सब कुछ स्वीकार्य है। जबकि द्विवेदीजी परिप्रेक्ष्य और चयन की धारणा का इस्तेमाल करते हैं। साम्राज्यवादी धारणा में संस्कृति के प्रति प्रभुत्व और उल्लंघन अथवा अवमानना  का भाव है। जबकि द्विवेदीजी के यहां संस्कृति के क्षेत्र में प्रभुत्व के विचार का अभाव है,वे एक नहीं अनेक संस्कृतियों की ओर संकेत करते हैं,सबके प्रति समान नजरिया अपनाते हैं। वे संस्कृति के निर्माण की प्रक्रिया में सत्ता की भूमिका को ज्यादा महत्व नहीं देते। इसके विपरीत संस्कृति की अन्तर्क्रियाओं को उद्धाटित करते हैं। संस्कृति की खोज में साम्राज्यवादी विचारकों के द्वारा सामाजिक और ऐतिहासिक अनुमानों का सहारा लिया गया है ,इसके विरीत द्विवेदीजी अनुमान की बजाय तर्क और प्रमाण को ज्यादा महत्व देते हैं।
     
साम्राज्यवादी चिन्तकों के यहां 'डिशकवरी' या खोज पर जोर है,अनुमान इसकी धुरी है। इसके विपरीत द्विवेदीजी आलोचना पध्दति के रूप में 'डिशकवरी' की धारणा की उपेक्षा करते हैं।इसके प्रत्युत्तर में ऐतिहासिक नजरिए से संस्कृति की व्याख्या और परिवर्तनों को सामने लाते हैं, वे जाने-अनजाने यह संदेश भी देते हैं कि संस्कृति हमारी स्मृति और विलुप्त स्मृति है। इसे खोज के जरिए नहीं बल्कि ऐतिहासिक नजरिए से परंपरा की निरंतरता के क्रम में ही पढ़ा जाना चाहिए। द्विवेदी जी भारतीय समाज और संस्कृति की इमेज को भारतीय अवधारणाओं, इमेजों,प्रतीकों आदि में पेश करते हैं।
क्या नामवरजी आरंभ में उल्लिखित लेखकों के संदर्भ में ऐसा कुछ भी करते हैं ? जी नहीं, नामवरजी ने आलोचना को भक्तों की दासी बना दिया है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

दूसरी परंपरा के अंत का आख्यान रच रहे हैं नामवर सिंह

                   (स्व.आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी )


                         ( नामवर सिंह )

इन दिनों विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं,टीवी चैनलों आदि में जो साहित्य समीक्षा आ रही है उसका साहित्य की बजाय मासकल्चर से संबंध है।वह मासकल्चर का हिस्सा है।यह अचानक नहीं है कि साहित्य के हिन्दी में सबसे बड़े आलोचक के रूप में नामवर सिंह जाने जाते हैं,इन्हें ही मासकल्चरीय पुस्तक समीक्षा का प्रमुख समीक्षक भी कहा जा सकता है। यही कार्य अपने-अपने तरीके से अनेक साहित्यिक पत्रिकाएं भी कर रही हैं।

इस समीक्षा का मूल लक्ष्य है किताब का बाजार तैयार करना,प्रकाशक का मुनाफा बढ़ाना,लेखक की प्रतिष्ठा में इजाफा करना। इसमें लेखक और किताब को जनप्रिय बनाने और प्रशंसक पैदा करने का प्रमुख भाव है। यह दूसरी परंपरा का विघटन है। क्या टेलीविजन से प्रसारित नामवरजी की पुस्तक समीक्षा आलोचना का क्षय है। यह दूसरी परंपरा का अंत भी है। यह बाजारु समीक्षा है। ऐसी अवस्था में हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि हमें रोशनी प्रदान कर सकती है। 

 एडवर्ड सईद के शब्दों में 'आलोचना की भूमिका बुनियादी तौर पर मूलगामी, धर्मनिरपेक्ष,अन्वेषकीय और तुलनात्मक रूप से गतिशील होती है।' आलोचना मूलत: बौध्दिक और विवेकपूर्ण (रेशनल) गतिविधि है।                
हजारीप्रसाद द्विवेदी मानवतावादी आलोचक हैं। उनकी आलोचना की बुनियाद है अस्मिता और स्मृति की राजनीति। पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में स्थित विश्वभारती के माहौल में जिन दिनों भारत की अस्मिता बचाने की पुरजोर कोशिशें चल रही थीं उस समय द्विवेदीजी यहां आए। उस समय भारतीय अस्मिता की रक्षा में समूचा रवीन्द्र स्कूल लगा हुआ था,इस क्रम में जहां एक ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के द्वारा निर्मित अस्मिता की राजनीति को चुनौती दी जा रही थी, दूसरी ओर भारतीय कठमुल्लों के द्वारा निर्मित अस्मिता को भी चुनौती दी गयी। अस्मिता के इन दोनों ही रूपों को चुनौती देने के लिए जरूरी था कि अस्मिता और स्मृति का नया संसार रचा जाय।
    
ब्रिटिश राजनीति के मुताबिक हमारा अतीत अंधकारमय था,वहीं कठमुल्लों के लिए अतीत में सब कुछ सुंदर था, इन दोनों में एक बात पर एका था कि दोनों का अतीत के प्रति आलोचनात्मक रवैयया नहीं था,दोनों के पास चयन का परिप्रेक्ष्य नहीं था। दोनों के लिए अतीत पूर्णत: निष्पन्न था।

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अतीत की निष्पन्नता को निशाना बनाया और आलोचना में सबसे पहले यह तथ्य पध्दति के रूप में रेखांकित किया कि अतीत कोई निष्पन्न या कम्प्लीट,अपरिवर्तनीय तत्व नहीं है।बल्कि उसे बार-बार निर्मित किया गया है। अतीत का जो भी बोध हमारे पास है उसका अतीत से कम वर्तमान के नजरिए से ज्यादा संबंध है।

अतीत को अतीत के नजरिए से नहीं वर्तमान के नजरिए से देखा जाना चाहिए। वर्तमान के नजरिए से अतीत को देखने का अर्थ है अतीत को परिवर्तनीय,गतिशील और निरंतर अपडेटिंग की प्रक्रिया का हिस्सा बना देना। जिस तरह वर्तमान अपने को अपडेट करता है,अतीत भी मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन के जरिए अपडेट करता है।यह स्वाभाविक प्रक्रिया है।मजेदार बात यह है कि अतीत को अपडेट करने का यह काम हजारीप्रसाद द्विवेदी के बाद हिन्दी में बंद हो गया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना की केन्द्रीय विशेषता यह है कि इसमें विमर्श के सामंती,औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी इन तीनों ही पैराडाइम को आधार नहीं बनाया गया है। वे इनसे जुड़ी किसी भी केटेगरी का भी इस्तेमाल नहीं करते।इसके अलावा उनका समूचा विमर्श अवधारणाओं के रूप में सामने आता है।

हिन्दी में पहलीबार अवधारणाओं का खजाना सामने आता है।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने यदि मुकम्मल साहित्येतिहास दिया तो हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इतिहास और आलोचना को अवधारणाओं में सोचने का मंत्र दिया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी के पहले हमारे पास मौलिक अवधारणाएं बहुत कम थीं। अवधारणाओं में सोचने का अर्थ है अस्मिता के निर्माण का सैध्दान्तिक आधार तैयार करना। अस्मिता,अवधारणा और स्मृति इन तीन तत्वों का व्यापक स्तर पर प्रयोग द्विवेदीजी की आलोचना की केन्द्रीय विशेषता है।वे इन तीनों के बीच में अन्तस्संबंध भी मानते हैं। इन तीनों का लक्ष्य है मनुष्य की परिवर्तनीय अवस्था को सामने लाना।मनुष्य और साहित्य के अन्तस्संबंध को सामने लाना, इस क्रम में उन्होंने आलोचना पध्दति में प्रक्रिया और ऐतिहासिकता की धारणा का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया है। ऐतिहासिक प्रक्रिया बदलती है तो साहित्य भी बदलता है। परंपरा भी बदलती हैं।अस्मिता भी बदलती है।ऐतिहासिक प्रक्रिया के आधार पर ही परंपरा और संस्कृति का मूल्यांकन पेश किया ।

द्विवेदी जी के यहां ऐतिहासिक प्रक्रिया के साथ मूल्य,विश्वास,अभ्यास,व्यवहार,विमर्श आदि जुडे हैं।जबकि साम्राज्यवादी और सामंती दोनों ही दृष्टियों में इसके प्रति घृणा और विरोध का भाव है।दूसरी महत्वपूर्ण पध्दतिगत विशेषता यह है कि वे ऐतिहासिकता को प्रतिवाद के अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करते हैं। आलोचना पध्दति की चौथी विशेषता है वर्चस्व का अस्वीकार । आलोचना में भेदबुध्दि ,छोटे-बड़े,शिक्षित-अशिक्षित, जनप्रिय साहित्य और साहित्य, केटेगरी के यांत्रिक प्रयोग का निषेध।साहित्य के सभी रूपों को समानता की नजर से देखना।
      

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

कब्र से कोई नहीं लौटा नामवर जी




इसबार के दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह की चार किताबों के लोकार्पण का विज्ञापन 3-4 दिन पहले पढ़ा था , पढ़कर झटका लगा और सवाल उठा कि क्या नामवरजी को भी लोकार्पण जैसे बेहूदे कर्मकांड की जरुरत है ? क्या गुरुदेव भी साहित्यिक कर्मकांड में विश्वास करते हैं ? आखिरकार कर्मकांड पर क्यों उतर आए हैं नामवर जी ? असल समस्या यह है कि आलोचना को कब्रिस्तान तक पहुँचाने वाले नामवरजी ही हैं ,अब वह चाहते हैं कि आलोचना कब्र से लौट आए, गुरुदेव जानते हैं कब्र से कोई नहीं लौटा। अब कुछ आलोचना के वर्तमान हालात पर बातें करें।


आधुनिक हिन्दी आलोचना इन दिनों ठहराव के दौर से गुजर रही है,आलोचना में यह गतिरोध क्यों आया ? आलोचना में जब गतिरोध आता है तो उसे कैसे तोड़ा जाए ? क्या गतिरोध से मुक्ति के काम में परंपरा हमारी मदद कर सकती है ? क्या परंपरागत आलोचना के दायरे को तोड़ने की जरूरत है ? 
       आलोचना की दो पद्धतियां प्रचलन में हैं,इनमें पहली है रामविलास शर्मा की,दूसरी है नामवर सिंह की। दोनों के अंधभक्तों की कमी नहीं है। आलोचना में इसी अंधभक्ति के कारण सबसे ज्यादा समस्याएं पैदा हुई हैं। आलोचना में ठहराव अंधभक्ति और अनुकरण के कारण पैदा होता है। दूसरी ओर आलोचना पध्दति में श्रध्दा के तत्व का कोई स्थान नहीं है। आलोचना के लिए श्रद्धा की बजाय आलोचनात्मक विवेक की जरूरत होती है।

 किसी भी आलोचक की आलोचना एकांगी ढ़ंग से,वकील की शैली में नहीं की जानी चाहिए। आलोचना का अर्थ वकील की दलीलें नहीं है। आलोचक को वकील नहीं होना चाहिए। इसके अलावा आलोचना मे ठहराव आत्मगतबोध के कारण भी आता है,आलोचना को इच्छित दिशा में मोड़ना,आत्मगतता के तत्व का हावी हो जाना,आलोचना के यथार्थ से कट जाने का संकेत है।आलोचना मूलत: संवाद है,सापेक्ष संवाद है,समस्याकेन्द्रित संवाद है,पध्दतिगत संवाद है,आलोचना विनिमय है। आलोचना देती है तो लेती भी है। जो आलोचना इस दोहरी प्रक्रिया से नहीं गुजरती वह ठहराव की शिकार हो जाती है।
            यह जनतंत्र का युग है,इस युग का नायक है मनुष्य। मनुष्य और मानवतावाद इस दौर के विचारधारात्मक संघर्ष की धुरी हैं। किसी भी विचारधारा अथवा व्यवस्था की कसौटी है मानवाधिकार,पितृसत्ता और साम्राज्यवाद के प्रति उसका रुख क्या है ? नामवरजी ने इन पहलुओं पर कुछ भी नहीं लिखा। पितृसत्ता और साम्राज्यवाद की आलोचना के बिना आलोचना अप्रासंगिक है। 
         आलोचना जब एकांगी हो जाती है तो आलोचना में गतिरोध पैदा होता है,गतिरोध को तोड़ने अथवा आलोचनात्मक विकास की बुनियादी शर्त है आलोचना के सकारात्मक तत्वों की मींमासा पर जोर। मौजूदा आलोचनात्मक गतिरोध का एक अन्य कारण है अकादमिक स्तर पर आलोचना की सैध्दान्तिकी और पध्दति के पठन-पाठन,अनुसंधान की संरचनाओं और परंपरा का अभाव। इसी के गर्भ से यह भाव भी पैदा हुआ है कि कम लिखो और ज्यादा कमाओ, कम लिखो और ज्यादा कॉमनसेंस से सोचो और बोलो, हिन्दी में ज्यादा लिखने वाले को खराब और कम लिखने वाले को ज्यादा बेहतर माना जाता है।गोया ज्यादा लिखना पतन की निशानी हो !
           आलोचना में गतिरोध का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है आलोचना का वाचिक परंपरा तक सीमित रहना।अकादमिक अनुशासन,लिखित रूप में आलोचना के कम से कम प्रयास हुए हैं। आलोचना में ढर्रे पर सोचने की आदत है। आलोचना के ठहराव का एक अन्य कारण यह भी है उसमें सामान्यत: हीनताबोध है ,कुछ लोग यह मानकर चलते हैं कि गंभीर आलोचना तो फलां-फंला आलोचक ही कर सकता है, हम तो बेहतर सोच ही नहीं सकते।वहीं दूसरी ओर सोचने वाले आलोचकों की हालत इस कदर पतली है कि वे सोचते और पढ़ते कम बोलते ज्यादा हैं। अथवा दोहराते ज्यादा हैं। दोहराने वालों अथवा वाचाल किस्म के आलोचकों में आलोचनात्मक विनम्रता नहीं है,वे अन्य को कम पढ़ते हैं,जिसे पढ़ते हैं उसका नाम ,संदर्भ छिपाते हैं, अन्य की बातों को अपने नाम से,मौलिक समीक्षा के नाम से चलाते हैं । अपने लेखन में हिन्दी के अनुसंधान कार्य को उल्लेख योग्य नहीं समझते। इस सबका परिणाम है आलोचना में पैदा हुआ मौजूदा गतिरोध। नामवर जी इसके आदर्श रहे हैं।
       संभवत: हमारे स्वनाम धन्य आलोचकों को आलोचना में गतिरोध नजर ही न आए। यदि वे स्वाभाविक रूप में सोच रहे हैं कि गतिरोध नहीं है तो वे गलत हैं।सवाल किया जाना चाहिए हिन्दी में 'कविता के नए प्रतिमान' के बाद आलोचना की कोई भी उल्लेखनीय कृति क्यों नहीं आयी ?यानी चालीस साल से ज्यादा समय गुजर चुका है और आलोचना में किसी कृति का न आना उल्लेखनीय दुर्घटना ही कही जाएगी। यह बात दीगर है कि इस दौर में नामवरजी के हजारों व्याख्यान हुए हैं,आलोचना में अनेक संपादकीय लेख आए हैं, किंतु उनके द्वारा आलोचना की किसी किताब का न आना,महज संयोग नहीं है। इसी तरह रामविलास शर्मा 'निराला की साहित्य साधना' के बाद आलोचना की कोई महत्वपूर्ण किताब नहीं दे पाए। जबकि इस बीच उनकी डेढ़ दर्जन किताबें आयीं। मै यहां आलोचना की मुकम्मल किताब के संदर्भ में ध्यान खींच रहा हूँ। इस तथ्य की ओर ध्यान खीचने का अर्थ यह नहीं है कि इस बीच आलोचना में कुछ भी लिखा ही नहीं गया। लिखा गया है ढ़ेरों किताबें आई हैं , हजारों लेख छपे हैं, हमने शब्दों और तर्कों के मैदान में परास्त करने का शास्त्र रचा है,आलोचना नहीं रची है।

 आलोचना जब परास्त करने, एक-दूसरे को ओछा दिखाने, मीन-मेख निकालने,छिद्रान्वेषण करने और बदनाम करने के लिए लिखी जाती है तो उसे आलोचना नहीं कहते। नामवर सिंह के द्वारा दिए गए असंख्य साक्षात्कार और लेख धीरे-धीरे किताबी शक्ल में आने शुरू हो गए हैं।उनका संवाद और साक्षात्कार विधा के रूप में मूल्यांकन होना अभी बाकी है। क्या यह सुनियोजित आलोचना है ? आलोचना के अनुशासन को केन्द्र में रखकर लिखी गयी आलोचना है ? इस बीच में यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आलोचना किसे कहते हैं ? 
आलोचना का कोई एक रूप,प्रकार,स्कूल आदि तय करना मुश्किल है,आलोचना अनेकरूपा है। आलोचना को किसी एक स्थान,एक विचारधारा आदि में सीमित करके देखना सही नहीं होगा। हम जब आलोचना का वर्गीकरण करते हैं तो यह एक स्वाभाविक कार्य है,क्योंकि प्रत्येक किस्म की आलोचना स्वयं की संरचनाओं की भी आलोचना होती है। अच्छी आलोचना वह है जो आत्म-चेतस हो। चूंकि हिन्दी में आलोचना की आकांक्षा अभी भी बची है,बिखरे हुए रूप में आलोचना लिखी जा रही है अत: वह मौजूदा ठहराव से भी मुक्त होगी। आलोचना का स्वरूप बदलेगा। 

आलोचना का नया बदला हुआ रूप बहुत कुछ सम-सामयिक विचार,संचार तकनीक,पध्दति और इण्टरडिसिपिलनरी एप्रोच पर निर्भर है।आलोचना जितना एकांगी दायरों की कैद से मुक्त होगी वह ज्यादा जनतांत्रिक होगी। मसलन् नए दौर में आलोचना भी अपने को वर्चुअल बना चुकी है। आलोचना के वर्चुअल होने का अर्थ है आलोचना का अकेलापन। पहले आलोचना साहित्य से जुड़ी थी,साहित्य के पाठक से जुड़ी थी,आलोचक,लेखक और कृति के बीच प्रत्यक्ष संबंध था,किंतु लंबे समय से यह संबंध टूट चुका है। लेखक और आलोचक के बीच अंतराल पैदा हो गया है।
         आज स्थिति यह है कि आलोचक और लेखक दोनों में अपना अस्तित्व बनाए रखने की इच्छा तो है किंतु दोनों में एक साथ रहने,संवाद करने और एक-दूसरे से सीखने और सिखाने की आकांक्षा खत्म हो गयी है। फलत: लेखक अकेला है और आलोचक भी अकेला है। दोनों में अलगाव पैदा हो गया है। अब ये दोनों एक-दूसरे से सिर्फ प्रशंसा चाहते हैं,आलोचना नहीं चाहते। आलोचना रचना का स्पर्श करके निकल जाती है जिसे हम पुस्तक समीक्षा के नाम से जानते है।पुस्तक समीक्षा आलोचना का स्पर्श है,आलोचना नहीं है। रचना से बड़ा लेखक का अहं हो गया है। लेखक आलोचक की कंपनी पसंद करता है किंतु आलोचना पसंद नहीं करता,आलोचना करते ही नाराज हो जाता है। आलोचना वह है जिसमें विश्लेषण हो,व्याख्या हो,गहराई में जाकर विवेचन किया गया हो,शब्दों के बाहुल्य या शब्दों के अभाव को आलोचना नहीं कहते। रचना के मर्म का उद्धाटन किया जाय। आलोचना का काम यह भी है कि वह रचना को उसके व्यक्त लक्ष्य के परे ले जाय,पाठक को अनुशासित करने की बजाय खास किस्म की गतिविधि के लिए प्रेरित करे। आलोचना का बुनियादी कार्य है प्रतिरोध करना और धर्मनिरपेक्ष बनाना।जो आलोचना कठमुल्लापन अथवा पोंगापंथीभाव पैदा करती है उसे आलोचना नहीं कहते। आलोचना को जनतंत्र चाहिए। आलोचना और जनतंत्र की प्रक्रियाओं के गर्भ से धर्मनिरेक्ष समीक्षा विमर्श पैदा होता है। हिन्दी आलोचना में पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष का अभाव। नामवर सिंह साक्षात प्रमाण हैं उन्होंने कभी पितृसत्ता के खिलाफ नहीं लिखा।