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रविवार, 14 फ़रवरी 2010

गोरों का मायालोक और आनंद का गद्य






हजारीप्रसाद द्विवेदी के मन पर ब्रिटिश शासन का सकारात्मक असर था। सामान्यत: हमने उनके अंग्रेजी शासन के प्रति रूख के बारे में कभी ध्यान ही नहीं दिया। यह सच है कि उनके लेखन और आलोचना में अनेक सकारात्मक तत्व हैं,उनकी आलोचना आज भी रोशनी देती है,अवधारणाओं का खजाना है। इसके बावजूद ब्रिटिश शासन की भूमिका की समग्र समझ का अभाव है। यह उनके लेखन की सबसे बड़ी कमजोरी है।

'हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास' (1952) में उन्होंने लिखा है '' सन 1860 के बाद देश में पूर्ण रूप से शांति और व्यवस्था कायम हो गई।'' सवाल उठता है कि क्या 1857 के बाद देश में शांति स्थापित हो गई थी ? क्या देश में कहीं बगावत नहीं हुई ? जी नहीं, तथ्य द्विवेदीजी के इस निष्कर्ष की पुष्टि नहीं करते।

इसके अलावा यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि 1857 के प्रति द्विवेदीजी का रूख क्या है ? वे किसके साथ हैं ? यह साल 1857 के स्वाधीनता संग्राम का शताब्दी वर्ष है और द्विवेदीजी का भी जन्म शताब्दी वर्ष है। द्विवेदीजी का मानना है कि 1860 के बाद देश में शांति और व्यवस्था स्थापित हो गई। इस संदर्भ में सिर्फ एक ही तथ्य का जिक्र करना समीचीन होगा।

सन् 1859 में सरकार की तरफ से व्यापारियों,डाक्टरों,वकीलों आदि पर लाइसेंस टैक्स का प्रस्ताव पेश किया गया,इस प्रस्ताव का सारे देश में जमकर विरोध हुआ था।इस विरोध के अग्रवर्ती गैर-ब्रिटिश लोग थे। एक अगस्त 1860 से आयकर कानून सारे देश में लागू कर दिया गया, इस कानून का उस समय नाम रखा गया 'गदर कर'

इस कानून के खिलाफ विरोध किस कदर बढ़ गया था,इसका अंदाजा लगाने के लिए उस जमाने के कुछ वक्तव्य हमें संकेत देते हैं। पायनियर ने 3 जनवरी 1871 को लिखा '' भारत में ब्रिटिश सत्ता को पिछले नौ महीनों में लोगों की दुर्भावनाओं के कारण जितना धक्का लगा है ,वह रणक्षेत्र की आधा दर्जन पराजयों से ज्यादा है।'' पत्र ने स्वीकार किया कि ब्रिटिश भारत में सब वर्ग और जातियां एक हो गई हैं।''

 कलकत्ता के 'इंडियन डेली न्यूज' ने 22 नवंबर 1870 को स्वीकार किया कि ''कर विरोधी आंदोलन ने 1857 से ज्यादा एकता कायम कर दी है। 1857 में बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसी ने दिल्ली और लखनऊ का साथ न दिया था,लेकिन जाति,भाषा,धर्म और स्वार्थों की विषमता आयकर के मोहन मंत्र के सामने शक्तिहीन हो गयी है। ... आयकर ने साम्राज्य की देशी जातियों को एकता का एक साधारण बिंदु दे दिया है;ऐसी बात जो भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं पाई गई है।'' 

कलकत्ता के ही इंग्लिशमैन ने 30 जून 1870 को लिखा '' सरकार के खिलाफ इतना असंतोष पहले कभी नहीं देखा गया।ब्रिटिश शासकों को सारे देश में विद्रोह की आशंका दिखाई पड़ने लगी। उन्होंने मुल्ला- मौलवियों, पंडा-पुरोहितों से फतवे निकलवाए कि ब्रिटिश राज के खिलाफ जेहाद करना अनुचित है।'' क्या इन अखबारों के वक्तव्यों के बावजूद यह कह सकते हैं कि 1860 के बाद देश में शांति स्थापित हो गई थी ?

एक जगह द्विवेदीजी ने फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना के बारे में लिखा ''  अंग्रेज अफसरों ने गंभीरतापूर्वक इस देश की भाषाओं के अध्ययन का प्रयत्न किया।''  सवाल यह है कि क्या फोर्ट विलियम कॉलेज का लक्ष्य सिर्फ उतना ही था जितना द्विवेदीजी बता रहे हैं ? द्विवेदीजी ने यह भी लिखा है '' देश में नवीन युग का आरंभ हो गया था,यह यूरोपियन संपर्क का फल था।''

 इसके अलावा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का 1857 के संग्राम के प्रति जो नजरिया है वह संतुलित नहीं है,उन्होने लिखा है ,'' और 1857 ई. में सारी भारतीय जनता विदेशी शासन-नीति से  ऊबकर विद्रोह कर बैठी।'' सवाल पैदा होता है कि क्या भारतीय जनता ने 'ऊबकर' विद्रोह किया था ?

आगे लिखा है, ''एक तरफ तो अंग्रेजों का देशी राज्यों पर अनुचित अधिकार और दूसरी तरफ ईसाई धर्म का इस प्रकार सोत्साह प्रचार,इन दो बातों ने भारतीय जनता को सशंक कर दिया,और शुभ वृध्दि से किए जाने वाले सुधारों के प्रति भी उनके चित्त में संदेह उत्पन्न कर दिया। इसका विस्फोट सन् 1857 ई. के विद्रोह के रूप में हुआ था।इस विद्रोह की प्रेरणा किसी बड़े लक्ष्य से प्राप्त नहीं हुई थी,इसीलिए इसका परिणाम भी किसी बड़े फल के रूप में नहीं  प्रकट हुआ।वह केवल भारतीय जनता के विक्षोभ को प्रकट करके समाप्त हो गया।''

क्या 1857 के संग्राम के पीछे कोई कारण अथवा लक्ष्य नहीं था ? क्या इस विद्रोह का कोई परिणाम नहीं निकला ? क्या भारतीय जनमानस को इस विद्रोह ने कोई प्रेरणा नहीं दी ? ''हिन्दी साहित्य:उद्भव और विकास'' में द्विवेदीजी का अंग्रेजों के प्रति आकर्षण साफ देखा जा सकता है।

सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम को रामविलास शर्मा ने 'महान् जन-क्रान्ति' कहा है। रामविलास शर्मा ने लिखा है, '' यह संघर्ष जनक्रान्ति इसलिए था कि सारा युध्द जनता को आधार बनाकर चला था।''

'' इस क्रान्ति की मूल धारा अंग्रेजी राज्य के विरूध्द थी।उसका मूल उद्देश्य राजनीतिक था-अंग्रेजों को निकालकर देश में अपनी सत्ता कायम करना।इस राजनीतिक उद्देश्य के अन्तर्गत और भी सामाजिक उद्देश्य थे।''

'' क्रान्ति ने गरीब आदमियों को सबसे अधिक आन्दोलित किया।''[1] '' इस क्रान्ति में उच्च वर्णों के अलावा निम्न वर्णों ने भी भाग लिया।'' रामविलास शर्मा ने इसके मूल कारणों पर रोशनी डालते हुए लिखा , '' क्रान्ति का मूल कारण अंग्रेजों की भूमि व्यवस्था, उनका शोषण और लूट ,उनकी न्याय-व्यवस्था थी। इस व्यवस्था से उत्पन्न क्षोभ ही जनता को एक कर रहा था। यह गहरा असन्तोष हिन्दुओं और मुसलमानों को अंग्रेजों के विरूध्द संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए प्रेरित कर रहा था,यह तथ्य भुलाया नहीं जा सकता।''

रामविलास शर्मा ने व्यापक परिप्रेक्ष्य बनाते हुए लिखा '' सन सत्तावन की भारतीय राज्य क्रांति उन युध्दों की श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है जिन्हें उपनिवेशों की जनता ने उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप के आतताइयों के विरूद्ध छेड़ा था।'' 
इस क्रांति की सबसे बड़ी सफलता है '' अंग्रेज शासक वर्ग और भारतीय जनता में ''परस्पर विश्वास'' फिर कभी कायम नहीं हुआ।सन् सत्तावन की राज्यक्रांति की यह सबसे बड़ी सफलता थी।''

 आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 1857 के विद्रोह का परवर्ती हिन्दी साहित्य पर कोई प्रभाव भी दर्ज नहीं किया है। जबकि समकालीन साहित्य पर इस विद्रोह ने गहरी छाप छोड़ी। 

इसके बावजूद एक महत्वपूर्ण तथ्य द्विवेदीजी ने रेखांकित किया है और यह वह तथ्य है जिसको रामविलास शर्मा नहीं मानते। द्विवेदीजी ने लिखा है , '' रेल तो सन् सत्ताावन के विद्रोह का प्रमुख कारण थी और तार उस विद्रोह को दबाने का सफल अस्त्र साबित हुआ था।''

हजारीप्रसाद द्विवेदी के 1857 संबंधी नजरिए का मूल्यांकन करने का यह निष्कर्ष न निकाला जाए कि वे अंग्रेजभक्तथे,ब्रिटिशपरस्त थे। द्विवेदीजी पर बंगाल के प्रभाव का यह नकारात्मक पहलू है।

बंगाल के प्रभाव के अनेक सकारात्मक पक्षों की नामवर सिंह ने 'दूसरी परंपरा की खोज' में चर्चा की है। किंतु 1857 के संबंध में द्विवेदीजी के नजरिए के बारे में वे किनारा करके निकल गए हैं। 1857 वाले सवाल को छोड़ दें तो द्विवेदीजी के इतिहासबोध में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के सैंकड़ों तीर भरे पड़े हैं।

द्विवेदीजी की आलोचना पध्दति का खासकर सबसे ज्यादा महत्व है। वे आलोचना या इतिहास लिखते समय सिर्फ सकारात्मक तत्व पर नजर रखते हैं, नकारात्मक तत्व की अमूमन उपेक्षा करते हैं अथवा हाशिए पर रखते हैं या चलताऊ ढ़ंग से जिक्र करते हैं। 

द्विवेदीजी ने भारतेंदु के बारे में जो बातें लिखी हैं ,उनमें से अनेक बातें स्वयं द्विवेदीजी पर घटती हैं,उन्होंने लिखा है कि  '' उनमें एक विचित्र प्रकार की अंतर्दृष्टि और सहजबोध था।'' भारतेंदु ने यदि जीवन्त साहित्य की रचना की तो दविवेदीजी ने जीवन्त आलोचना की रचना की,ऐसे गद्य की सृष्टि की जिसे आप पढ़ते जाइए और सिर्फ पढ़ते जाइए,आप कभी बोर नहीं होंगे।

रोलां बार्थ के शब्दों में यह 'पाठ का आनंद' है। भारतेंदु की तरह ही उनकी आलोचना में दानशीलता का वर्चस्व है। वे अपना सर्वोत्तम लुटाना चाहते हैं। सर्वोत्तम देकर भी जाते हैं।

''दूसरी परंपरा की खोज'' में दिए गए विवरण बताते हैं कि द्विवेदीजी काफी सहज और सरल स्वभाव के थे। भारतेंदु के बारे में वे लिखते हैं '' जो व्यक्ति सहज होता है ,वही महान् होता है। क्रूरता और वक्रता मनुष्य को सामयिक सफलता देती है,परंतु उनसे स्थायी लाभ नहीं होता।'' द्विवेदीजी ने भारतेंदु के जिन तीन गुणों की चर्चा की है वे स्वयं उनमें कूट-कूटकर भरे थे। 





गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

हजारीप्रसाद द्विवेदी का प्रेमाख्यान

हजारीप्रसाद द्विवेदी का प्रेम को लेकर जो नजरिया है वह स्त्री को सिर्फ शरीर के रूप में देखने,ज्ञानहीन,पिछड़ा,व्यक्तित्वहीन देखने के साम्राज्यवादी नजरिए से एकदम भिन्न है। हजारीप्रसाद द्विवेदी यह मानने को तैयार नहीं है कि व्यक्तित्वहीनता (बधिया औरत) भारतीय स्त्री की अस्मिता से ऐतिहासिक तौर पर जुड़ा फिनोमिना है। स्त्री के व्यक्तित्व और इच्छा को तरजीह देने के कारण प्रेम की एकदम नयी परिभाषा पेश करते हैं।

कालिदास की कृति 'कुमारसंभव' का मूल्यांकन करते हुए उन्होंने लिखा ''जो प्रेम शारीरिक आकर्षण से उत्पन्न था,वह क्षणभंगुर था,उसमें अशुभ का भविष्य छिपा हुआ था- शकुन्तला के शारीरिक आकर्षणजन्य प्रेम की भी यही कहानी है- परन्तु जो प्रेम तपस्या से उत्पन्न होता है,यह स्थायी होता है और शुभ भविष्य का बीज लेकर आता है।शिव-पार्वती के प्रेम में कालिदास ने इसी महान सिध्दान्त का प्रतिपादन किया है।... कुमार या काम की पराजय नारी के आन्तरिक प्रेम का पराभव नहीं है,बल्कि उसकी महिमा को और भी उज्ज्वल,और भी सरस तथा और भी महान बनाने वाला है।'' आगे लिखा ''प्रेम ,संयम और तप से उत्पन्न होता है।'' मध्ययुग के संस्कृत कवियों के बारे में लिखा '' कामशास्त्रीय ग्रंथों ने उन पर काफी असर छोड़ रखा था। इसीलिए शारीरिक-विशेषकर कामोत्तोजक अंगों के -सौंदर्य का उन्होंने खुलकर वर्णन किया है।'' आलोचना में लंबे समय तक कामशास्त्र और काव्यशास्त्र में अंतर नहीं किया जाता था। यह भी धारणा थी कि कामदेवता और कामशास्त्र का रचयिता एक ही व्यक्ति है। किंतु असल में ये दो हैं। ''कामोद्दीपक क्रिया-कलाप वस्तुत: वैनोदिक समझे जाते थे।''
   
मध्यकाल में प्रेम के तीन तरह के रूप प्रचलन में हैं एक प्रेम वह है जो नियमों का पाबंद है, सत्ता के तंत्र,मंत्र, विधान से जुड़ा है। दूसरा प्रेम वह है जो 'लोक' से जुड़ा है,तीसरा प्रेम वह है जो न नियम से जुड़ा है और न लोक परंपरा से जुड़ा है बल्कि स्त्री प्रेम के रूप में व्यक्त हुआ है। पहली और दूसरी कोटि के प्रेम के फ्रेमवर्क में रखकर सोचने वाले लेखक प्रेम में पितृसत्ता को बनाए रखते हैं।

पहले कोटि के लिए प्रेम का आदर्श कालिदास आदि महाकाव्य रचयिता हैं,दूसरे किस्म के प्रेम के रचयिता सूफी हैं,कुछ हद तक सूरदास भी हैं,तीसरी कोटि का प्रेम स्त्री के रूप में मीरा का है। प्रेम में पुंसवाद से पहले दो केटेगरी के प्रेम में मुक्ति का रास्ता नहीं दिखता। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने पहले दो किस्म के प्रेम पर ही विचार किया है,स्त्री प्रेम पर विचार नहीं किया है। प्रेम के संदर्भ में वे निश्चित रूप से रामचन्द्र शुक्ल से भिन्न अनेक नयी बातों पर रोशनी डालते हैं,किंतु प्रेम के पितृसत्तात्मक ढ़ांचे के बाहर नहीं जा पाते।

पुंसवादी विचारधारा से प्रेम को मुक्त करने का अर्थ है प्रेम में समानता के विचार की स्थापना करना, प्रत्येक किस्म के वर्चस्व का विरोध करना। हजारीप्रसाद द्विवेदी के जिस प्रेम को महान् बताया है,वह मूलत: पितृसत्ताात्मक ही है। हजारीप्रसाद द्विवेदी जिस प्रेम को पसंद करते हैं और महिमामंडन करते हैं वह भी पितृसत्तात्मक है। किंतु इस प्रेम का पुराने पितृसत्ताात्मक प्रेम से भिन्न रवैयया है।
      
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'मध्यकालीन बोध का स्वरूप' में अश्वघोष की रचनाओं का मूल्यांकन करते हुए लिखा '' अश्वघोष के काव्यों में दो पक्ष बहुत स्पष्ट रूप से उभरे हैं। संसार में जो कुछ आकर्षक और मोहक है,उसका वे सोल्लास वर्णन करते हैं किन्तु फिर भी वे उससे अभिभूत नहीं होते। क्षणभंगुर और अस्थिर समझते हैं।''

द्विवेदीजी ने इसी 'क्षणभंगुर ' और 'अस्थिर' तत्व को कालिदास के प्रेम पर भी लागू किया है। कालिदास के यहां 'तपस्या की आग से परिशोधित प्रेम' की अभिव्यक्ति हुई है। शकुंतला और दुष्यंत के प्रेम के बारे में द्विवेदीजी ने लिखा है, '' जो प्रेम शारीरिक आकर्षण से उत्पन्न हुआ था,वह क्षणभंगुर था,उसमें अशुभ भविष्य का बीज छिपा हुआ था-शकुन्तला के शारीरिक आकर्षणजन्य प्रेम की भी यही कहानी है - परन्तु जो प्रेम तपस्या से उत्पन्न होता है,वह स्थायी होता है और शुभ भविष्य का बीज लेकर आता है।...  कुमारसम्भव में कालिदास ने काम पर जो शिव की विजय दिखाई है,वह प्रेम के निखरने ,उज्ज्वल होने और महिमामण्डित बनने का साधन-मात्र है।''

इसी प्रेम का एक अन्य आयाम विरह है जो कालिदास के यहां व्यापक रूप में मिलता है। इसी क्रम में लिखा है '' प्रेम के केन्द्रगत रहस्य को जो कवि नहीं जानता वह किसी प्रकार इतनी विषम परिस्थितियों को नहीं संभाल सकता।'' सवाल यह है कि '' प्रेम '' के किस रूप की हिमायत की जा रही है ? क्या यह 'प्रेम' नियम और असमानता का पाबंद नहीं है , जी,हाँ,यह प्रेम असमानता का पक्षधर है। इसमें खास किस्म के प्रेम का आग्रह है, प्रेम की व्याख्या में पसंदीदा प्रेम के रूपायन को पसंद करना और उसे श्रेष्ठ ठहराना,स्वयं में पितृसत्तात्मकता का पक्षधर होना है, पितृसत्ता के साथ मुश्किल यह है कि वह परिवर्तनीय है, इसमें परिवर्तन करने और अपने मूल स्वभाव -वर्चस्ववादी -को बनाए रखने का गुण है।

रामचन्द्र शुक्ल ,हजारीप्रसाद द्विवेदी में पितृसत्ता के सवाल पर बुनियादी तौर पर कोई फर्क नहीं है। फर्क सिर्फ पितृसत्ता के नए और पुराने रूप का है। हजारीप्रसाद द्विवेदी को प्रेम का वह चित्रण पसंद नहीं है जिसमें स्त्री शरीर प्रमुख नहीं है, वे प्रेम से स्त्री शरीर को अलग करके देखते हैं ,प्रेम को स्त्री शरीर और स्त्री इच्छा से अलग करके देखने का अर्थ है प्रेम को पितृसत्ता के हवाले कर देना।

स्त्री का शरीर साधारण शरीर नहीं है,माया नहीं है,वायवीय नहीं है,स्त्री की इच्छाओं का भी यही हाल है। स्त्री शरीर और स्त्री इच्छाओं का कालिदास के यहां जब उद्दामभाव से वर्णन किया जाता है,स्त्री अपने शरीर और इच्छा को लेकर खेलती है तो वे अंश द्विवेदीजी को पसंद नहीं हैं। यहां तक कि पुरूष के अंदर यदि स्त्री के शरीर को लेकर आकर्षण,प्रेम,भावोन्माद आदि को  कालिदास ने चित्रित किया है तो वह भी उन्हें पसंद नहीं है। यही स्थिति उनके उपन्यासों में भी है। वहां पर भी स्त्री के शरीर को लेकर खास किस्म का रूख है। प्रेम का शारीरिक आकर्षण द्विवेदीजी को पसंद नहीं है।



बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

दूसरी परंपरा की तलाश में

हजारीप्रसाद द्विवेदीजी के आलोचना कर्म की केन्द्रीय उपलब्धि है आलोचना की असंख्य अवधारणाओं का निर्माण। उनकी बनायी अवधारणाएं आलोचना-इतिहास ग्रथों से लेकर उपन्यास तक फैली हुई हैं। मजेदार बात यह है कि प्रत्येक अवधारणा के साथ उसका परिप्रेक्ष्य भी साथ में दिया गया है। जहां मौका मिला है अवधारणा से जुड़ी बहस को खोला है। अवधारणा बनाते हुए उनकर दृष्टि के केन्द्र में वर्तमान है,उनकी बनायी अधिकांश अवधारणाएं वर्तमान आलोचना में प्रासंगिक है।

इस प्रसंग में उदाहरण स्वरुप 'मध्यकालीनबोध का स्वरूप' (1970) को लिया जा सकता है। इस किताब के पहले व्याख्यान में आलोचना क्या है ? और आलोचना में किन तत्वों का इस्तेमाल किया जा सकता है,इस पर प्रकाश डालते हुए द्विवेदीजी ने आलोचना को 'साहित्यबोध' से जोड़ा है। इस क्रम में आलोचना के लिए साहित्य और लोकप्रिय साहित्य दोनों की उपयोगिता की ओर संकेत किया है।

इसके अलावा साहित्यबोध के लिए 'कभी-कभी बाहर जाने की भी जरूरत' पर जोर दिया है। द्विवेदीजी के अनुसार सबसे बड़ी चीज है साहित्य को समझने के लिए 'बृहत्तर परिप्रेक्ष्य।' आधुनिक जमाने को पुराने जमाने से अलगाते हुए लिखा '' आधुनिक युग विज्ञान की देन है।

      मशीनों के आने बाद ही इस युग में नयी समस्याएं और उनके समझाने के लिए नये प्रयत्न सामने आने लगे। राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक स्तर पर मनुष्य परिवर्तित होने के लिए बाध्य हुआ और तेजी से उस युग का जन्म हुआ जिसे हम 'आधुनिक' कहते हैं।

     पश्चिम के देशों से हमारा सम्पर्क होने के बाद हम इस युग में प्रविष्ट हुए।इस नये युग में व्यक्ति क्रमश: स्वतंत्र होता गया है और भी स्वतंत्र होता जा रहा है। इससे से पहले के युग में मनुष्य और मनुष्य का सम्बन्ध सीधा और प्रत्यक्ष होता था,लेकिन नए युग का सम्बन्ध बाजार के माध्यम से होने लगा है। प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक,राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र तो हो रहा है परन्तु योग्यता और स्वाधीनता बाजार के मूल्यों के द्वारा नियंत्रित होती है। इसके पहले व्यक्ति या तो मालिक होता था,नौकर होता था,दास होता था,मित्र होता था, कवि होता था या आश्रयदाता होता था।आज वह ठीक ऐसा नहीं है।मध्यकालीन युग की चर्चा करते समय हमें इन सम्बन्धों का भी विश्लेषण करना पड़ेगा।''

   मध्यकाल का मूल्यांकन करते हुए द्विवेदीजी ने इसमें निहित सांस्कृतिक संवत्तियों का उद्धाटन किया। साथ ही काल-विभाजन के प्राचीन नामकरण (सतयुग वगैरह)में निहित सांस्कृतिक फिनोमिना क नए रूप में विश्लेषित किया है

    उन्होंने लिखा है '' 'मध्ययुग' शब्द का प्रयोग काल के अर्थ में उतना नहीं होता ,जितना एक खास प्रकार की 'पतनोन्मुख और जबदी हुई मनोवृत्तिा' के अर्थ में होता है। ऐसा माना जाता है कि मध्ययुग का मनुष्य धीरे-धीरे विशाल और असीम ज्ञान के प्रति जिज्ञासा का भाव छोड़ता जाता है तथा धार्मिक विचारों और स्वत: प्रमाण माने जाने वाले आप्त वाक्यों का अनुयायी होता जाता है। साधारणत: आप्त वाक्य समझे ाने वाले ग्रन्थों की बाल-की-खाल निकालने वाली व्याख्याओं पर अपनी समस्त बुध्दि खर्च कर देता है।''

 मध्यकाल के साहित्य से आधुनिक काल को अलगाते हुए द्विवेदीजी ने लिखा कि आधुनिक युग की विशेषता है 'सचेत परिवर्तनेच्छा।' भक्ति साहित्य में परिवर्तन की व्याकुलता है किंतु यह अपने आप में पर्याप्त नहीं है। क्योंकि उसका लक्ष्य है ''परलोक में मनुष्य को मुक्त करना।''

 भक्ति साहित्य की सीमा यह है कि इसके लेखकों के सामने परिवर्तन का लक्ष्य स्पष्ट नहीं था। मध्यकाल की केन्द्रीय उपलब्धि है ,''इसमें शब्द की अपेक्षा अर्थ पर अधिक ध्यान दिया गया है। जीवन को अधिक उपभोग्य और ग्राह्य बनाने पर अधिक बल है।शब्द शक्तियों का विचार किया गया है ,पर,बाल की खाल निकालने की प्रवृत्ति कम है। साहित्य और कला में उन वस्तुओं पर अधिक बल दिया गया है जो शब्दों द्वारा संकेतित होती हैं,स्वयं शब्द मात्र नहीं हैं। अजन्ता के चित्रों में और तत्कालीन साहित्य में जीवन का उमड़ता प्रवाह मिलता है।यहाँ जो भोग है वह शक्ति से पोषित और संयम से निर्देशित है। संयम लक्ष्य नहीं साधन है;और भोग भी लक्ष्य नहीं;बृहत्तर उपलब्धि का सहायक है। परवर्तीकाल में शब्द प्रधान होता गया है, अर्थ क्रमश: सिमटता गया है।अर्थ से क्रमश: कटता हुआ शब्द,स्तब्ध और प्रयोग-विरहित शैथिल्य को ही जन्म दे सकता है।''

 मध्यकालीन साहित्य के संदर्भ में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सबसे महत्वपूर्ण बात यह लिखी है कि इस युग के साहित्य के बारे में ''जानकारी के लिए सिर्फ यह जानना जरूरी नहीं है कि हम यह जानें कि इस काल के साहित्यिक लोगों ने क्या लिखा,बल्कि यह भी जानना जरूरी है कि वे किन बातों को आदर्श या श्रेष्ठ समझते थे।''साहित्य के इतिहास और आलोचना में इस पहलू का महत्वपूर्ण स्थान है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और उनके द्वारा लिखी गयी मध्यकाल के साहित्य की आलोचना इस परिप्रेक्ष्य के लिहाज से अधूरी है। शुक्लजी की आलोचना में विवरण हैं,व्याख्या है,किंतु मध्यकालीन लेखक के आदर्शों का समग्र मूल्यांकन गायब है। मध्यकालीन साहित्य की आलोचना पध्दति के लिहाज से भी यह पहलू महत्वपूर्ण है।
     
दूसरी महत्वपर्ण बात यह लिखी है कि '' इस काल में यह मान लिया गया था कि जो कुछ अच्छा था वह पहले के लोग कर गए हैं,नए सिरे से हम केवल उनकी व्याख्या कर सकते हैं। नया कुछ भी देने का दावा प्राय:खत्म हो चुका था।...  निस्संदेह व्याख्या करने के बहाने नयी चीज देने का प्रयत्न भी इस काल में किया गया,परन्तु आदर्श बराबर पुराने लोगों की कृतियां ही रही हैं।''
            




साम्राज्यवादी चौहद्दी के परे देखने की कला






हजारीप्रसाद द्विवेदी ने चार महत्वपूर्ण उपन्यास लिखे हैं। ये उपन्यास पाठात्मकता (टेक्स्चुएलिटी) के देशज रूपों को सामने लाते हैं। पाठात्मकता के जिन रूपों का उन्होंने अपने उपन्यासों में इस्तेमाल किया है। उसमें उपन्यास के ढ़ांचे के बारे में प्रचलित साम्राज्यवादी अथवा औपनिवेशिक आधारों को एकसिरे से अस्वीकार किया है। उपन्यास का पाठ और चरित्र या कहानी सार्वभौम होती है,इस धारणा को खंडित किया है। द्विवेदीजी के चारों उपन्यास 'सार्वभौमत्व' की अवधारणा के खिलाफ सशक्त हस्तक्षेप हैं।

'सार्वभौमत्व' की धारणा औपनिवेशिक विमर्श का हिस्सा है, प्रतिनिधि पात्र और प्रतिनिधि परिस्थितियों के चित्रण का नजरिया औपनिवेशिकता का हिस्सा है, इन सबको अस्वीकार करते हुए द्विवेदीजी उपन्यास को विशिष्ट धरातल पर ले जाते हैं। द्विवेदीजी के उपन्यासों का कथानक, पात्र,चित्रण आदि किसी भी किस्म के औपनिवेशिक केटेगरी के दायरे में नहीं आता। एक आलोचक के नाते वे उपन्यासों में जिस तरह के कथानक को उठाते हैं उसमें कहानी और स्मृति का सुगठित रूप सामने आता है। कहानी और स्मृति का आधार क्षणिक आवेग की अनुभूतियां नहीं हैं,किसी घटना विशेष को आधार नहीं बनाया गया है बल्कि कहानी के बहाने स्मृति के सुचिंतित विमर्श को सामने लाते हैं।
     
हजारी प्रसाद द्विवेदी के चारों उपन्यासों में प्रेम कथा मूल में है। इसमें शासक और शासित का फर्क नजर नहीं आता,प्रेमकथा के तानेबाने में सारे पात्र और मुख्य कथानक में समान रूप से शिरकत करते हैं। पुराने आख्यान को उपन्यास के रूप में पेश करते हुए वे कहीं पर भी कथानक में 'अन्तनिर्भरता' के तत्व का इस्तेमाल नहीं करते,खासकर मुख्य पात्र और कथानक का मुख्य हिस्सा शासकों पर निर्भर नहीं है। कथानक में 'अन्तनिर्भरता' के तत्व को खत्म करके द्विवेदी जी ने पात्रों और कथानक के माध्यम से साम्राज्यवादी 'अन्तनिर्भरता' को चुनौती दी है। 'वर्चस्व' की धारणा को चुनौती दी है।

मजेदार बात यह है कि चारों उपन्यास हिंसा से एकदम मुक्त हैं। किसी भी किस्म के हिंसाचार को कथानक में न आने देना साम्राज्यवादी हिंसाचार का प्रत्युत्तर है। वे प्रेम को प्रतिवाद की भाषा में पेश करते हैं। संस्कृति और उसके विमर्श को मानवीय अस्तित्व का बुनियादी आधार बनाते हैं।

साम्राज्यवादी विचारकों ने भारतीय परंपरा में भिन्नता या भेदों को व्यापक रूप में उभारा था, इसके प्रत्युत्तर में द्विवेदीजी ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान,अनुभवों के आदान- प्रदान, साझेपन पर ज्यादा जोर दिया है,द्विवेदीजी के पात्र मतभिन्नता से ज्यादा मतैक्य की ज्यादा बातें करतें हैं, इनमें एक-दूसरे के प्रति 'शेयरिंग' का भाव है।

द्विवेदीजी के उपन्यासों में कहानी पुरानी है, किंतु सरोकार और भावबोध नया है,रवैयया नया है। इन चारों उपन्यासों के जरिए वे किसी भी किस्म का नॉस्टेल्जिया पैदा नहीं करते।बल्कि अतीत को नये उभरते जगत की संगति में निर्मित करते हैं। वे क्रमश: अपने द्वारा निर्मित विमर्शों को अपदस्थ करते जाते हैं।

बाणभट्ट की आत्मकथा से लेकर अनामदास का पोथा तक का औपन्यासिक विमर्श अदस्थीकरण के तत्व का इस्तेमाल करता है। इस क्रम में वे लगातार नए विमर्श उठाते हैं। इन चारों उपन्यासों में कोई न तो आदर्श पात्र है और न आदर्श विचार है। 'आदर्श' अथवा आइडियल का इस तरह विखण्डन अन्यत्र दुर्लभ है।

द्विवेदीजी के पात्रों में 'असहमति' के तत्व का व्यापक रूप में इस्तेमाल किया गया है,इसके लिए उन्होंने सबसे पहले वर्चस्व की संरचनाओं को कमजोर बनाया है।वर्चस्व को अस्वीकार किया है। विभिन्न पात्र किसी न किसी तरह वर्चस्व को अस्वीकार करते हैं,असहमति के स्वर में बोलते हैं। 'वर्चस्व' का अस्वीकार और 'असहमति' के तत्व का व्यापक इस्तेमाल औपनिवेशिकता और उत्तर औपनिवेशिकता का अस्वीकार है। साथ ही उनके पात्र औपनिवेशिक युग में निर्मित केटेगरी का भी निषेध करते हैं।

मसलन् नए और पुराने ,आधुनिकता बनाम प्राचीनता ,विज्ञान बनाम पोंगापंथ,विज्ञान बनाम बर्बरता का भेद नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि 'भेद' की केटेगरी को किसी भी रूप में द्विवेदीजी ने अपने उपन्यासों की संरचना में इस्तेमाल नहीं किया है। उपन्यास को संरचनात्मक तौर पर 'भेद' की केटेगरी के बाहर ले जाने का मूल मकसद है औपनिवेशिक विमर्श को चुनौती देना।

हमारे समाज में 'जातिभेद' सबसे बड़ा 'भेद' है। इस 'भेद' का उल्लेख करने से कोई नहीं बचा है। सवाल यह है कि क्या साहित्य कृति या इतिहास में 'जाति' का उल्लेख 'भेद' के औपनिवेशिक दायरे में ले जाता है या नहीं ? यहां यह देखना रोचक होगा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपने इतिहास में लेखक के संदर्भ में 'जाति' का इस्तेमाल करते हैं,जबकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लेखक के संदर्भ में 'जाति' का इस्तेमाल नहीं करते।

'जाति' हमारे यहां 'भेद' का हिस्सा है,द्विवेदीजी अपनी रचनाओं में 'भेद' के परे जाते हैं। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में 'जाति' को 'भेद' से जोड़ा, 'व्यवस्था' से जोड़ा,द्विवेदीजी इसके परे जाते हैं। भारत के इतिहासकारों ने इतिहास लिखते समय 'जाति' को इतिहास का हिस्सा बनाकर पेश किया,जाति का इतिहास का हिस्सा बन जाने से समस्या और भी जटिल हुई है। जाति का जनगणना का हिस्सा बन जाने से जाति व्यवस्था पहले से ज्यादा पुख्ता हुई है।

औपनिवेशिकता ने 'जाति' को भारतीय संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनाया ,संस्कृति का मर्म बताया,आचार्य द्विवेदीजी ने संस्कृति के विमर्श में जाति को कभी मर्म तो दूर की बात है, हाशिए पर भी जगह नहीं दी है।बल्कि उपन्यासों में एथनिक पहचान का इस्तेमाल जरूर किया है।

द्विवेदीजी के यहां 'जाति' प्रमुख नहीं है,पेशा प्रमुख है, व्यक्ति के गुण प्रमुख हैं। जबकि प्रेमचंद के यहां जाति और गुण का चित्रण है साथ ही जाति वर्चस्व के रूपों का चित्रण है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रेमचंद 'जातिप्रथा' के समर्थक थे,बल्कि इसका अर्थ यह है कि प्रेमचंद औपनिवेशिक केटेगरी के परे जाकर सोच नहीं पाते,द्विवेदीजी इस दायरे का अतिक्रमण कर जाते हैं। इसी से जुड़ी एक और समस्या है वह है 'जातिभेद' का उद्धाटन क्या साम्राज्यवाद के पक्ष में जाता है या विपक्ष में ? रामचन्द्र शुक्ल और प्रेमचंद के पक्षधरों को इस सवाल के पेंच खोलने चाहिए।

'जातिभेद' के प्रश्नों को खोलने में देरिदा के 'डिफरेंस' से भी कोई मदद नहीं मिलेगी। इसका प्रधान कारण यह है कि 'डिफरेंस' में निरंतर स्थगन का भाव है। इसका अर्थ है ' डिफरेंस' का निरंतर बने रहना। 'अदर' की संरचनात्मक अनुपस्थिति। 'अदर' या 'डिफरेंस' की धारणा असंपूर्ण धारणा है। इससे 'अदर' की मुक्ति संभव नहीं है।

         द्विवेदी जी के उपन्यासों में 'सार्वभौम' की धारणा का व्यापक रूप से निषेध मिलता है। सार्वभौम की धारणा संकुचित धारणा है,यह यूरोप के प्रतिगामी सोच से उपजी धारणा है भारत जैसे वैविध्यपूर्ण देश के लिए यह धारण एकसिरे से अप्रासंगिक है। सच यह है कि यथार्थ के जिस सार्वभौम रूप की हम अभी तक पूजा करते रहे हैं उसमें यथार्थ के वैविध्य का नकार छिपा है। सार्वभौम यथार्थ से भिन्न यथार्थ का कैनवास काफी बड़ा है।यथार्थ का एक रूप सार्वभौम हो सकता है किंतु यथार्थ का वही एकमात्र आदर्श मानक नहीं हो सकता। साहित्य में यथार्थ के उतने ही मानक होंगे जितने व्यक्ति समाज में हैं,अत: यथार्थ की सार्वभौम केटेगरी बेकार और संकुचित केटेगरी है।
         
 इसी तरह नैतिकता का कोई सार्वभौम मानक नहीं हो सकता, एक जैसी नैतिकता नहीं हो सकती है, सार्वभौम के बहाने हमारे साहित्य में औपनिवेशिकता ने जिस तरह स्वातत्रत्तर आलोचना में प्रवेश किया है उससे मुक्त होने का रास्ता द्विवेदीजी के यहां से निकलता है। 'सार्वभौम' की खोज के आधार पर प्रेमचंद का टालस्टाय,लु शुन आदि के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया गया,जो गलत है।

कालान्तर में यथार्थवाद संबंधी बहस के दौरान भी आलोचकों ने 'सार्वभौम' के तत्व के आधार पर साहित्य की आलोचना की। इसके कारण समूची बहस बहुत ही संकुचित दायरे में केन्द्रित होकर रह गयी। यथार्थ वही नहीं है जो किसी बड़े लेखक ने चुना है और बहस के केन्द्र मे है, साहित्य वह भी है जो सार्वभौम नहीं है ,अज्ञात है और बहस के दायरे के बाहर है।

द्विवेदीजी के उपन्यासों में नायक या हीरो कोई नहीं है,उनके उपन्यासों की समूची संरचना इस तरह तैयार की गई है कि उसमें वे हीरो की अवधारणा को ही खंडित करते नजर आते हैं। हीरो वह है जिसके अनुयायी भी हैं,यानी हीरो और अनुयायी ये दो केटेगरी उपस्थित होनी चाहिए। दोनों में भेद होना चाहिए। द्विवेदीजी के यहां हीरो और अनुयायी में भेद नहीं है। द्विवेदीजी के पात्र व्यक्ति और समुदाय की अनुभूतियों को व्यक्त करते हैं। द्विवेदीजी के उपन्यासों का वैशिष्टय यह है कि इन्हें आप जब भी पढ़ते हैं तो लेखक की मंशा से भिन्न व्याख्या करने लगते हैं।
   
द्विवेदी के उपन्यासों में सांस्कृतिक प्रतिरोध का नया मुहावरा रचा गया है। पहला मुहावरा उपन्यासों की भाषा में छिपा है,संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के जरिए अपनी बात कहने का साहस और उसमें जनप्रिय मसलों को पेश करने की शैली विलक्षण है।

संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का गद्य इस तरह रचा गया है कि आप सिर्फ भाषा में आनंद की अनुभूति कर सकते हैं।यह जातीयभाषा के दायरे के पहले की भाषिक संरचना है।यह जातीय भाषा के विवादास्पद दायरे को अस्वीकार करने वाली भाषा है। इस भाषा में उन तमाम भाषिक पक्षों का प्रतिवाद किया गया है जिनमें जातीयभाषा उलझती है।

इस भाषा का अपना आनंद है,इस गद्य को पढ़ते चले जाने से विचार और भाषा की अनंत भूख पैदा होती है।यह ऐसी भाषा है जो 'पूर्व प्रिंट युग' से जुड़ी है। द्विवेदीजी के उपन्यासों ने इस भाषा को एक नयी पहचान दी है। संस्कृतनिष्ठ भाषा का आनंददायी खेल प्रतिरोध के दूसरे चरण में नये किस्म के ताकतवर कथानक के साथ दाखिल होता है। द्विवेदीजी इसके बहाने कथानक की नयी स्टायल या शैली का निर्माण करते हैं,यह स्टाइल पहले कभी किसी उपन्यासकार ने इस्तेमाल नहीं की। इस कथाशैली के जरिए इतिहास के अछूते और उपेक्षित पहलुओं को द्विवेदीजी सामने लाते हैं। इस क्रम में वे स्वयं की कल्पना को भी मुक्त करते हैं। द्विवेदीजी के प्रतिरोधी स्वर का तीसरा आयाम है मानवता की मुक्ति और मानव समुदाय की मुक्ति। मानव जाति की अपनी परंपरा हैं,टिकाऊ जीवनशैली है,विचारों में वैविध्य है, जीवनशैली में वैविध्य है। किसी भी किस्म की इकसारता उनके चिन्तन का हिस्सा नहीं है।
        





मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

नामवरजी की आलोचना भक्तों की दासी है




 नामवर सिंह की आलोचना की सामान्य विशेषता है सच से पलायन। भक्तों को परेशानी हो सकती है। दो ही उदाहरण काफी हैं। कुछ साल पहले अलका सरावगी को जब साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था तब नामवर जी ने कहा था विगत 50 सालों में ऐसा शानदार उपन्यास नहीं लिखा गया, हाल ही में अपने शिष्य पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब के लोकार्पण के अवसर पर कहा कि आलोचना में यह किताब हजारीप्रसाद द्विवेदी की लिखी कबीर किताब के बाद की सबसे श्रेष्ठ आलोचना किताब है। ये दोनों बयान तथ्य और आलोचना के अनुसार गलत हैं।सच यह है आलोचना में गलतबयानी के लिए नामवरजी जाने जाते हैं।
  सवाल यह है कि आलोचक की गलतबयानी का आलोचना पर क्या असर होता है ? गलतबयानी अफवाह है, इससे फासीवाद या प्रतिक्रियावाद का सामाजिक-वैचारिक आधार तैयार होता है। नामवरी टिप्पणियां यह काम सुंदर ढ़ंग से करती रही हैं। नामवरजी का इस तरह का चलताऊ भाव चेलों को मोटा बना सकता है,आलोचना को नहीं। यह ज्ञान का शासकीय तर्कशास्त्र है। इसका दूसरी परंपरा से कोई संबंध नहीं है। जरा नामवरजी अपने गुरुवर को याद करें शायद रास्ता नजर आए।
           
साम्राज्यवादी चिंतकों का मानना था सभ्यता और संस्कृति का प्रकाश भारत में तब आया जब उनका शासन आया, द्विवेदीजी ने इस धारणा का अपनी अनेक कृतियों में बार-बार खण्डन किया है। स क्रम में संस्कृति के विमर्श को औपनिवेशिकता और साम्राज्यवाद के पैराडाइम के बाहर ले जाते हैं। संस्कृति को साम्राज्यवादी निर्मिति नहीं मानते। संस्कृति के विमर्श को साम्राज्यवादी हमले और वर्चस्व के दायरे के बाहर ले जाकर विश्लेषित करते हैं। संस्कृति को औपनिवेशिक परिवेश के बाहर रखते हैं। साम्राज्यवादी विचारधारा के द्वारा किए गए लिंगभेद को भी नहीं मानते।

लिंगभेद की साम्राज्यवादी समझ है कि लिंगभेद स्वाभाविक है। वह जैसा है उसे वैसा ही मानो,बनाए रखो। साम्राज्यवादी विचारकों ने संस्कृति के विमर्श को लिंगभेद,राष्ट्रवाद, नस्ल, बॉयोलॉजी आदि के साथ जोड़कर पेश किया।संस्कृति के साथ ये सारे पदबंध द्विवेदीजी अस्वीकार करते है।संस्कृति को मानवीय विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया में रखकर परिवर्तनीय रूप में देखते हैं। बल्कि अनेक स्थानों पर संस्कृति को कारण और प्रभाव के दायरे से आगे ले जाकर ज्यादा जटिल रूप में देखते हैं।

द्विवेदीजी के लिए संस्कृति ज्ञान का आधार है,ज्ञान अर्जित करने का प्रकार है। इस क्रम में वे संस्कृति और ज्ञान के अन्तस्संबंध को उद्धाटित करते हैं। इसका प्रधान कारण यही है कि साम्राज्यवादी विचारकों के द्वारा संस्कृति के बहाने हमारे ज्ञान को ही प्रदूषित करने ,विकृत करने, साधारण जनता को ज्ञान से वंचित करने का प्रयास किया था,संस्कृति हमारे सांस्कृतिक रूपों का ही खजाना नहीं है,बल्कि ज्ञान का भी खजाना है,संस्कृति को जानने का अर्थ है नॉलेज सोसायटी में दाखिल होना।

संस्कृति के जरिए अवधारणा,वस्तु,विचार,मूल्य आदि के निर्माण की प्रक्रिया का ज्ञान होता है। यही वजह है कि वे सांस्कृतिक रूपों को प्रतिरोध के रूपों के तौर पर विकसित करते हैं। साम्राज्यवादी विचारकों ने संस्कृति को नस्ल,साम्प्रदायिकता, धर्म, राष्ट्रवाद और जीवन शैली से जोड़ा,इसके प्रत्युत्तर में द्विवेदीजी ने संस्कृति को ज्ञान और प्रतिरोध से जोड़ा।ज्ञान और प्रतिरोध उनकी अस्मिता की धुरी हैं। साम्राज्यवादी अस्मिता की धारणा में सब कुछ अनालोचनात्मक रूप से स्वीकार कर लेने का भाव है। जबकि द्विवेदीजी द्वारा वर्णित या निर्मित अस्मिता में आलोचनात्मक विवेक मूलाधार है।

इसके अलावा अस्मिता के लिए परिप्रेक्ष्य की धारणा का महत्व है। परिप्रेक्ष्य के आधार पर ही वे साम्राज्यवादी आधुनिकता से अपने को  अलगाते हैं। साम्राज्यवादी आधुनिकता में परिप्रेक्ष्य का कोई महत्व नहीं है।जो परंपरा में है वह सब कुछ स्वीकार्य है। जबकि द्विवेदीजी परिप्रेक्ष्य और चयन की धारणा का इस्तेमाल करते हैं। साम्राज्यवादी धारणा में संस्कृति के प्रति प्रभुत्व और उल्लंघन अथवा अवमानना  का भाव है। जबकि द्विवेदीजी के यहां संस्कृति के क्षेत्र में प्रभुत्व के विचार का अभाव है,वे एक नहीं अनेक संस्कृतियों की ओर संकेत करते हैं,सबके प्रति समान नजरिया अपनाते हैं। वे संस्कृति के निर्माण की प्रक्रिया में सत्ता की भूमिका को ज्यादा महत्व नहीं देते। इसके विपरीत संस्कृति की अन्तर्क्रियाओं को उद्धाटित करते हैं। संस्कृति की खोज में साम्राज्यवादी विचारकों के द्वारा सामाजिक और ऐतिहासिक अनुमानों का सहारा लिया गया है ,इसके विरीत द्विवेदीजी अनुमान की बजाय तर्क और प्रमाण को ज्यादा महत्व देते हैं।
     
साम्राज्यवादी चिन्तकों के यहां 'डिशकवरी' या खोज पर जोर है,अनुमान इसकी धुरी है। इसके विपरीत द्विवेदीजी आलोचना पध्दति के रूप में 'डिशकवरी' की धारणा की उपेक्षा करते हैं।इसके प्रत्युत्तर में ऐतिहासिक नजरिए से संस्कृति की व्याख्या और परिवर्तनों को सामने लाते हैं, वे जाने-अनजाने यह संदेश भी देते हैं कि संस्कृति हमारी स्मृति और विलुप्त स्मृति है। इसे खोज के जरिए नहीं बल्कि ऐतिहासिक नजरिए से परंपरा की निरंतरता के क्रम में ही पढ़ा जाना चाहिए। द्विवेदी जी भारतीय समाज और संस्कृति की इमेज को भारतीय अवधारणाओं, इमेजों,प्रतीकों आदि में पेश करते हैं।
क्या नामवरजी आरंभ में उल्लिखित लेखकों के संदर्भ में ऐसा कुछ भी करते हैं ? जी नहीं, नामवरजी ने आलोचना को भक्तों की दासी बना दिया है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

दूसरी परंपरा के अंत का आख्यान रच रहे हैं नामवर सिंह

                   (स्व.आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी )


                         ( नामवर सिंह )

इन दिनों विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं,टीवी चैनलों आदि में जो साहित्य समीक्षा आ रही है उसका साहित्य की बजाय मासकल्चर से संबंध है।वह मासकल्चर का हिस्सा है।यह अचानक नहीं है कि साहित्य के हिन्दी में सबसे बड़े आलोचक के रूप में नामवर सिंह जाने जाते हैं,इन्हें ही मासकल्चरीय पुस्तक समीक्षा का प्रमुख समीक्षक भी कहा जा सकता है। यही कार्य अपने-अपने तरीके से अनेक साहित्यिक पत्रिकाएं भी कर रही हैं।

इस समीक्षा का मूल लक्ष्य है किताब का बाजार तैयार करना,्रकाशक का मुनाफा बढ़ाना,लेखक की प्रतिष्ठा में इजाफा करना। इसमें लेखक और किताब को जनप्रिय बनाने और प्रशंसक पैदा करने का प्रमुख भाव है। यह दूसरी परंपरा का विघटन है। क्या टेलीविजन से प्रसारित नामवरजी की पुस्तक समीक्षा आलोचना का क्षय है। यह दूसरी परंपरा का अंत भी है। यह बाजारु समीक्षा है। ऐसी अवस्था में हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि हमें रोशनी प्रदान कर सकती है। 

 एडवर्ड सईद के शब्दों में 'आलोचना की भूमिका बुनियादी तौर पर मूलगामी, धर्मनिरपेक्ष,अन्वेषकीय और तुलनात्मक रूप से गतिशील होती है।' आलोचना मूलत: बौध्दिक और विवेकपूर्ण (रेशनल) गतिविधि है।                
हजारीप्रसाद द्विवेदी मानवतावादी आलोचक हैं। उनकी आलोचना की बुनियाद है अस्मिता और स्मृति की राजनीति। पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में स्थित विश्वभारती के माहौल में जिन दिनों भारत की अस्मिता बचाने की पुरजोर कोशिशें चल रही थीं उस समय द्विवेदीजी यहां आउस समय भारतीय अस्मिता की रक्षा में समूचा रवीन्द्र स्कूल लगा हुआ था,इस क्रम में जहां एक ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के द्वारा निर्मित अस्मिता की राजनीति को चुनौती दी जा रही थी, दूसरी ओर भारतीय कठमुल्लों के द्वारा निर्मित अस्मिता को भी चुनौती दी गयी। अस्मिता के इन दोनों ही रूपों को चुनौती देने के लिए जरूरी था कि अस्मिता और स्मृति का नया संसार रचा जाय।
    
ब्रिटिश राजनीति के मुताबिक हमारा अतीत अंधकारमय था,वहीं कठमुल्लों के लिए अतीत में सब कुछ सुंदर था, इन दोनों में एक बात पर एका था कि दोनों का अतीत के प्रति आलोचनात्मक रवैयया नहीं था,दोनों के पास चयन का परिप्रेक्ष्य नहीं था। दोनों के लिए अतीत पूर्णत: निष्पन्न था।

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अतीत की निष्पन्नता को निशाना बनाया और आलोचना में सबसे पहले यह तथ्य पध्दति के रूप में रेखांकित किया कि अतीत कोई निष्पन्न या कम्प्लीट,अपरिवर्तनीय तत्व नहीं है।बल्कि उसे बार-बार निर्मित किया गया है। अतीत का जो भी बोध हमारे पास है उसका अतीत से कम वर्तमान के नजरिए से ज्यादा संबंध है।

अतीत को अतीत के नजरिए से नहीं वर्तमान के नजरिए से देखा जाना चाहिए। वर्तमान के नजरिए से अतीत को देखने का अर्थ है अतीत को परिवर्तनीय,गतिशील और निरंतर अपडेटिंग की प्रक्रिया का हिस्सा बना देना। जिस तरह वर्तमान अपने को अपडेट करता है,अतीत भी मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन के जरिए अपडेट करता है।यह स्वाभाविक प्रक्रिया है।मजेदार बात यह है कि अतीत को अपडेट करने का यह काम हजारीप्रसाद द्विवेदी के बाद हिन्दी में बंद हो गया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना की केन्द्रीय विशेषता यह है कि इसमें विमर्श के सामंती,औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी इन तीनों ही पैराडाइम को आधार नहीं बनाया गया है। वे इनसे जुड़ी किसी भी केटेगरी का भी इस्तेमाल नहीं करते।इसके अलावा उनका समूचा विमर्श अवधारणाओं के रूप में सामने आता है।

हिन्दी में पहलीबार अवधारणाओं का खजाना सामने आता है।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने यदि मुकम्मल साहित्येतिहास दिया तो हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इतिहास और आलोचना को अवधारणाओं में सोचने का मंत्र दिया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी के पहले हमारे पास मौलिक अवधारणाएं बहुत कम थीं। अवधारणाओं में सोचने का अर्थ है अस्मिता के निर्माण का सैध्दान्तिक आधार तैयार करना। अस्मिता,अवधारणा और स्मृति इन तीन तत्वों का व्यापक स्तर पर प्रयोग द्विवेदीजी की आलोचना की केन्द्रीय विशेषता है।वे इन तीनों के बीच में अन्तस्संबंध भी मानते हैं। इन तीनों का लक्ष्य है मनुष्य की परिवर्तनीय अवस्था को सामने लाना।मनुष्य और साहित्य के अन्तस्संबंध को सामने लाना, इस क्रम में उन्होंने आलोचना पध्दति में प्रक्रिया और ऐतिहासिकता की धारणा का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया है। ऐतिहासिक प्रक्रिया बदलती है तो साहित्य भी बदलता है। परंपरा भी बदलती हैं।अस्मिता भी बदलती है।ऐतिहासिक प्रक्रिया के आधार पर ही परंपरा और संस्कृति का मूल्यांकन पेश किया ।

द्विवेदी जी के यहां ऐतिहासिक प्रक्रिया के साथ मूल्य,विश्वास,अभ्यास,व्यवहार,विमर्श आदि जुडे हैं।जबकि साम्राज्यवादी और सामंती दोनों ही दृष्टियों में इसके प्रति घृणा और विरोध का भाव है।दूसरी महत्वपूर्ण पध्दतिगत विशेषता यह है कि वे ऐतिहासिकता को प्रतिवाद के अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करते हैं। आलोचना पध्दति की चौथी विशेषता है वर्चस्व का अस्वीकार । आलोचना में भेदबुध्दि ,छोटे-बड़े,शिक्षित-अशिक्षित, जनप्रिय साहित्य और साहित्य, केटेगरी के यांत्रिक प्रयोग का निषेध।साहित्य के सभी रूपों को समानता की नजर से देखना।