हिंदी का परिप्रेक्ष्य -
आज (15-9-2018)कॉलेज में हिंदी दिवस के उपलक्ष में विभाग की ओर से रचनात्मक लेखन और भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें विद्यार्थियों ने बहुत उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया और हिंदी को लेकर बहुत सारी चिंताएं भी ज़ाहिर की। प्रतियोगिताओं के बाद आदरणीय प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी जी ने " वर्तमान समय में हिन्दी की चुनौतियाँ" विषय पर अपना ओजपूर्ण व सारगर्भित व्याख्यान दिया।अपने वक्तव्य में उन्होंने हिंदी को लेकर किसी भी तरह की हीन ग्रंथि का शिकार न होकर हिंदी को गर्व से स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। विश्व में आज अनेक भाषाएं इस संकट की स्थिति से गुजर रही हैं जिनका हवाला देते हुए उन्होंने भाषाओं के सम्मान की बात की तथा उसको जिंदा रखने के लिए आम जन की भाषा बनाने पर ज़ोर दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने प्रबुद्धजनों के साथ-साथ विद्यार्थी वर्ग को किताबों से गहरा नाता जोड़ने की बात की क्योंकि कोई भी भाषा केवल बोलने से नहीं बल्कि लिखने-पढ़ने से ही मज़बूत होती है। मेरा उनको सुनने का यह पहला अवसर था और सुनकर बहुत अच्छा लगा। आज के दिये गए वक्तव्य का सार उन्हीं की कलम से.....
भाषा कैसे बचेगी
(आज दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी डीएवी कॉलेज में दिए वक्तव्य का सार)
भाषा का भारतीय परिप्रेक्ष्य लोकतंत्र के विकास से जुड़ा है,भाषा किताबों और कक्षाओं में नहीं बनती,वह परिवेश में बनती है और परिवेश में रहती है। भारत में लोकतंत्र का परिवेश जैसा होगा भाषा का चरित्र और स्वभाव वैसा होगा।आमतौर पर लोकतंत्र में भाषाएं पर्सुएशन पर निर्भर हैं। हिंदी या किसी भाषा के विकास की प्राथमिक शर्त है कि उसके पठन-पाठन की कितनी बेहतर व्यवस्था है। हिंदी के विकास के संदर्भ में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि यदि समाज में कोई भाषा ह्रास की शिकार है तो तय मानिए अन्य भाषाएं अपने ह्रास को बचा नहीं सकतीं,आज वे तमाम समाज भाषायी संकट से गुजर रहे हैं जहां लोकतंत्र है।
भाषा के विकास के लिए जरूरी है कि उसे वर्चस्व का औजार न बनाया जाए,जो भाषा वर्चस्व की भूमिका निभाने लगती है वह जनता से कटने लगती है,उसके प्रति आम जनता में नफरत पैदा हो जाती है, सरकारी भाषा के रुप में हिंदी के प्रसार ने हिंदी को हिंदी और गैर हिंदीभाषी जनता से काटा है। यही हाल बंगला का रहा है,एक जमाने में उड़ीसा, बिहार,असम को बंगाली जाति और बंगला भाषा के वर्चस्व में रहना पड़ा,कालांतर में इन इलाकों में स्वतंत्र राज्य पैदा हुए और बंगला के वर्चस्व के खिलाफ सबसे तीखी प्रतिक्रियाएं नजर आईं,आज उड़ीसा में बंगला नजर नहीं आती,झारखंड में हिंदी और बंगला की बजाय संथाली है, उत्तराखंड में हिंदी की बजाय कुमायुंनी और गढ़वाली का जलवा है, राजस्थान में हिंदी की बजाय राजस्थानी का रुतबा है। कहने का आशय यह कि भाषा को वर्चस्व की बजाय मित्रता - समानता का उपकरण बनाएं।
उल्लेखनीय है भारत में सभी भाषाएं संकटग्रस्त हैं,हम अपनी भाषा के बारे में सोचें साथ ही अन्य भाषाओं के बारे में भी सोचें,सभी भाषाओं और बोलियों को समानता की दृष्टि से देखें।
भाषा सभ्यता की संजीवनी है, लाइफ़ लाइन है, सभ्यता को बचाना है तो भाषा अर्जित करनी होगी,जन्मना भाषा नहीं मिलती, सिर्फ बोलने से भाषा नहीं बचती, हिंदी तब बचेगी जब हिंदी भाषी क्षेत्र की अन्य बोलियां और भाषाएं बचेंगी,मसलन्, अवधी,मैथिली, भोजपुरी,उर्दू आदि बचेंगी तो हिंदी बचेगी,यह संभव नहीं है कि उर्दू,अवधी खत्म हो जाएं और हिंदी बच जाए।असल में भाषाएं एक दूसरे से अंतर्गृथित रूप में जुडी हैं।एक भाषा मरेगी तो दूसरी पर उसका बुरा असर पड़ेगा।( 15-9-2018)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें