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सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

हिन्दी साहित्य का इतिहास और हाइपरटेक्स्ट की समस्याएं -2-

हाइपरटेक्स्ट का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है 'लिंक' अथवा स्रोत। 'लिंक ' के बिना हाइपरटेक्स्ट संभव नहीं है। जितने ज्यादा लिंक अथवा स्रोत हों उतना ही सुंदर हाइपरटेक्स्ट होता है। इसी अर्थ में हाइपरटेक्स्ट को लिंक का विज्ञान अथवा लिंक का प्रबंधन भी कहा गया है। 

द्विवेदीजी ने '' हिन्दी साहित्य का आदिकाल'' और ''मध्यकालीनबोध का स्वरूप'' नामक कृतियों में प्रत्येक व्याख्यान में जिस तरह रोचक और आकर्षक ढ़ंग से लिकों को पेश किया गया है वह दुर्लभ है। ऐसा सिर्फ इंटरनेट पर उपलब्ध हाइपरटेक्स्ट में ही देख सकते हैं।

 लिंक अन्य से संबंध बनाने का संसाधन है।'लिंक' वस्तुत: अपने आरंभ से लेकर लक्ष्य की सीमा तक फैला हुआ है।इसका एक सिरा वह है जहां पाठ का अंश है,वहां से बात शुरू हो सकती है और हाइपर टेक्स्ट पर जाकर खत्म होती है। 'लिंक' का क्षेत्र 'नोड' तक फैला है। वह इसका स्रोत है।यह भी संभव है कि ज्यों ही आप माउस में क्लिक करें तुरंत दूसरा छोर या अन्य सामग्री सामने आ जाए।
हजारीप्रसाद द्विवेदी अपने व्याख्यानों में पाठ की महाव्यवस्था यानी ग्राण्डसिस्टम बनाते हैं। यह सिस्टम पहले कभी किसी ने नहीं बनाया और बाद में भी किसी हिन्दी लेखक के गद्य में इस महाव्यवस्था के दर्शन नहीं होते। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो द्विवेदी जी पाठ की व्यवस्था का अतिक्रमण करके हाइपरटेक्स्ट अथवा महापाठ की महाव्यवस्था का निर्माण करते हैं। यह महाव्यवस्था आज इंटरनेट रूपी महामीडिया का बुनियादी आधार है। 
      
हाइपरटेक्स्ट और हजारीप्रसाद द्विवेदी के पाठ में एक और समानता है कि इन दोनों का चरित्र राजनीतिक है। जिस तरह हाइपरटेक्स्ट हमेशा राजनीतिक होता है उसी तरह हजारीप्रसाद द्विवेदी का पाठ भी हमेशा राजनीतिक होता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी की उल्लिखित दोनों किताबें मूलत: हिन्दी के पाठ का परंपरा के उन रूपों से संबंध जोड़ती हैं जिनके बारे में पहले जानकारी नहीं थी। फलत: इतिहास का पैराडाइम ही बदल जाता है। 

हाइपरटेक्स्ट के निर्माता जिस तरह साहित्य की सैध्दान्तिकी के साथ उसका संबंध जोड़ रहे हैं तकरीबन यही काम अपने व्याख्यानों के जरिए द्विवेदीजी ने किया है। वे अपने व्याख्यानों के जरिए साहित्य की सैध्दान्तिकी का एक नया पैराडाइम बनाते हैं। इस पैराडाइम का आधार पाठक है। 

द्विवेदीजी के पाठ में युध्दोत्तर दौर में पैदा हुए नई वैचारिक संरचनाओं के लक्षण अथवा फिनोमिना भी देख सकते हैं। युध्दोत्तर दौर में तीन बातें हैं जो खासतौर पर उभरकर आई हैं, ये चारों तत्व डिजिटल युग की विशेषताएं भी हैं, ये हैं- 1. विकेन्द्रीकरण, 2. सद्भाव और 4. सशक्तिकरण। ये तीनों तत्व ''हिन्दी साहित्य का आदिकाल'' में साफतौर पर देखे जा सकते हैं।
     
यहीं पर  हमें 'पुस्तक' और 'हाइपरटेक्स्ट' के अन्तस्संबध और अंतर पर गौर करना चाहिए। सतह पर इन दोनों में साम्य है।किंतु प्रस्तुति भिन्न रूप में होती है।मसलन् जरूरी नहीं है कि पुस्तक को रेखीय क्रम से ही पढ़ा जाए। रेखीय क्रम से ही लिखा जाए। आप चाहें तो टुकड़ों में,अंशों में भी अपनी बात लिख सकते हैं।

 कुछ हाइपरटेक्स्ट सिध्दान्तकारों के अनुसार हाइपरटेक्स्ट को उद्धाटन करने वाला,तर्कवादी होना चाहिए। उसमें उपन्यास के तत्व भी होते हैं। मसलन् चरित्र और कहानीपन भी होता है।अधिकांश पुस्तकों में स्पष्टता होती है जिसके कारण पाठक उसे पेज-दर-पेज पढ़ता है।

'पुस्तक' और 'हाइपर टेक्स्ट' में यह दबाव होता है कि उसे तार्किक ढ़ंग से पढ़ा जाए। तार्किक रूप में पेश किया जाए। पाठक जब पढ़ता है तो उसकी मांग और निष्कर्ष के बीच तनाव आता है। हाइपर टेक्स्ट उसके सामने मार्ग खोलता है।इन मार्गों पर जाकर वह खोज कर सकता है।जांच कर सकता है।

'पुस्तक' अपने मुद्दे,तर्क,प्रतिपक्ष की राय,फुटनोट आदि को सीधे पेश करती है। जबकि 'हाइपर टेक्स्ट' इन सबको संक्षेप में पेश करता है। 'हाइपर टेक्स्ट' में रूपरेखा या 'आउट लाइन' रहती है। संक्षेप में तर्क रहते हैं। कुछ विषयों पर विस्तार भी होता है जो ठोस स्थानों और बहुत सारी इमेजों के साथ होता है। ये वे बातें होती हैं जिन्हें पुस्तक में बताया गया होता है। मूलत: यहां प्रथम व्यक्ति का वर्णन ही उपलब्ध होता है।यहां पाठक को लगता है कि वह ज्यादा आत्मसजग और आत्मालोचक है। हाइपर टेक्स्ट के अनेक रूप उपलब्ध हैं। यहां पाठ को व्यवस्थित करने,उसमें परिवर्तन करने के अनेक रूप उपलब्ध हैं। जिसके कारण पाठ की रीडिंग के समय ध्यान खींचा जा सकता है।

आज 'पुस्तक' का'हाइपर टेक्स्ट' पर बहुत सारा दबाव है।इसके बावजूद 'हाइपर टेक्स्ट' को पुस्तक नहीं कहा जा सकता। दोनों का लक्ष्य है पाठक के सामने विषय का नए रूप में उद्धाटन। ज्यादा व्यापक पाठ का उद्धाटन।
       
'हाइपर टेक्स्ट' में ऐसे भी पाठ हो सकते हैं जिनका कोई निष्कर्ष ही न हो। इस तरह के पाठ विभिन्न किस्म के पाठकों के सामने खुले होते हैं। वे पुस्तक से ज्यादा चीजें पेश करते हैं। इन्हें पढ़कर आश्चर्य की सृष्टि होती है। यह कार्य वे तर्क के संकीर्ण दायरे के फोकस को तोड़ते हुए करते हैं। वे पाठक को घोषित निष्कर्ष से परे ले जाते हैं। कितु समस्या यह है कि पाठक के अनुभवों को 'हाइपर टेक्स्ट' किस हद तक अभिव्यक्ति दे पाता है। लिखित और रचनात्मक रीडिंग में जब खेल होता है तब क्या होगा ?इसका परिणाम अंतत: व्यापक हाइपर टेक्स्ट ही होगा।यह पुस्तक के रूप से ज्यादा बड़ा होगा।
       
सवाल यह है कि आपकी उम्मीदें किस तरह की हैं ?क्या लेखक के पास लम्बे पाठ का पाठक मौजूद है ?'हाइपर टेक्स्ट' की सबसे मुश्किल समस्या यह है कि प्रत्येक पाठ को कुछ खास 'नोडस' पर जाना होगा। उसे 'नोडस' का सामना करना होगा। 'हाइपर टेक्स्ट' स्वयं प्रतिबिम्बित हो इसके लिए जरूरी है कि वह 'मल्टी नोडस' में अपना तर्क पेश न करे। तर्क और उद्धाटन के लिए जरूरी है कि ढ़ांचा हो, यह ढ़ांचा रेखीय होना चाहिए। जिससे चीजों का क्रमश: जबाव दिया जा सके। उन्हें क्रमबध्द रूप में रखा जा सके। उन्हें ऐसे लिखा जाए जैसे दार्शनिक पाठ लिखा जा रहा हो।कुछ लेखक इस पध्दति को लागू करते हैं। किंतु कुछ लेखक पुस्तक में पाठक के आश्चर्य को शांत करने लिहाज से विशेष ढ़ंग के तर्क देते हैं। 

मसलन् किसी बात पर कबीर को उध्दृत करेंगे तो उसके समर्थन में तुलसी को पेश करेंगे। इस तरह की लेखकीय प्रवृत्ति दर्शन में नहीं मिलेगी। खासकर 19वीं शताब्दी के छोटे निबंधों में यह प्रवृत्ति एकदम गायब है। किंतु द्विवेदीजी के व्याख्यानों में इस पध्दति का व्यापकतौर पर इस्तेमाल किया गया है।
     
'हाइपर टेक्स्ट' पाठ चारों ओर से खुला और फैला होता है। लिखित रूपरेखा से भिन्न दिशा में ले जाता है। अन्तर्संबंधित विषयों की ओर ले जाता है। इसके कारण इसके नरेटिव में भी अन्तर संबंध होता है। कुछ बातें ऐसी भी लिखी मिल जाएंगी जो लिखित रूपरेखा के बाहर हो सकती हैं।इन अंशों तक जाने के लिए नोडस के संपर्क में जाना होगा। खुली एप्रोच से काम लेना होगा। निष्कर्ष निकाले बगैर पढ़ना होगा। चाहें तो बाद में निष्कर्ष निकाल सकते हैं।जब आप कोई छोटा सा हाइपरटेक्स्ट निबंध पढ़ते हैं तो उसमें अनेक अन्तर-संबंधित क्षेत्रों के लिंक दिए रहते हैं। ये विभिन्न नोड्स में होते हैं।इन्हें आप जाकर खोलिए तो आपको किसी न किसी मुद्दे पर सामग्री मिल जाएगी।यहां अनेक रास्ते हैं। अनेक बिन्दु हैं जिनके साथ आप तर्क कर सकते हैं। 


रविवार, 7 फ़रवरी 2010

हिन्दी साहित्य का इतिहास और हाइपरटेक्स्ट की समस्याएं -1-

     हाइपरटेक्स्ट आज हमारे देश की ठोस वास्तविकता है। हमें इसके साहित्यिक परिणामों के बारे में जागरूक बनना चाहिए। हाइपरटेक्स्ट मूलत: कम्प्यूटर रचित पाठ है।  इस पाठ का आधार साहित्यिक गद्य रहा है। जिन लोगों ने हाइपरटेक्स्ट का निर्माण किया उन विचारक वैज्ञानिकों ने साहित्य को कम्प्यूटर की भाषा के निर्माण का आधार बनाया। हिन्दी में संभवत: आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी अकेले लेखक हैं जिनका गद्य हाइपरटेक्स्ट की विशेषताएं अपने अंदर समेटे हुए है। ''हिन्दी साहित्य का आदिकाल'' और ''मध्यकालीनबोध का स्वरूप'' उनकी ये दो  कृतियों में हाइपर टेक्स्ट के समस्त लक्षण उपलब्ध हैं। जबकि ये दोनों उनके व्याख्यान की किताबें हैं, पाठ हैं। 
 

जिस समय हजारीप्रसाद द्विवेदी लिख रहे थे वे कम्प्यूटर के प्रयोग के बारे में नहीं जानते थे। जिस दौर में उन्होंने हिन्दी में हाइपरटेक्स्ट की विशेषताओं वाला गद्य लिखा उस समय भारत में चंद संस्थानों में कम्प्यूटर का प्रयोग होता था।  
       
 हाइपरटेक्स्ट क्या है ? हाइपरटेक्स्ट के निर्माता टेड नेल्सन के अनुसार ''यह गैर-आनुक्रमिक लेखन है। यह ऐसा पाठ है जो पाठक को विभिन्न शाखाओं में चयन की अनुमति देता है। इसे बेहतर ढ़ंग से इंटरेक्टिव स्क्रीन पर पढ़ सकते हैं। यह सीरीज में फैला हुआ पाठ है। इसके अनेक लिंक हैं। ये पाठक को रास्ता सुझाते हैं।''

''एकरेखीयता और एक ही व्याख्या को हाइपरटेक्स्ट अस्वीकार करता है। हाइपर टेक्स्ट का ही यह प्रभाव है कि आज सारी दुनिया में एकरेखीयता की जगह गैर-रेखीयता केन्द्र में आ गई है। गैर-रेखीयता एक नियम बन गयी है। अब विमर्श एक ही दिशा और एक ही दृष्टिकोण की बजाय विभिन्न दृष्टियों से किए जा रहे हैं। सभी दृष्टियां समान हैं।''
   
हाइपरटेक्स्ट की छह केन्द्रीय विशेषताएं हैं प्रथम, गैर-आनुक्रमिक लेखन। द्वितीय , विकेन्द्रित पाठ, तीसरा , पाठ में अनेक स्रोत और लिंक की मौजूदगी ,चौथा , विकेन्द्रित अकादमिक समाज का गठन, पांचवां, एक ही दृष्टिकोण की बजाय अनेक दृष्टिकोणों पर जोर, छठा, खुला पाठ, विमर्श के ऐसे वातावरण का निर्माण जिसमें नियंता कोई नहीं होगा। पाठ ही नियंता होगा। पाठक ही सर्जक होगा। पाठ की एकायामिता की बजाय बहुआयामिता की हिमायत। कमोबेश ये सारी विशेषताएं द्विवेदीजी के पाठ में हैं। जिन दोनों किताबों का मैंने किया है उन किताबों में ये सभी विशेषताएं हैं।
    
उदाहरण देखें- '' आज से कोई अड़सठ वर्ष पूर्व सन् 1883ई. में शिवसिंह सेंगर ने प्रथमबार हिन्दी साहित्य के इतिहास का एक ढ़ाँचा तैयार करने का प्रयास किया था। इस प्रयत्न से कोई छह वर्ष बाद सुप्रसिध्द भाषाविज्ञानी डा.(बाद में सर) जार्ज ग्रियर्सन ने ऍंग्रेजी में एक ऐसा ही प्रयत्न किया। उनकी पुस्तक का नाम है-'मॉडर्न वरनाक्यूलर लिटरेचर ऑव नार्दर्न हिन्दुस्तान'। ये दोनों पुस्तकें बहुत थोड़ी सामग्री के आधार पर लिखी गई थीं। इनमें कवियों और रचनाओं के विवरण संग्रह कर दिए गए थे; पर उनको किसी एक ही जीवन्त प्रवाह के चिह्नरूप में देखने का प्रयत्न नहीं था। उन दिनों यह बात सम्भव ही नहीं थी। ''...
    
'' स्वर्गीय पण्डित रामचन्द्र शुक्ल ने इन पुस्तकों को 'कविवृत्तसंग्रह' कहकर इनका ठीक परिचय दिया था। ईसवी-सन् की उन्नीसवीं शताब्दी के बाद से काशी की सुप्रसिद्ध 'नागरी प्रचारिणी सभा' ने पुराने हिन्दी-ग्रन्थों की खोज का कार्य शुरू किया और थोड़े ही दिनों में सैंकड़ों अज्ञात कवियों और ग्रन्थों का पता लगा लिया। सभा की खोज रिपोर्टों के आधार पर मिश्रबन्धुओं ने सन् 1913 में 'मिश्रबन्धु विनोद' नामक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा, जो अपनी समस्त त्रुटियों और खामियों के बावजूद अत्यन्त उपादेय है। लेकिन है यह भी कविवृत्तसंग्रह ही।''
      
''  हिन्दी साहित्य का सचमुच क्रमबध्द इतिहास पं.रामचन्द्र शुक्ल ने 'हिन्दी-शब्द सागर की भूमिका' के रूप में सन् 1929 ई. में प्रस्तुत किया।'' 

इतने लम्बे उध्दरण को देने के पीछे सिर्फ यह बताना था कि द्विवेदी का पाठ अनेक किस्म के स्रोतों की सूचनाओं से भरा है। आप इसमें कोई संदर्भ अथवा सूचना गायब करके पढ़ना चाहें तो पाठ नहीं टूटेगा और यदि एक सूचना से दूसरी सूचना के बीच में कुछ कहना चाहें तो पाठ का ढ़ांचा खुला हुआ है। 

इन उध्दरणों से यह भी पता लगता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास विकेन्द्रित संरचनाओं में तैयार हुआ था, इसके पीछे विकेन्द्रित तौर पर एक नहीं अनेक लोग सक्रिय रहे हैं। इस पूरे उध्दरण पर गौर करें तो पाएंगे कि हिन्दी साहित्य का इतिहास विकेन्द्रित इतिहास है। इस इतिहास की सूचनाओं के एकाधिक स्रोत हैं।
     
हजारीप्रसाद द्विवेदी जब हिन्दी भाषा की बात करते हैं तो पुन: हिन्दी भाषा के निर्माता के रूप में विकेन्द्रित संरचनाओं और भाषा के एकाधिक स्रोतों का उद्धाटन करते हैं। इस क्रम में चन्द्रधर शर्मा गुलेरी के निबंन्ध में आए हेमचन्द्र के व्याकरण में उदाहरण रूप में आए दोहों, प्रबन्ध चिन्तामणि और कुमारप्रतिपालप्रतिबोध में संगृहीत दोहों,शारंगधर पध्दति में प्राप्त हुए कुछ अपभ्रंश के वाक्यों का जिक्र करने के बाद विस्तार से उन तमाम स्रोतों का जिक्र करते हैं जिन्हें गुलेरीजी की मृत्यु के बाद खोजा गया था अथवा जिन्हें स्वयं द्विवेदीजी ने खोजा था। 

अपभ्रंश का प्रयोग संस्कृत के बड़े काव्यशास्त्रियों ने भी किया है।  द्विवेदी जी ने पिशेल के अपभ्रंश भाषा संबंधी योगदान का व्यापक उल्लेख किया है।  पिशेल ने हेमचन्द्र के व्याकरण का संपादित संस्करण तैयार करने में किन किताबों की मदद ली और यह काम कहां से और कब प्रकाशित हुआ। ये सारी सूचनाएं मात्र एक पृष्ठ में पेश की हैं। 

कहने का तात्पर्य यह है कि द्विवेदीजी के व्याख्यानों को पढ़ते समय  एक आख्यान वह पढ़ते हैं जो स्वयं द्विवेदीजी बनाते हैं और दूसरा आख्यान वह है जो इनके अंदर छिपा है जिसका उद्धाटन उस अर्थ को बदल सकता है। 

इन व्याख्यानों में इनसाइक्लोपीडिया की पध्दति अपनायी  गयी है। यही पध्दति हाइपर टेक्स्ट का मूलाधार है। जिसे हम सब इन दिनों इंटरनेट पाठ में देख सकते हैं।
    
इनसाइक्लोपीडिया पध्दति की मांग है कि निरंतर खोज और संवाद जारी रखें। द्विवेदीजी की उल्लिखित कृतियां यह मांग हिन्दी के पाठक के सामने भी पेश करती हैं। इन किताबों में कोई चीज अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती। कोई भी अध्याय संपूर्ण अध्याय नहीं है। कोई भी व्याख्यान संपूर्ण व्याख्यान नहीं है। प्रत्येक व्याख्यान खुला है आप चाहे तो इनका विस्तार कर सकते हैं। इन व्याख्यानों में 'संवाद' और 'खोज' को ही मूल आधार बनाया गया है। 'संवाद' और 'खोज' मूलत: इनसाक्लोपीडिया पद्धति का हिस्सा हैं,हाइपरटेक्स्ट की पध्दति का हिस्सा हैं। इस अर्थ में द्विवेदीजी हिन्दी में हाइपरटेक्स्ट की पध्दति के पहले प्रयोगकर्त्ता के रूप में सामने आते हैं।
    

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

नेट लेखन की धुरी है खुलापन

'हाइपर टेक्स्ट' आने के बाद पाठ चारों ओर से खुला और फैला होता है।लिखित रूपरेखा से भिन्न दिशा में ले जाता है।अन्तर्संबंधित विषयों की ओर ले जाता है।इसके कारण इसके नरेटिव में भी अन्तर्संबंध होता है।कुछ बातें ऐसी भी लिखी मिल जाएंगी जो लिखित रूपरेखा के बाहर हो सकती हैं।इन अंशों तक जाने के लिए नोडस के संपर्क में जाना होगा। खुली एप्रोच से काम लेना होगा।निष्कर्ष निकाले बगैर पढ़ना होगा।चाहें तो बाद में निष्कर्ष निकाल सकते हैं।


जब आप कोई छोटा सा हाइपर टेक्स्ट निबंध पढ़ते हैं तो उसमें अनेक अन्तर्संबंधित क्षेत्रों के लिंक दिए रहते हैं।ये विभिन्न नोड्स में होते हैं।इन्हें आप जाकर खोलिए तो आपको किसी न किसी मुद्दे पर सामग्री मिल जाएगी।यहां अनेक रास्ते हैं। अनेक बिन्दु हैं जिनके साथ आप तर्क कर सकते हैं।
डेविड बोल्टर ने ''राईटिंग स्पेस: कम्प्यूटर्स,हाइपर टेक्स्ट एण्ड दि हिस्ट्री ऑफ राईटिंग'' (2001) कृति में हाइपर टेक्स्ट को युगान्तरकारी फिनोमिना माना है।बोल्टर का मानना है कि डिजिटल लेखन व्यक्तिगत,सौन्दर्यबोधीय, सांस्कृतिक, अकादमिक और आर्थिक गतिविधि है। बोल्टर के अनुसार सन् 1991 का साल डिजिटल लेखन के संदर्भ में महत्वपूर्ण साल है। 


आज डिजिटल लेखन सामान्य रूप में सांस्कृतिक स्वीकृति पा चुका है।इसके बावजूद कुछ लोग संदेह की नजर से देख रहे हैं।आज सारी दुनिया में कम्प्यूटर आधारित लेखन फैल चुका है।बोल्टर ने माना है कि मुझे भी अन्य लोगों की तरह इस बात का अहसास नहीं हुआ कि इलैक्ट्रिोनिक कम्युनिकेशन इस तरह निर्धारक तत्व बन जाएगा।उसका विश्वव्यापी हाइपर टेक्स्ट व्यवस्था के रूप में विकास होगा।
    लेखन की दिशा को बदला जा सकता है इसके बारे में कम्प्यूटर की क्षमताओं ने संजोषजनक प्रमाण दिए हैं।बोल्टर ने अपनी कृति के प्रथम संस्करण में हाइपर टेक्स्ट को स्वनिर्भर कम्प्यूटर प्रोग्राम टेक्स्चुअल सिस्टम के रूप में देखा।


मसलन् 'इनसाइक्लोपीडिया' को ही लें।इसका जन्म प्राचीनकाल में हुआ।बाद में मध्यकाल में इसे समृध्द किया गया। इनसाइक्लोपीडिया बनाने की इस दौर में जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि पाठ नष्ट हो रहा था,पाठ का अभाव था,पाठ के प्रबंधन में असुविधा हो रही थी।अच्छे पाठ की कमी महसूस हो रही थी और अच्छे पाठों को एक ही जगह रखने की इच्छा थी।यह सब घटनाएं सातवीं शताब्दी के आसपास की हैं।जब फ्रांसीसी इनसाइक्लोपीडिया सामने आया तो उसमें ज्यादातर मुद्रित सामग्री शामिल की गई।इसमें अकारादि क्रम से चीजों को रखा गया। जिससे वे व्यवस्थित लगें।संस्कृति को अवधारणा के रूप में पेश किया गया।


बोल्टर ने लिखा है कि ''इनसाइक्लोपीडिक इम्पल्स'' वस्तुत: इजैक्ट्रोनिक क्षमता को निर्देशित करते हैं। इनसाइक्लोपीडिया में प्रस्तुत सुनिश्चित मुद्रित पाठ ही साइबरस्पेस को संगठित करने का आधार बना। इनसाइक्लोपीडिया में जैसे निबंधों को सजाकर रखा जाता है वैसे ही साइबर स्पेस को भी सजाकर रखा जाता है।


बोल्टर का मानना है हाइपर टेक्स्ट में हमारा  ज्ञान और तर्क को लेकर अवसरवादी रवैयया रहा है।हम चाहते हैं कि सूचना और ज्ञान की संरचना अल्पकालिक और पूरक हो।किंतु यह स्थिति मुद्रित या पाण्डुलिपि के इनसाइक्लोपीडिया में संभव नहीं है।वहां ज्ञान का स्थायी ढ़ंाचा बना हुआ है।आज हम जो ज्ञान देख रहे हैं वह ज्ञान का संकलन है।इसे आप जिस रूप में चाहें इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका प्रत्येक पैटर्न पाठकों के एक वर्ग की जरूरतों की पूर्ति करता है।जबकि वेब का इनसाइक्लोपीडिया निरंतर खोज और संवाद की मांग करता है।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

गैर-क्रमिक रीडिंग और राईटिंग है हाइपर टेक्स्ट

टेड नेल्सन ने 'हाइपर टेक्स्ट' को गैर-क्रमिक रीडिंग और राईटिंग कहा है।जबकि स्कोविट्ज ने इसे 'लिंक' का विज्ञान और 'लिंक' का प्रबंधन माना है।जॉर्ज लनदोव ने इसमें साहित्य के निश्चित गुणों को देखा है।'हाइपर टेक्स्ट' और 'हाइपर मीडिया' की जो भी परिभाषा की जाए असल में 'लिंक' तो इसका हृदयकमल है।'लिंक' वेब का अन्य से संबंध बनाता है।यह अन्य से संबंध बनाने का संसाधन है।'लिंक' वस्तुत: अपने आरंभ से लेकर लक्ष्य की सीमा तक फैला हुआ है।इसका एक सिरा वह है जहां पाठ का अंश है,वहां से बात शुरू हो सकती है और हाइपर टेक्स्ट पर जाकर खत्म होती है।'लिंक' का क्षेत्र 'नोड' तक फैला है। वह इसका स्रोत है।यह भी संभव है कि ज्यों ही आप माउस में क्लिक करें तुरंत दूसरा छोर या अन्य सामग्री सामने आ जाए।आरंभ हमेशा विशेष रूप में सामने आता है। विशेष प्रतीक के जरिए सामने आता है।यही वजह है कि प्रत्येक क्म्प्यूटर पाठ का प्रतीक अलग-अलग होता है।'लिंक' का सामान्य तौर पर सामग्री को खोजने या संयोजित करने के लिए खूब इस्तेमाल किया जाता है।यह भी कह सकते हैं कि कंटेंट की इण्डिेक्सिंग में 'लिंक' का खूब इस्तेमाल किया जाता है।'लिंक' का दायरा सर्च इंजन से लेकर वेबसाइड की खोज तक फैला हुआ है।यहां तक कि सामाजिक नेटवर्क,आंदोलनों आदि तक इसका दायरा फैला है।इसी तरह 'हाइपर मीडिया' पदबंध का 'हाइपर टेक्स्ट' के लिए इस्तेमाल किया जाता है।किंतु इसका पाठ के संदर्भ में इस्तेमाल नहीं किया जाता।बल्कि इसमें ध्वनि, ग्राफिक्स,वीडियो आदि शामिल हैं।'हाइपर टेक्स्ट' और 'हाइपर मीडिया' ये दोनों अवधारणाएं हैं।इन्हें माल समझने की गलती नहीं करनी चाहिए।
     कायदे से हमें 'पुस्तक' और 'हाइपर टेक्स्ट' के अन्तस्संबध और अंतर पर गौर करना चाहिए।सतह पर इन दोनों में साम्य है।किंतु प्रस्तुति भिन्न रूप में होती है।मसलन् जरूरी नहीं है कि पुस्तक को रेखीय क्रम से ही पढ़ा जाए।रेखीय क्रम से ही लिखा जाए।आप चाहें तो टुकड़ों में,अंशों में भी अपनी बात लिख सकते हैं।कुछ हाइपर टेक्स्ट सिध्दान्तकारों के अनुसार उसे उद्धाटन करने वाला,तर्कवादी होना चाहिए।उसमें उपन्यास के तत्व भी होते हैं।मसलन् चरित्र और कहानीपन भी होता है।अधिकांश पुस्तकों में स्पष्टता होती है जिसके कारण पाठक उसे पेज-दर-पेज पढ़ता है।'पुस्तक' और 'हाइपर टेक्स्ट' में यह दबाव होता है कि उसे तार्किक ढ़ंग से पढ़ा जाए।तार्किक रूप में पेश किया जाए।पाठक जब पढ़ता है तो उसकी मांग और निष्कर्ष के बीच तनाव आता है।हाइपर टेक्स्ट उसके सामने मार्ग खोलता है।इन मार्गों पर जाकर वह खोज कर सकता है।जांच कर सकता है।
'पुस्तक' अपने मुद्दे,तर्क,प्रतिपक्ष की राय,फुटनोट आदि को सीधे पेश करती है।जबकि 'हाइपर टेक्स्ट' इन सबको संक्षेप में पेश करता है।'हाइपर टेक्स्ट' में रूपरेखा या 'आडट लाइन' रहती है। संक्षेप में तर्क रहते हैं।कुछ विषयों पर विस्तार भी होता है जो ठोस स्थानों और बहुत सारी इमेजों के साथ होता है।ये वे बातें होती हैं जिन्हें पुस्तक में बताया गया होता है।मूलत: यहां प्रथम व्यक्ति का वर्णन ही उपलब्ध होता है।यहां पाठक को लगता है कि वह ज्यादा आत्मसजग और आत्मालोचक है।हाइपर टेक्स्ट के अनेक रूप उपलब्ध हैं।यहां पाठ को व्यवस्थित करने,उसमें परिवर्तन करने के अनेक रूप उपलब्ध हैं।जिसके कारण पाठ की रीडिंग के समय ध्यान खींचा जा सकता है।आज 'पुस्तक' का'हाइपर टेक्स्ट' पर बहुत सारा दबाव है।इसके बावजूद 'हाइपर टेक्स्ट' को पुस्तक नहीं कहा जा सकता।दोनों का लक्ष्य है पाठक के सामने विषय का नए रूप में उद्धाटन।ज्यादा व्यापक पाठ का उद्धाटन।'हाइपर टेक्स्ट' में ऐसे भी पाठ हो सकते हैं जिनका कोई निष्कर्ष ही न हो।इस तरह के पाठ विभिन्न किस्म के पाठकों के सामने खुले होते हैं।वे पुस्तक से ज्यादा चीजें पेश करते हैं।इन्हें पढ़कर आश्चर्य की सृष्टि होती है।यह कार्य वे तर्क के संकीर्ण दायरे के फोकस को तोड़ते हुए करते हैं।वे पाठक को घोषित निष्कर्ष से परे ले जाते हैं।कितु समस्या यह है कि पाठक के अनुभवों को 'हाइपर टेक्स्ट' किस हद तक अभिव्यक्ति दे पाता है।लिखित और रचनात्मक रीडिंग में जब खेल होता है तब क्या होगा ?इसका परिणाम अंतत: व्यापक हाइपर टेक्स्ट ही होगा।यह पुस्तक के रूप से ज्यादा बड़ा होगा।सवाल यह है कि आपकी उम्मीदेंे किस तरह की हैं ?क्या लेखक के पास लम्बे पाठ का पाठक मौजूद है ?'हाइपर टेक्स्ट' की सबसे मुश्किल समस्या यह है कि प्रत्येक पाठ को कुछ खास 'नोडस' पर जाना होगा।उसे 'नोडस' का सामना करना होगा।'हाइपर टेक्स्ट' स्वयं प्रतिबिम्बित हो इसके लिए जरूरी है कि वह 'मल्टी नोडस' में अपना तर्क पेश न करे।तर्क और उद्धाटन के लिए जरूरी है कि ढ़ांचा हो, यह ढ़ंाचा रेखीय होना चाहिए।जिससे चीजों का क्रमश: जबाव दिया जा सके।उन्हें क्रमबध्द रूप में रखा जा सके।उन्हें ऐसे लिखा जाए जैसे दार्शनिक पाठ लिखा जा रहा हो।कुछ लेखक इस पध्दति को लागू करते हैं।किंतु कुछ लेखक पुस्तक में पाठक के आश्चर्य को शांत करने लिहाज से विशेष ढ़ंग के तर्क देते हैं। मसलन् किसी बात पर कबीर को उध्दृत करेंगे तो उसके समर्थन में तुलसी को पेश करेंगे। इस तरह की लेखकीय प्रवृत्ति दर्शन में नहीं मिलेगी।खासकर 19वीं शताब्दी के छोटे निबंधों में यह प्रवृत्ति एकदम गायब है।

टेड नेल्सन और हाइपर टेक्स्ट का नया युग


                                 (टेड नेल्सन)
                                                                    
 वन्नेवर बुश ने जब मिमिक्स की धारणा दी तो उनके सामने एकाकी अनुंसधार्नकत्ता की समस्या केन्द्र में थी।उसे चिन्ता थी कि आज मानव सभ्यता विकास के जिस मुकाम पर पहुँच गई है उसे देखते हुए शोर्धकत्ता को दस्तावेजों को पढ़ने,खोजने और छांटने में गंभीर असुविधा हो सकती है।एकाकी शोर्धकत्ता को कैसे दस्तावेजों के इस जंगल से मुक्ति दिलायी जाए यही प्रधान बिन्दु था जिसे केन्द्र में रखकर मिमिक्स की धारणा का जन्म हुआ।इसी मिमिक्स मशीन की धारणा को आधार बनाकर टेड नेल्सन ने सन् 1965में 'हाइपर टेक्स्ट' की धारणा दी।टेड नेल्सन पहला वैज्ञानिक है जिसंने साहित्य को केन्द्र में रखकर 'हाइपरटेक्स्ट' पर विचार किया। उसने इसे 'लिटरेरी मशीन' कहा।यह ऐसी मशीन है जो कागज के बिना सोचती है।स्वयं ही प्रकाशित है।यह ऐसी रीडिग है जो हाइपर टेक्स्ट की पृष्ठभूमि,विचार और उत्साह को पैदा करती है।
टेड नेल्सन का जन्म 1937 को हुआ।इन दिनों ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर हैं। आधुनिक दर्शन,मनुष्य और कम्प्यूटर के अन्तस्संबंध से जुड़े सवालों पर कार्यरत हैं।टेड नेल्सन ने 1960 में एक्सनाडु प्रकल्प की शुरूआत की।कुछ अपरिहार्य असुविधाओं के कारण इस प्रकल्प को बाद में बीच में ही बंद करना पड़ा।टेड नेल्सन के हाइपर टेक्स्ट संबंधी विचारों को जानने के लिहाज से उनकी लिखी ' कम्प्यूटर लिव/ ड्रीम मशीन्स' और 'लिटरेरी मशीन्स' महत्वपूण्र्

ा कृतियां हैं।एक्सनाडु प्रकल्प के फेल हो जाने के बाद टेड नेल्सन के विचारों को टिम बर्नर्स ली ने डब्लयू डब्ल्यू डब्ल्यू प्रकल्प के नाम से साकार कर दिखाया।इसी को हम वर्ल्ड वाइड वेब के नाम से जानते हैं।टिम बर्नर्स ली के इस प्रकल्प की परिकल्पना के साकार रूप को देखकर टेड नेल्सन ने कहा कि यह मेरी धारणाओं और परिकल्पना का अतिसरलीकृत रूप है।इसीलिए उसे यह कार्य पसंद नहीं आया।टेड नेल्सन ने कहा कि टिम बर्नर्स ली ने वर्ल्ड वाइड वेब,इंटरनेट,एक्सएमएल और उससे जुड़े मारकप के बारे में जो कार्य किया है वह उसके कार्य का अति सरलीकरण है।टेड नेल्सन इन दिनों 'ज़िगजेग़' नामक नई सूचना संरचना पर कार्य कर रहे हैं।टेड नेल्सन के काम को स्वीकृति देते हुए फ्रंास सरकार ने 2001 में अपने यहां के सर्वोच्च सम्मान 'ऑफिसर डेज आर्ट्स एट लेटर्स' से सम्मानित किया। 2004 में उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वाघम कॉलेज में फैलो नियुक्त किया गया।वह आक्सफोर्ड के इंटरनेट इन्स्टीट्यूट से भी जुड़े हैं।इन दिनों वहीं पर कार्यरत हैं।टेड नेल्सन की मॉ अभिनेत्री और पिता संगीतकार थे।मॉ को आस्कर और पिता को ग्रेम्मी एवार्ड मिला।टेड नेल्सन ने 1959 में दर्शन में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।जबकि स्नातकोत्तर डिग्री उन्होंने समाजशास्त्र में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से प्राप्त की।किओ विश्वविद्यालय से 'एनवायरमेंटल इनफॉर्मेशन' पर पीएचडी की।
उल्लेखनीय है कि वन्नेवर बुश ने माइक्रो फिल्म को आधार बनाकर मिमिक्स मशीन की धारणा निर्मित की थी।इसी के आधार पर हार्वर्ड विश्वविद्यालय में स्नातक करते हुए टेड नेल्सन ने सबसे पहले 1960 में हाइपर टेक्स्ट की रचना की थी।इसे बाद में एक्सनाडु सिस्टम नाम दिया गया। बाद में टेड नेल्सन ने 'जीपरेड लिस्ट्स' शीर्षक से एक पर्चा लिख जो एक्सनाडु प्रकल्प का आधार बना।यह पर्चा 1965 में कम्प्यूटिंग मशीनरी एसोसिएसन' की काँफ्रेंस में पेश किया गया।
टेड नेल्सन से एक साक्षात्कार में यह सवाल पूछा गया कि उसके दिमाग में हाइपर टेक्स्ट का विचार सबसे पहले कैसे और कब आया ?इसके जबाव में उसने कहा कि प्रत्येक बच्चे की तरह बचपन में मुझे भी पढ़ने,लिखने,साहित्य और फिल्मों का शौक था।युवावस्था में मैंने खूब लिखा भी है।उसी दौर में मेरे दिमाग में यह विचार आया कि विचार,वाक्य- विन्यास, संवाद, कोहरेंस,संरचना आदि एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।यह बेहद जटिल प्रक्रिया है।उसी समय मेरे दिमाग में यह बात आई कि क्या ऐसा हो सकता है कि ये सब क्रमबध्द न हों। अन्तर्निहित न हों।कच्चे हों।प्रिण्ट में जाने पर पक्का हो जाता है।लिखने पर पक्का हो जाता है।इसके लिए उसे क्रमबध्द रूप में लिखना होता है।इस तरह के लेखन में विचार का अपना ढ़ंांचा होता है,अपनी विशेष संरचना होती है।उसे एकरेखीय क्रम में पेश किया जाता है।बाद में पाठक इसी रेखीय संरचना को ग्रहण कर लेता है। री-कम्पोज करके अपनी इमेजं बंद कर लेता है।या फिट कर लेता है।मेरी मुश्किलें यहीं से शुरू हुईं।मैंने 'लेखक के समय' और 'पाठक के समय' इन दोनों को 'हाइपर टेक्स्ट'में एक ही साथ पेश किया है।नेल्सन का मानना है कि उसे 'हाइपर टेक्स्ट' के निर्माण में साहित्य से सबसे ज्यादा मदद मिली। उसकी समूची नई खोज का आधार साहित्य है।
टेड नेल्सन ने 'ड्रीम मशीन्स' नामक कृति में 'हाइपर ग्राम्स','हाइप मेप्स' और सिनेमा की एक शाखा को केन्द्र में रखकर हाइपर टेक्स्ट का विश्लेषण किया है।इस कृति में उसने तीन कोटियों की चर्चा की है।इसमें पहली कोटि में 'रिफरेंस' या 'लिंक' है। दूसरी कोटि में 'सीधा पाठ' आता है।यह लिंक को पूरी तरह लागू करता है।विस्तार देता है। तीसरी कोटि  में समानान्तर पाठ आता है। यानी दो दस्तावेज एक साथ कम्प्यूटर स्क्रीन पर देखे जा सकते हैं।साथ ही पूरा रूप भी सामने होगा।नेल्सन ने 'नई' और 'मूल' 'हाइपरबुक' को 'ऑण्टोलॉजिकल हाइपर बुक्स' नाम दिया।जिसका भिन्न-भिन्न किस्म की रचनाओं और 'ग्राण्ड सिस्टम' से गहरा संबंध है।नेल्सन ने लिखा कि इसमें विषय से संबंधित सब कुछ शामिल है। अथवा अस्पष्ट रूप में जो भी प्रासंगिक है वह भी शामिल है।यह संपादक से जुड़ा है न कि प्रोग्रामर से।आप इसे जैसे भी चाहें पढ़ सकते हैं।इसके वैकल्पिक 'पथ' भी हैं।जिनके जरिए भिन्न तरीके से सोच सकते हैं।टेड नेल्सन ने वन्नेवर बुश के 1945 में लिखे चर्चित निबंध 'एज वी मे थिंक' को अपनी पुस्तक में एक अध्याय के रूप में पेश किया है। साथ ही वन्नेवर बुश को ही हाइपर टेक्स्ट की धारणा के लिए श्रेय दिया है।