रविवार, 15 सितंबर 2024

मैं तो हिन्दी के बिना जी नहीं सकता -
 



आज 14 सितम्बर है,सारे देश में केन्द्र सरकार के दफ्तरों में हिन्दी दिवस का दिन है।सरकार की आदत है वह कोई काम जलसे के बिना नहीं करती। सरकार की नज़र प्रचार पर होती है वह जितना हिन्दीभाषा में काम करती है उससे ज्यादा ढ़ोल पीटती है। सरकार को भाषा से कम प्रचार से ज्यादा प्रेम है,हम लोग प्रचार को हिंदी प्रेम और हिंदी सेवा समझते हैं !
सवाल यह है दफ्तरी हिन्दी को प्रचार की जरूरत क्यों है ॽ जलसे की जरूरत क्यों है ॽ भाषा हमारे जीवन में रची-बसी होती है।अंग्रेजी पूरे शासनतंत्र में रची-बसी है,उसको कभी प्रचार की या हिन्दी दिवस की तरह अंग्रेजी दिवस मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। भाषा को जब हम जलसे का अंग बनाते हैं तो राजनीतिक बनाते हैं। छद्म भाषायी उन्माद पैदा करने की कोशिश करते हैं।हिन्दी दिवस की सारी मुसीबत यहीं पर है।यही वह बिन्दु है जहां से भाषा और राजनीति का खेल शुरू होता है।भाषा में भाषा रहे,जन-जीवन रहे,लेकिन अब उलटा हो गया है। भाषा से जन-जीवन गायब होता जा रहा है।हम सबके जन-जीवन में हिन्दी भाषा धीरे धीरे गायब होती जा रही है,दैनंदिन लिखित आचरण से हिन्दी कम होती जा रही है।भाषा का लिखित आचरण से कम होना चिन्ता की बात है।हमारे लिखित आचरण में हिन्दी कैसे व्यापक स्थान घेरे यह हमने नहीं सोचा,उलटे हम यह सोच रहे हैं कि सरकारी कामकाज में हिन्दी कैसे जगह बनाए।यानी हम हिन्दी को दफ्तरी भाषा के रूप में देखना चाहते हैं ! मीडिया भाषा के रूप में देखना चाहते हैं।
हिन्दी सरकारी भाषा या दफ्तरी भाषा नहीं है। हिन्दी हमारी जीवनभाषा है,वैसे ही जैसे बंगला हमारी जीवनभाषा है।हम जिस संकट से गुजर रहे हैं ,बंगाली भी उसी संकट से गुजर रहे हैं।अंग्रेजी वाले भी संभवतः उसी संकट से गुजर रहे हैं।आज सभी भाषाएं संकटग्रस्त हैं।हमने विलक्षण खाँचे बनाए हुए हैं हम हिन्दी का दर्द तो महसूस करते हैं लेकिन बांग्ला का दर्द महसूस नहीं करते।भाषा और जीवन में अलगाव बढ़ा है।इसने समूचे समाज और व्यक्ति के जीवन में व्याप्त तनावों और टकरावों को और भी सघन बना दिया है।
इन दिनों हम सब अपनी -अपनी भाषा के दुखों में फंसे हुए हैं। यह सड़े हुए आदमी का दुख है।नकली दुख है।यह भाषा प्रेम नहीं ,भाषायी ढ़ोंग है।यह भाषायी पिछड़ापन है।इसके कारण हम समग्रता में भाषा के सामने उपस्थित संकट को देख ही नहीं पा रहे।हमारे लिए आज महत्वपूर्ण यह नहीं है कि भाषा और समाज का अलगाव कैसे दूर करें,हमारे लिए जरूरी हो गया है कि सरकारी भाषा की सूची में अपनी भाषा को कैसे बिठाएं।सरकारी भाषा का पद जीवन की भाषा के पद से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है और यही वह बुनियादी घटिया समझ है जिसने हमें अंधभाषा प्रेमी बना दिया है।हिन्दीवाला बना दिया है।यह भावबोध सबसे घटिया भावबोध है।यह भावबोध भाषा विशेष के श्रेष्ठत्व पर टिका है।हम जब हिन्दी को या किसी भी भाषा को सरकारी भाषा बनाने की बात करते हैं तो भाषाय़ी असमानता की हिमायत कर रहे होते हैं।हमारे लिए सभी भाषाएं और बोलियां समान हैं और सबके हक समान हैं।लेकिन हो उलटा रहा है।तेरी भाषा-मेरी भाषा के क्रम में हमने भाषायी विद्वेष को पाला-पोसा है। प्रतिस्पर्धा पैदा की है।बेहतर यही होगा कि हम भाषायी विद्वेष से बाहर निकलें। जीवन में भाषा प्रेम पैदा करें।सभी भाषाओं और बोलियों को समान दर्जा दें।किसी भी भाषा की निंदा न करें,किसी भी भाषा के प्रति विद्वेष पैदा न करें।दुख की बात है हमने भाषा विद्वेष को अपनी संपदा बना लिया है,हम सारी जिन्दगी अंग्रेजी भाषा से विद्वेष करते हैं और अंग्रेजी का ही जीवन में आचरण करते हैं।हमने कभी सोचा नहीं कि विद्वेष के कारण भाषा समाज में आगे नहीं बढ़ी है। प्रतिस्पर्धा के आधार पर कोई भी भाषा अपना विकास नहीं कर सकती। भाषा का विकास शिक्षा से होता है। शिक्षा में हिंदी पिछड़ गयी है।फलत: समाज में भी पिछड़ गयी है।
मेरे लिए हिन्दी जीवन की भाषा है।इसके बिना मैं जी नहीं सकता।मैं सब भाषाओं और बोलियों से वैसे ही प्यार करता हूँ जिस तरह हिन्दी से प्यार करता हूँ।हिन्दी मेरे लिए रोजी-रोटी की और विचारों की भाषा है।भाषा का संबंध आपके आचरण और लेखन से है।राजनीति से नहीं।भाषा में विचारधारा नहीं होती।भाषा किसी एक समुदाय,एक वर्ग,एक राष्ट्र की नहीं होती वह तो पूरे समाज की सृष्टि होती है। यहां मुझे रघुवीर सहाय की कविता "भाषा का युद्ध " याद आ रही है। उन्होंने लिखा-
"जब हम भाषा के लिये लड़ने के वक़्त
यह देख लें कि हम उससे कितनी दूर जा पड़े हैं
जिनके लिये हम लड़ते हैं
उनको हमको भाषा की लड़ाई पास नहीं लाई
क्या कोई इसलिये कि वह झूठी लड़ाई थी
नहीं बल्कि इसलिए कि हम उनके शत्रु थे
क्योंकि हम मालिक की भाषा भी
उतनी ही अच्छी तरह बोल लेते हैं
जितनी मालिक बोल लेता है
वही लड़ेगा अब भाषा का युद्ध
जो सिर्फ़ अपनी भाषा बोलेगा
मालिक की भाषा का एक शब्द भी नहीं
चाहे वह शास्त्रार्थ न करे जीतेगा
बल्कि शास्त्रार्थ वह नहीं करेगा
वह क्या करेगा अपने गूंगे गुस्से को वह
कैसे कहेगा ? तुमको शक है
गुस्सा करना ही
गुस्से की एक अभिव्यक्ति जानते हो तुम
वह और खोज रहा है तुम जानते नहीं ।"
जब बाजार में कम्प्यूटर आया तो मैंने सबसे पहले उसे खरीदा,संभवतःबहुत कम हिन्दी शिक्षक और हिन्दी अधिकारी थे जो उस समय कम्प्यूटर इस्तेमाल करते थे।मैंने कम्प्यूटर की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली।मैं कम्प्यूटर के तंत्र को नहीं जानता,लेकिन मैंने अभ्यास करके कम्प्यूटर पर लिखना सीखा ,अपनी लिखने की आदत बदली,कम्प्यूटर पर पढ़ने का अभ्यास डाला।कम्प्यूटर आने के बाद से मैंने कभी हाथ से नहीं लिखा,अधिकांश समय किताबें भी डिजिटल में ही पढ़ता हूँ।जब आरंभ में लिखना शुरू किया तो उस समय यूनीकोड फॉण्ट नहीं था,कृति फॉण्ट था,उसमें ही लिखता था।बाद में जब पहलीबार ब्लॉग बनाया तो पता चला कि इंटरनेट पर यूनीकोड फॉण्ट में ही लिख सकते हैं और फिर मंगल फॉण्ट लिया,फिर लिखने की आदत बदली,और आज मंगल ही मंगल है।कहने का आशय यह कि हिन्दी या किसी भी भाषा को विकसित होना है तो उसे लेखन के विकसित तंत्र का इस्तेमाल करना चाहिए। भाषा लेखन से बदलती है,समृद्ध होती है।भाषा बोलने मात्र से समृद्ध नहीं होती।
भाषा समृद्ध होती है लिखने से,लिखो और खासकर यूनीकोड फॉण्ट के जरिए हिन्दी पढ़ो- लिखो।तब हिंदी का प्रसार होगा।
हिन्दी के अधिकांश मास्टर और हिन्दी अधिकारी हिन्दी में एसएमएस तक नहीं करते,मोबाइल में आधार भाषा के रूप में हिन्दी का प्रयोग तक नहीं करते। मोबाइल का भाषा सिस्टम बदलो,हिन्दी को ताकतवर बनाओ।
हिन्दी के 11 कटु सत्य
1.हिन्दीभाषी अभिजन की हिन्दी से दूरी बढ़ी है ।
2.राजभाषा हिन्दी के नाम पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है लेकिन उसका भाषायी,सांस्कृतिक,अकादमिक और प्रशासनिक रिटर्न बहुत कम है।
3.इस दिन केन्द्र सरकार के ऑफिसों में मेले-ठेले होते हैं और उनमें यह देखा जाता है कि कर्मचारियों ने साल में कितनी हिन्दी लिखी या उसका व्यवहार किया। हिन्दी अधिकारियों में अधिकतर की इसके विकास में कोई गति नजर नहीं आती।संबंधित ऑफिस के अधिकारी भी हिन्दी के प्रति सरकारी भाव से पेश आते हैं। गोया ,हिन्दी कोई विदेशी भाषा हो।
4.केन्द्र सरकार के ऑफिसों में आधुनिक कम्युनिकेशन सुविधाओं के बावजूद हिन्दी का हिन्दीभाषी राज्यों में भी न्यूनतम इस्तेमाल होता है।
5.हिन्दीभाषी राज्यों में और 10 वीं और 12वीं की परीक्षाओं में अधिकांश हिन्दीभाषी बच्चों के असंतोषजनक अंक आते हैं. हिन्दी भाषा अभी तक उनकी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है।
6.राजभाषा संसदीय समिति और उसके देश-विदेश में हिन्दी की निगरानी के लिए किए गए दौरे भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े अपव्ययों में से एक है.
7. विगत 74 सालों में हिन्दी में पठन-पाठन,अनुसंधान और मीडिया में हिन्दी के बौद्धिक स्तर में तेजी से गिरावट आई है।
8.राजभाषा संसदीय समिति की सालाना रिपोर्ट अपठनीय और बोगस होती हैं।
9.केन्द सरकार के किसी भी मंत्रालय में मूल बयान कभी हिन्दी में तैयार नहीं होता। सरकारी दफ्तरों में हिन्दी मूलतः अनुवाद की भाषा है ।
10.हिन्दी दिवस के बहाने भाषायी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिला है इससे भाषायी समुदायों में तनाव पैदा हुआ है। हिन्दीभाषीक्षेत्र की अन्य बोलियों और भाषाओं की उपेक्षा हुई है।
11.सारी दुनिया में आधुनिकभाषाओं के विकास में भाषायी पूंजीपतिवर्ग या अभिजनवर्ग की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिन्दी की मुश्किल यह है कि हिन्दीभाषी पूंजीपतिवर्ग का अपनी भाषा से प्रेम ही नहीं है।जबकि यह स्थिति बंगला,मराठी,तमिल.मलयालम,तेलुगू आदि में नहीं है।वहां का पूंजीपति अपनी भाषा के साथ जोड़कर देखता है।हिन्दी में हिन्दीभाषी पूंजीपति का परायी संस्कृति और भाषा से याराना है।
हमारी हिंदी / रघुवीर सहाय
हमारी हिंदी एक दुहाजू की नई बीबी है
बहुत बोलने वाली बहुत खानेवाली बहुत सोनेवाली
गहने गढ़ाते जाओ
सर पर चढ़ाते जाओ
वह मुटाती जाए
पसीने से गन्धाती जाए घर का माल मैके पहुँचाती जाए
पड़ोसिनों से जले कचरा फेंकने को लेकर लड़े
घर से तो ख़ैर निकलने का सवाल ही नहीं उठता
औरतों को जो चाहिए घर ही में है
एक महाभारत है एक रामायण है तुलसीदास की भी राधेश्याम की भी
एक नागिन की स्टोरी बमय गाने
और एक खारी बावली में छपा कोकशास्त्र
एक खूसट महरिन है परपंच के लिए
एक अधेड़ खसम है जिसके प्राण अकच्छ किये जा सकें
एक गुचकुलिया-सा आँगन कई कमरे कुठरिया एक के अंदर एक
बिस्तरों पर चीकट तकिए कुरसियों पर गौंजे हुए उतारे कपड़े
फ़र्श पर ढंनगते गिलास
खूंटियों पर कुचैली चादरें जो कुएँ पर ले जाकर फींची जाएँगी
घर में सबकुछ है जो औरतों को चाहिए
सीलन भी और अंदर की कोठरी में पाँच सेर सोना भी
और संतान भी जिसका जिगर बढ गया है
जिसे वह मासिक पत्रिकाओं पर हगाया करती है
और ज़मीन भी जिस पर हिंदी भवन बनेगा
कहनेवाले चाहे कुछ कहें
हमारी हिंदी सुहागिन है सती है खुश है
उसकी साध यही है कि खसम से पहले मरे
और तो सब ठीक है पर पहले खसम उससे बचे
तब तो वह अपनी साध पूरी करे ।
हिंदी दिवस पर विशेष-


मोदी सरकार का नकली हिन्दी प्रेम





लेखकों-बुद्धिजीवियों में एक बड़ा तबका है जो हिन्दी के नाम पर सरकारी मलाई खाता रहा है। इनमें वे लोग भी हैं जो कहने को वाम हैं,इनमें वे भी हैं जो सोशलिस्ट हैं,ये सब मोदी के हिन्दीप्रेम के बहाने सरकारी मलाई के आनंद-विनोद में' मोदी ही हिन्दी है और हिन्दी ही मोदी है' ,कहकर मोदी के हिन्दीराग में शामिल होने जा रहे हैं।
सब जानते हैं कि मोदी को हिन्दी से कोई लगाव नहीं है। संघ को भी हिन्दी से कोई खास लेना-देना नहीं है। अधिकांश समर्थ संघियों के बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। संघ और उनके नेताओं के लिए हिन्दी का जनता के सामने प्रतीकात्मक महत्व है। हिन्दी उनके हिन्दू राष्ट्रवाद के पैकेज का हिस्सा है। अब इस राष्ट्रवाद को विकास के नाम से बेचा जारहा है। यहां सोवियत अनुभव को समझने की जरुरत है।
सोवियत संघ आज अनेक देशों में विभाजित हो चुका है। इस विभाजन के अनेक कारणों की चर्चा हुई है। लेकिन एक कारण की ओर कम ध्यान गया है। सोवियत संघ में स्टालिन के जमाने में समूचे देश में रुसी भाषा कोअन्य जातियों पर थोपा गया और अन्य जातीय भाषाओं की उपेक्षा की गयी। इसके कारण अंदर ही अंदर भाषायी तनाव बना रहा। हमारे बहुत सारे विचारक यह मान रहे थे कि सोवियत संघ में जातीय समस्या हल कर ली गयी । लेकिन असल में रुसीभाषा को सभी जातीयताओं पर थोपकर जो क्षति अन्य भाषाओं की हुई उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। भारत में आजादी मिलने के बाद यह समस्या सामने आई कि देश किस भाषा में काम करे और केन्द्र किस भाषा में काम करे। इसका समाधान त्रिभाषा फार्मूले के आधार पर निकाला गया। मोदी सरकार यदि त्रिभाषा फार्मूले को नहीं मानती है तो उसे पहले संसद में जाकर त्रिभाषा फार्मूले का विकल्प पेश करके पास कराके लाना चाहिए।
नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दफ्तर के सभी काम हिन्दी में करने का फैसला लिया है। यह हिंदीप्रेमी के नाते स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन इसके राजनीतिक परिणामों पर भी हमें नजर रखनी होगी। रुसीभाषा के दुष्परिणामों को सोवियत संघ भोग चुका है और कई देशों में विभाजित हो चुका है। प्रधानमंत्री कार्यालय के कामकाज की हिन्दी यदि मुख्यभाषा होगी तो फिर देश की अन्यभाषाओं का क्या होगा ?उन गैर हिंदीभाषाओं का क्या होगा जिनके लोगों ने भाजपा और उनके सहयोगियों को वोट दिया है?
सवाल यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में हिन्दी में कामकाज पर मुख्यबल देने के पीछे राजनीतिक मकसद क्या है ? प्रधानमंत्री कार्यालय कोई व्यक्तिगत दफ्तर नहीं है। यह मोदीजी का निजी दफ्तर भी नहीं है। यह प्रधानमंत्री कार्यालय है। किस भाषा में काम होगा या होना चाहिए यह प्रचार की नहीं व्यवहार की चीज है।नीति की चीज है। यदि हिन्दी में काम होता है तो यह जरुरी है कि गैर हिन्दीभाषी राज्यों के साथ प्रधानमंत्री का पत्राचार उनकी भाषा में ही हो। सिर्फ हिंदी में नहीं।
मसलन् प्रधानमंत्री की कोई चिट्ठी आंध्र या तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को भेजी जानी है तो वह संबंधित मुख्यमंत्रियों की भाषा में जाए तब तो भाषाओं के बीच में समानता पैदा होगी। लेकिन यदि पत्र हिंदी में जाएगा तो तनाव पैदा होगा। देश में विभाजन के स्वर मुखर होंगे। फिलहाल मीडिया में जिस तरह प्रधानमंत्री कार्यालय की कामकाजी भाषा हिंदी किए जाने की खबरें जारी की गयी हैं उसमें बहुसंख्यकवाद के भाषायी मॉडल के लक्षण अभिव्यंजित हो रहे हैं। बहुसंख्यकवाद और हिंदी एक-दूसरे के सहज ही जुडवां भाई भी बन जाते हैं और वह सहज ही अपने आप में विभाजनकारी दिशा ग्रहण कर सकते हैं।हम चाहते हैं कि मोदी सरकार पहले यह तय करे कि वह त्रिभाषा फार्मूले को मानती है या नहीं,भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में इस बावत कुछ भी साफ नहीं है। मोदी सरकार यदि त्रिभाषानीति को नहीं मानती तो नया विकल्प सुझाए देश में आम राय बनाए।
मोदीभक्त प्रतीकों और उन्मादी तर्कों के जरिए हिन्दी भाषा को लेकर सतही बहसों को उछाल रहे हैं। हिन्दी पर बातें विद्वानों के आप्तवचनों के जरिए न करके व्यवहार में देखकर करें।मोदीभक्त नेट पर भाषा के सवाल को नेता की अभिव्यक्ति की भाषा का सवाल बनाकर पेश कर रहे हैं।
भाषा का सवाल नेता की अभिव्यक्ति का सवाल नहीं है। भाषा हमारे सामाजिक जीवन की प्राणवायु है।नेता किस भाषा में बोलते हैं, आईएएस किस भाषा में बोलते हैं, इससे भाषा समृद्ध नहीं होती। भाषा समृद्ध होती है तब जब उसकी शिक्षा लेते हैं। हिन्दी की दशा सबसे ज्यादा हिन्दीभाषी राज्यों में खराब है।सबसे खराब ढांचा है शिक्षा-दीक्षा का।
देश को कौन चला रहा है ? व्यापारी या बाजार की शक्तियां चला रही हैं या केन्द्र सरकार ? कमाल के तर्कशास्त्री हैं हिंदी में ।वे मोदी से हिंदी के उत्थान की उम्मीद कर रहे हैं।
मित्रो !पहले देश के व्यापारियों को खासकर हिन्दी व्यापारियों को हिन्दी में व्यापार के खाते-वही लिखने के लिए राजी करलो। इन व्यापारियों में बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा का लंबे समय से वोटर भी है।
हिन्दी राष्ट्रोन्माद पैदा करने की भाषा नहीं है। यह दैनंदिन जीवन की भाषा है। लेकिन हिन्दीभाषी व्यापारी लंबे समय से हिन्दी में काम करना बंद कर चुके हैं। कब से उन लोगों ने हिन्दी में काम करना बंद किया यह पता करें। क्यों बंद किया यह भी पता करें। हिंदी का सबसे पहले बाजार की शक्तियों के बीच में व्यवहार होना चाहिए। व्यापारी के कामकाज में व्यवहार होना चाहिए। पता करें जिस दुकान से सामान खरीद रहे हैं उसका बिल किस भाषा में है ?
सवाल यह है व्यापारियों ने अपनी भाषा में काम करना क्यों बंद कर दिया? कारपोरेट घराने नौकरी के लिए देशजभाषाओं की उपेक्षा क्यों करते हैं ? क्या यहां पर देशभक्ति की मांग करना नाजायज है?
ध्यान रहे पूंजीवाद भाषाओं का शत्रु है। पूंजीपतिवर्ग का देशज भाषाओं के साथ बैर है।ऐसे में कारपोरेट घरानों के नुमाइंदे चाहे मोदी हों या मनमोहन हों, इनसे देशज भाषाओं की रक्षा की उम्मीद करना बेमानी है। भाषा उनके लिए प्रतीकात्मक कम्युनिकेशन से ज्यादा महत्व नहीं रखती।
मोदी एंड कंपनी यदि हिंदी से प्यार करती है और हिंदी को यदि सम्मान दिलाना चाहते हैं तो हिंदी भाषी शिक्षित मध्यवर्ग और व्यापारी- पूंजीपतिवर्ग के कार्य व्यापार की भाषा बनाओ। हिंदी में असभ्यता प्रदर्शन बंद करो।
नगरीकरण और पूंजीवाद के कारण भाषाओं का अस्तित्व खतरे में - प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी
हिन्दू महाविद्यालय में हिन्दी सप्ताह का उद्घाटन
दिल्ली। नगरीकरण और पूंजीवाद ने हिंदी ही नहीं अपितु अन्य भारतीय भाषाओं के अस्तित्व को भी खतरे में डाल दिया है। निरंतर सड़कों का जाल बढ़ने से और भारतीय समाज पर बढ़ते पूंजीवाद के प्रभाव की वजह से लगातार स्थानीय लोग अच्छी सुविधा और रोज़गार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं, इस विस्थापन ने भी भाषाओं को ख़त्म किया है। सुप्रसिद्ध आलोचक और कोलकाता विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे प्रो जगदीश्वर चतुर्वेदी ने हिन्दू महाविद्यालय में कहा कि महानगरों में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव कहीं अधिक है वहीं लोग खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग सिर्फ बोलचाल के व्यवहार में करते हैं जिससे स्थानीय भाषाओं का भी पतन हो रहा है, लगभग हर साढ़े तीन महीने में कोई न कोई भारतीय भाषा लोगों के व्यवहार से भी विलुप्त हो रही है।
प्रो चतुर्वेदी ने हिन्दी सप्ताह में 'हिंदी: राजभाषा से राष्ट्रभाषा तक' विषय पर उद्घाटन व्याख्यान देते हुए कहा कि अंग्रेजी माध्यम की बढ़ती लोकप्रियता पर चिंताजनक है। उन्होंने कहा आज भी देश के लगभग हर छोटे-बड़े अफसर यहां तक कि हिंदी के हिमायती भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने पर जोर दे रहे हैं जो कि भारतीय शिक्षण व्यवस्था के लिए अत्यंत गंभीर विषय है। भाषा व्यवहार से कहीं अधिक शिक्षण से अपने विस्तार को ग्रहण करती है इसलिए शिक्षण व्यवस्था और शिक्षण संस्थानों को सभी विषयों का हिंदी माध्यम में व्यवस्थित शिक्षण एवं सुचारू रूप से अध्ययन-अध्यापन पर जोर देने की जरूरत है।
प्रो चतुर्वेदी ने युवा पीढ़ी में पुस्तकालयों की अपेक्षा इंटरनेट पर अधिक भरोसा करने की प्रवृत्ति को अध्ययनशीलता के लिए घातक बताते हुए कहा कि पुस्तकों की गंध हमें सच्चे अर्थों में ज्ञान पिपासु बनाती है। उन्होंने कहा कि बह्षा का विकास पठन-पाठन और लेखन से होता है केवल बोलने से भाषाएँ आगे नहीं बढ़तीं। प्रो चतुर्वेदी ने अपने अध्ययन और अध्यापन के भी अनेक प्रसंग सुनाए तथा प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं के समाधान किए।
इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत में विषय प्रवर्तन करते हुए हिंदी विभाग के प्रो.रामेश्वर राय ने कहा कि हिंदी असीम संभावनाओं से परिपूर्ण भाषा है उसे एक दिवस तक सीमित रखना उचित नहीं। प्रो राय ने चतुर्वेदी जी को असहमतियों के किसान की संज्ञा देते हुए कहा कि प्रचलित वैचारिक परिपाटियों से गहरी असहमति उन्हें आवश्यक लगती है। तृतीय वर्ष के अभिनव कुमार झा ने लेखक परिचय दिया तथा ख़ुशी ने मंच संचालन किया।
कार्यक्रम में समाजशास्त्र विभाग की प्रभारी डॉ मेहा ठाकोर, हिन्दी विभाग के डॉ.पल्लव व डॉ नौशाद सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी एवं शोधार्थी मौजूद रहे। अंत में हिन्दी सप्ताह की संयोजक डॉ.नीलम सिंह ने सप्ताह में आयोजित होने वाली गतिविधियों का विवरण देने के बाद सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।(हिंदी साहित्य सभा, हिंदू कॉलेज)

हिंदी का परिप्रेक्ष्य -


आज (15-9-2018)कॉलेज में हिंदी दिवस के उपलक्ष में विभाग की ओर से रचनात्मक लेखन और भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें विद्यार्थियों ने बहुत उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया और हिंदी को लेकर बहुत सारी चिंताएं भी ज़ाहिर की। प्रतियोगिताओं के बाद आदरणीय प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी जी ने " वर्तमान समय में हिन्दी की चुनौतियाँ" विषय पर अपना ओजपूर्ण व सारगर्भित व्याख्यान दिया।अपने वक्तव्य में उन्होंने हिंदी को लेकर किसी भी तरह की हीन ग्रंथि का शिकार न होकर हिंदी को गर्व से स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। विश्व में आज अनेक भाषाएं इस संकट की स्थिति से गुजर रही हैं जिनका हवाला देते हुए उन्होंने भाषाओं के सम्मान की बात की तथा उसको जिंदा रखने के लिए आम जन की भाषा बनाने पर ज़ोर दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने प्रबुद्धजनों के साथ-साथ विद्यार्थी वर्ग को किताबों से गहरा नाता जोड़ने की बात की क्योंकि कोई भी भाषा केवल बोलने से नहीं बल्कि लिखने-पढ़ने से ही मज़बूत होती है। मेरा उनको सुनने का यह पहला अवसर था और सुनकर बहुत अच्छा लगा। आज के दिये गए वक्तव्य का सार उन्हीं की कलम से.....
भाषा कैसे बचेगी
(आज दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी डीएवी कॉलेज में दिए वक्तव्य का सार)
भाषा का भारतीय परिप्रेक्ष्य लोकतंत्र के विकास से जुड़ा है,भाषा किताबों और कक्षाओं में नहीं बनती,वह परिवेश में बनती है और परिवेश में रहती है। भारत में लोकतंत्र का परिवेश जैसा होगा भाषा का चरित्र और स्वभाव वैसा होगा।आमतौर पर लोकतंत्र में भाषाएं पर्सुएशन पर निर्भर हैं। हिंदी या किसी भाषा के विकास की प्राथमिक शर्त है कि उसके पठन-पाठन की कितनी बेहतर व्यवस्था है। हिंदी के विकास के संदर्भ में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि यदि समाज में कोई भाषा ह्रास की शिकार है तो तय मानिए अन्य भाषाएं अपने ह्रास को बचा नहीं सकतीं,आज वे तमाम समाज भाषायी संकट से गुजर रहे हैं जहां लोकतंत्र है।
भाषा के विकास के लिए जरूरी है कि उसे वर्चस्व का औजार न बनाया जाए,जो भाषा वर्चस्व की भूमिका निभाने लगती है वह जनता से कटने लगती है,उसके प्रति आम जनता में नफरत पैदा हो जाती है, सरकारी भाषा के रुप में हिंदी के प्रसार ने हिंदी को हिंदी और गैर हिंदीभाषी जनता से काटा है। यही हाल बंगला का रहा है,एक जमाने में उड़ीसा, बिहार,असम को बंगाली जाति और बंगला भाषा के वर्चस्व में रहना पड़ा,कालांतर में इन इलाकों में स्वतंत्र राज्य पैदा हुए और बंगला के वर्चस्व के खिलाफ सबसे तीखी प्रतिक्रियाएं नजर आईं,आज उड़ीसा में बंगला नजर नहीं आती,झारखंड में हिंदी और बंगला की बजाय संथाली है, उत्तराखंड में हिंदी की बजाय कुमायुंनी और गढ़वाली का जलवा है, राजस्थान में हिंदी की बजाय राजस्थानी का रुतबा है। कहने का आशय यह कि भाषा को वर्चस्व की बजाय मित्रता - समानता का उपकरण बनाएं।
उल्लेखनीय है भारत में सभी भाषाएं संकटग्रस्त हैं,हम अपनी भाषा के बारे में सोचें साथ ही अन्य भाषाओं के बारे में भी सोचें,सभी भाषाओं और बोलियों को समानता की दृष्टि से देखें।
भाषा सभ्यता की संजीवनी है, लाइफ़ लाइन है, सभ्यता को बचाना है तो भाषा अर्जित करनी होगी,जन्मना भाषा नहीं मिलती, सिर्फ बोलने से भाषा नहीं बचती, हिंदी तब बचेगी जब हिंदी भाषी क्षेत्र की अन्य बोलियां और भाषाएं बचेंगी,मसलन्, अवधी,मैथिली, भोजपुरी,उर्दू आदि बचेंगी तो हिंदी बचेगी,यह संभव नहीं है कि उर्दू,अवधी खत्म हो जाएं और हिंदी बच जाए।असल में भाषाएं एक दूसरे से अंतर्गृथित रूप में जुडी हैं।एक भाषा मरेगी तो दूसरी पर उसका बुरा असर पड़ेगा।( 15-9-2018)

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

अल -शबाब के केन्या हिंसाचार के मायने


केन्या में अल-शबाब द्वारा किया गया गरिस्सा विश्वविद्यालय  नृशंस हत्याकांड निंदनीय है। इस घटना के जितने विवरण और ब्यौरे मीडिया में आ रहे हैं, उनसे अल-शबाब की आतंकी हरकतों का संकेत मात्र मिलता है। अल-शबाब के हमले में 147 लोग मारे गए इनमें अधिकतर लड़कियां हैं.तकरीबन 20 पुलिस और सुरक्षाकर्मी भी मारे गए हैं। यह हमला जिस तरह हुआ है उसने सारी दुनिया के लिए संकेत दिया है कि आतंकी हमेशा सुरक्षा की दृष्टि से  कमजोर इलाकों पर ही हमले करते हैं। इन हमलों के पीछे अल-शबाब की साम्प्रदायिक मंशाएं साफ दिख रही हैं, उनके निशाने पर गैर-मुस्लिम छात्र थे।
     उल्लेखनीय है यह संगठन केन्या में गैर-मुस्लिमों पर निरंतर हमले करता रहा है और इसे सोमालिया के  अल-कायदा के हिंसक हमलों के खिलाफ इस्तेमाल करने के मकसद से 2011 में संयुक्त राष्ट्र संघ की शांतिसेना की मदद के लिए शामिल किया गया था। अल-शबाब को अफ्रीकी यूनियन सेना की मदद से मुख्य सघन आबादी वाले इलाकों में तैनात किया गया और  उसके वर्चस्व का विस्तार किया गया।  खासकर केन्या,सोमालिया और उगांडा में उसके नेटवर्क का विस्तार करने में संयुक्त राष्ट्रसंघ शांति सेना और अफ्रीकी यूनियन सेना की अग्रणी भूमिका रही है। यह संगठन कई बार आम जनता पर आतंकी हमले कर चुका है। खासकर गैर-मुस्लिमों पर हमले करने में इसकी अग्रणी भूमिका रही है।
   अल-शबाब का गरिस्सा विश्वविद्यालय में निरीह छात्रों पर हमला करने के पीछे क्या मकसद था यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है लेकिन इस घटना ने समूचे केन्या को हिलाकर रख दिया है, उल्लेखनीय है कुछ दिन पहले पाकिस्तान में इसी तरह का आतंकी हमला स्कूली बच्चों पर हुआ था। पैटर्न साफ है कि आतंकी संगठन शिक्षा संस्थानों पर हमले करके आम जनता में दहशत पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में स्कूल में काम करने वाली नन पर हमला और बलात्कार उसी पैटर्न का अंग है।

      केन्या के जिस इलाके , गरिस्सा में यह हमला हुआ है वह बेहद गरीब और अभावग्रस्त है। यहां आमलोगों के पास कृषि आधारित काम-काज के अलावा कोई काम नहीं है। पशुपालन और कृषि ही उनकी आजीविका का आधार है, गरिस्सा वि वि में तकरीबन 900छात्र रहते हैं और जिस समय(3अप्रैल2015) शाम को पांच बजे यह आतंकी हमला हुआ उस समय विश्वविद्यालय में हलचल थी।  इनमें से 147 लोग घटनास्थल पर ही मारे गए ।  गरिस्सा विश्वविद्यालय में सभी छात्र 6 डोरमेट्री में रहते हैं। हमलावर आतंकी चुन-चुनकर ईसाईयों को खोज रहे थे। गरिस्सा विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कॉलिन वतनगोला ने कहा कि वह जब नहा रहा था तब उसने अचानक कैम्पस में गोलियां चलने की आवाजें सुनीं। गोलियों की आवाजें सुनने के साथ छात्रों ने अपने कमरे अंदर से बंद कर लिए,अध्यक्ष ने भी अंदर से कमरा बंद कर लिया था।गोला ने कहा  हम सिर्फ जूतों  और गोलियों की आवाजें सुन रहे थे,बीच बीच में अल-शबाब जिंदाबाद के नारे सुन रहे थे।
  अल-शबाब के आतंकियों ने बंदूक की नोंक पर जबरिया डोरमेट्री खुलवायीं और एक-एक छात्र से पूछा कि  कौन मुस्लिम है और कौन ईसाई है ? जिस छात्र ने अपने को ईसाई कहा उसे वहीं अलग करके गोलियों से भून दिया गया। छात्रसंघ के अध्यक्ष ने कहा प्रत्येक गोली के चलने पर उसे यही महसूस हो रहा था कि ये गोलियां अब मुझे भी लग सकती हैं। इस घटना के बाद बाकी बचे सभी छात्र गंभीर मानसिक यंत्रणा और आतंक की पीड़ा से गुजर रहे हैं। सारे केन्या में मातम फैला हुआ है।
      केन्या के आतंकी हमले का यही सबक है कि हर कीमत पर सभी धर्म के मानने वालों में प्रेम और सद्भाव बनाए रखें। भारत में जो लोग ईसाईयों पर हमले कर रहे हैं वे असल में उस अंतर्राष्ट्रीय आतंकी शिविर के मनसूबों को पूरा कर रहे हैं जो आतंकी कहलाते हैं और अपने को मुसलमानों का रखवाला भी कहते हैं। आतंकी हरकत चाहे वे किसी भी रुप में हो उसकी हम सबको एकजुट भाव से निंदा करनी चाहिए। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आदि समुदायों में हर हाल में सद्भाव बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है ।








गुरुवार, 27 नवंबर 2014

पाक अछूत नहीं है मोदीजी

   सार्क देशों के नेपाल सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में जो भाषण दिया उसमें उन्होंने एकबार भी पाकिस्तान का जिक्र नहीं किया। उन्हें श्रीलंका याद आया,नेपाल याद आया,बंगलादेश और मालदीव को उल्लेख योग्य समझा लेकिन पाकिस्तान का उन्होंने जिक्र तक नहीं किया। यहां तक कि 26/11की घटना का जिक्र किया, लेकिन न तो आतंकी संगठनों का कोई जिक्र किया और न पाकिस्तान का जिक्र किया। मोदी ने कहा ''आज जब हम 2008 में मुंबई में उस खौफनाक आतंकी घटना को याद करते हैं तो हमें अपने लोगों को खोने का कभी न खत्‍म होने वाला दर्द महसूस होता है। आतंकवाद और अंतर्राष्‍ट्रीय अपराधों से लड़ने के लिए हमने जो प्रतिज्ञा की है उसे पूरा करने के लिए हमें साथ मिलकर काम करना होगा।'' इन पंक्तियों के अलावा पूरे भाषण में आतंकवाद का कहीं कोई जिक्र नहीं है। 

मोदी जानते हैं कि दक्षिण एशिया के देशों में सबसे तनावपूर्ण संबंध भारत-पाक के बीच में हैं। इन तनावपूर्ण संबंधों को 'हठी राजनीति' के आधार पर सामान्य नहीं बनाया जा सकता। खासकर विदेशनीति के मामले में हठ नहीं चल सकता। विदेशनीति के तमाम चैनल और कोशिशें देशज दबावों और तनावों से मुक्त होकर ही सामान्य रुप में काम कर सकते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मनमोहन सरकार के जमाने में संघ का दबाव काम करता था और मोदी सरकार के जमाने में पाक के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के मामले में संघ का ही दबाव विदेशनीति पर असर डाल रहा है। मोदी सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे संघ के पाकविरोधी हठवाद से विदेशनीति को मुक्त रखे। संघ की मुश्किल है कि वह विदेशनीति के ऊपर दबाव बनाए रखने के चक्कर में देश-विदेश में पाकविरोधी मुहिम में तेजी बनाए रखता है।

यह सच है भारत को पाक प्रशिक्षित –संचालित आतंकी संगठनों से हमेशा खतरा बना रहता है और वे आए दिन जम्मू-कश्मीर में खासतौर पर हिंसक हरकतें करते रहते हैं। लेकिन इस बात को आधार बनाकर पाक से संबंध बिगाड़ना सही नहीं होगा। हमें पाक सरकार और पाक की जनता को आतंकियों से अलग करके देखना चाहिए। संघ की मुश्किल है कि वह पाक शासन,पाक जनता और आतंकी संगठनों एक साथ मिलाकर देखता है। सबके खिलाफ उन्मादी बयानबाजी करता रहता है, इससे भारत-पाक के बीच तनाव बना रहता है, मुसलमानों के प्रति घृणा बनी रहती है। मोदी सरकार ने अब तक पाक से बातचीत न करने का जो बहाना दिया है वह सही नहीं है,मोदी सरकार का कहना है पाक ने हुर्रियत कॉफ्रेस के नेताओं के मुलाकात करके सदभाव का माहौल तोड़ा है इसलिए बातचीत नहीं करेंगे। सच यह है जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों तक संघ, पाकविरोधी गरमी बनाए रखने के लिए विदेशनीति का दुरुपयोग कर रहा है, जिससे जम्मू-कश्मीर में वोटबैंक बनाया जा सके।

उल्लेखनीय है पाक स्थित आतंकी हाफिज सईद से वेदप्रताप वैदिक मिले तो संघ को कोई परेशानी नहीं हुई, पाक ने भी इस मुलाकात पर आपत्ति नहीं की,बल्कि उलटे सईद-वैदिक मुलाकात की पाक सरकार ने ही व्यवस्था करायी, सारा देश जानता है कि मोदी सरकार ने ही वैदिक सरकार को रहस्यमय मिशन के लिए पाक भेजा था। वैदिक के संघ के साथ मित्रतापूर्णसंबंध हैं,वे उनके जलसों में जाते रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव खत्म होते ही भारत-पाक बातचीत के लिए मोदीजी राजी होंगे।

पाकहठ के कारण संघ और उसका भोंपू मीडिया लगातार इस्लाम,पाक और मुसलमान इन तीनों के खिलाफ अहर्निश प्रौपेगैण्डा कर रहा है। इससे समूचा माहौल विषाक्त हो रहा है। विदेशनीति को घरेलू वोटबैंक के लिए और खासकर बहुसंख्यकवाद के आधार पर हिन्दुओं को गोलबंद करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। संघ को यदि सच में देशसेवा करनी है तो पाकहठ त्यागना होगा। पाक को स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के रुप में सम्मान देकर बात करने की आदत डालनी होगी। पाक हठ से पाक को मदद मिल रही है भारत को नहीं। पाक को विश्व रंगमंच पर हम अलग-थलग नहीं कर पा रहे हैं।



दूसरी बात यह कि भारत के हित में है कि पाक में लोकतंत्र रहे और वहां काम करने वाली लोकतांत्रिक सरकार को हम समर्थन दें। पाक में लोकतंत्र का अभाव हमारे लिए और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए खतरा है। पाक स्थित आतंकी संगठन लगातार पाक में लोकतंत्र के अभाव का दुरुपयोग करते रहे हैं। पाक में इस समय लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुनी गयी सरकार है और पाक में लोकतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया चल रही है जिसमें हमें लोकतांत्रिक शक्तियों का समर्थन करना चाहिए। मोदी सरकार ने पाकहठ के आधार पर पाक की लोकतांत्रिक सरकार से बातचीत बंद करके अप्रत्यक्षतौर पर पाक की अ-लोकतांत्रिक ताकतों का मनोबल ऊँचा उठाने का काम किया है। बेहतर यही होगा कि मोदी सरकार पाठ हठ छोड़े और पाक के प्रति अछूतभाव त्यागे।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

मीडियायुग में किताब को जिंदा रखो

       स्त्री और पुरूष दोनों किस्म के लेखन में संरक्षक का बड़ा महत्व है। वर्जीनिया वुल्फ ने संरक्षक के सवाल पर विचार करते हुए लिखा है कि आम तौर पर स्त्री पुरूष दोनों ही अव्यावहारिक सलाह के आधार पर लिखते हैं। सलाह देने वाले यह सोचते ही नहीं हैं कि उनके दिमाग में क्या है। लेखक चाहे या न चाहे वे अपनी सलाह दे देते हैं।
      लेखक को अपना आश्रयदाता,संरक्षक,सलाहकार सावधानी के साथ चुनना चाहिए। लेखक को लिखना होता है जिसे अन्य कोई पढ़ता है। आश्रयदाता आपको सिर्फ पैसा ही नहीं देता बल्कि यह भी बताता है कि क्या लिखो,इसकी प्रच्छन्न रूप में सलाह या प्रेरणा भी देता है। अत: आश्रयदाता या संरक्षक ऐसा व्यक्ति हो जिसे आप पसंद करते हों।लोग जिसे पसंद करें।यह पसंदीदा व्यक्ति कौन होगा ? कैसा होगा ?
       प्रत्येक काल में पसंदीदा व्यक्ति की अवधारणा बदलती रही है। मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक लेखक के आश्रयदाता और पसंदीदा व्यक्ति का विवेचन करने के बाद वर्जीनिया वुल्फ ने लिखा है प्रत्येक लेखक की अपनी जनता होती है। अपना पाठकवर्ग होता है। यह पाठकवर्ग आज्ञाकारी की तरह अपने लेखक का अनुसरण करता है। उसकी रचनाएं पढ़ता है।लेखक अपनी जनता के प्रति सजग भी रहता है। उससे ज्यादा श्रेष्ठ बने रहने की कोशिश भी करता है। लेखक की अपनी जनता में जनप्रियता अपने लेखन के कारण होती है। क्योंकि लेखन ही संप्रेषण है।
          आधुनिक लेखक का संरक्षक उसका पाठकवर्ग है,जनता है।आधुनिक काल में पत्रकारिता का लेखक पर दबाव होता है कि वह प्रेस में लिखे,पत्रकारिता पूरी कोशिश करती है कि किताब में लिखना बेकार है, कोई नहीं पढ़ता,अत: प्रेस में लिखो। वुल्फ ने लिखा है कि इस धारणा को चुनौती दी जानी चाहिए। किताब को हर हालत में जिन्दा रखा जाना चाहिए।किताब को पत्रकारिता के सामने जिन्दा रखने के लिए जरूरी है कि उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए।
      हमें ऐसे संरक्षक की खोज करनी चाहिए जो पढ़ने वालों तक पुस्तक ले जा सके। हमें किताब के साथ खेलने वालों की नहीं पढ़ने वालों की जरूरत है। ऐसा साहित्य लिखा जाए जो अन्य युग के साहित्य को निर्देशित कर सके,अन्य जाति के लोगों को आदेश दे सके।लेखक को अपने संरक्षक का चुनाव करना चाहिए,यह उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि उसे कैसे चुना जाए ? कैसे अच्छा लिखा जाए ? वर्जीनिया वुल्फ ने सवाल उठाया है कि हमारे साहित्य में स्त्री का चेहरा तो आता है।किन्तु उसकी इच्छाएं नहीं आतीं। उसके भाव नहीं आते। उसके प्रति सबके मन में सहानुभूति है,वह सब जगह दिखाई भी देती है। किन्तु उसकी इच्छाएं कहीं भी नजर नहीं आतीं।
         वुल्फ कहती है पुस्तक कैसे पढ़ें इसके बारे में कोई भी निर्देश नहीं दिए जा सकते। प्रत्येक पाठक को जैसे उचित लगे पढ़ना चाहिए। उसे अपने तर्क का इस्तेमाल करना चाहिए और अपने निष्कर्ष निकालने चाहिए। हमें स्वतंत्रता का प्रयोग करना चाहिए। किन्तु कहीं ऐसा न हो कि इसका दुरूपयोग होने लगे। पाठक की शक्ति का सही इस्तेमाल करने के लिए उसके प्रशिक्षण की भी जरूरत है।
     पुस्तक पढ़ते समय यह ध्यान रखा जाए कि हम कहां से शुरूआत करते हैं ? हम पाठ में व्याप्त अव्यवस्था में कैसे व्यवस्था पैदा करते हैं, उसे कैसे एक अनुशासन में बांधकर पढ़ते हैं। जिससे उसमें गंभीरता से आनंद लिया जा सके। पुस्तक पढते समय हमें विधाओं में प्रचलित मान्यताओं का त्याग करके पढ़ना चाहिए।
     मसलन् लोग मानते हैं कि कहानी सत्य होती है। कविता छद्म होती है। जीवनी में चाटुकारिता होती है, इतिहास में पूर्वाग्रह होते हैं। हमें इस तरह की पूर्व धारणाओं को त्यागकर साहित्य पढ़ना चाहिए। आप अपने लेखक को निर्देश या आदेश न दें। बल्कि उसे खोजने की कोशिश करें। लेखक जैसा बनने की कोशिश करें। उसके सहयात्री बनें। यदि आप पहले से ही किसी लेखक की आलोचना करेंगे तो उसकी कृति का आनंद नहीं ले पाएंगे। यदि खुले दिमाग और व्यापक परिप्रेक्ष्य में कृति को पढ़ने की कोशिश करेंगे तो कृति में निहित श्रेष्ठ अंश को खोज पाएंगे।
       निबंध विधा के बारे में वर्जीनिया वुल्फ का मानना था निबंध छोटा भी हो सकता है और लंबा भी।गंभीर भी हो सकता है और अगंभीर भी। वह पाठक को आनंद देता है। वह किसी भी विषय पर हो सकता है। निबंध का अंतिम लक्ष्य है पाठक को आनंद देना। निबंध को पानी और शराब की तरह शुध्द होना चाहिए। अपवित्रता का वहां कोई स्थान नहीं है।निबंध में सत्य को एकदम नग्न यथार्थ की तरह आना चाहिए।सत्य ही निबंध को प्रामाणिक बनाता है।उसको सीमित दायरे से बाहर ले जाता है।सघन बनाता है।विक्टोरियन युग में लेखक लंबे निबंध लिखते थे ? उस समय पाठक के पास समय था।वह आराम से बैठकर लंबे निबंध पढ़ता था। लंबे समय से निबंध के स्वरूप में बदलाव आता रहा है। इसके बावजूद निबंध जिन्दा है। अपना विकास कर रहा है।वुल्फ का मानना था कि निबंध सबसे सटीक और खतरनाक उपकरण है।इसमें आप भगवान के बारे में लिख सकते हैं।व्यक्ति के जीवन के दुख,सुख के बारे में लिख सकते हैं।निबंध ही था जिसके कारण लेखक का व्यक्तित्व साहित्य में दाखिल हुआ। निबंध शैली का बडा महत्व है। किसी लेखक के बारे में लिख सकते हैं।यह भी सच है कि इतिहास का उदय निबंध से हुआ है।










शुक्रवार, 18 जून 2010

संघ परिवार के विचार मुसोलिनी से क्यों मिलते हैं ?

      भारत में फासीवाद सबसे गंभीर राजनीतिक चुनौती है। मनमोहन सिंह की सरकार जिस आर्थिक एजेण्डे पर चल रही है उससे देश में अनुदारवादी विचारधाराओं के फलने-फूलने का पूरा वातावरण बन रहा है। अनेक मोर्चों पर कांग्रेस पार्टी की नीतियों की असफलता साफ नजर आ रही है। कांग्रेस पार्टी की कारपोरेट घरानों की पक्षधर जनविरोधी नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि आज देश में विभाजनकारी,फासीवादी और आतंकी ताकतें देश में चारों ओर सिर उठाए घूम रही हैं।
     कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक कार्यक्रम की सबसे बड़ी असफलता है देश में फासीवादी- साम्प्रदायिक ताकतों को न रोक पाना। कांग्रेस की 125 साल की राजनीतिक असफलता है आरएसएस ,भाजपा आदि फासीवादी-साम्प्रदायिक संगठनों का राजनीतिक शक्ति के रूप में विकास। हमें गंभीरता के साथ उन विचारधारात्मक कारणों की खोज करनी चाहिए जिसके कारण फासीवाद फलता-फूलता है।
       हिन्दी में ग्रंथ शिल्पी प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित एक शानदार किताब बाजार में आयी है। ‘फासीवादःसिद्धान्त और व्यवहार’, लेखक हैं रोज़े बूर्दरों। रोज़े ने फासीवाद को व्यापक फलक पर विचार किया है, लिखा है, ‘‘फासीवादी, नात्सीवादी और फलांजवादी कार्यक्रम राजनीतिक कर्म के अर्थ में 'हर पार्टी के सारभूत सिद्धांतों की दिशा को अभिव्यक्त या सार संकलित करते हैं। अब हमें सैद्धांतिक दिशा को सुस्पष्ट करना है ताकि फासीवादी विचारधारा की पहचान करने वाले समान आधारों को विश्लेषित किया जा सके। स्रोतों की कमी नहीं है । मुसोलिनी के भाषण और लेखन, विचारक जेंतील का लेखन, इतालवी विश्वकोष, प्रेत्सोलीनी वालेंजियानी या गारजुलेनी जैसे लोकप्रिय विचारकों की कृतियां फासीवादी विचारधारा के अध्ययन के लिए अनिवार्य हैं।
        नात्सीवाद के लिए रोजेनवर्ग लिखित पुस्तक 'बीसवीं शताब्दी का मिथक' (ल मिथ द वंतियम सिएक्वल) के पहले माइन कांप्फ (मेरा संघर्ष), नात्सी पार्टी के विचारधारात्मक पाठ और संस्थापन के विचारों पर नात्सी पार्टी के अन्य नेताओं के विमर्श। स्पेन के फ्रांकोवाद के लिए भी दस्तावेजों की बहुलता है।
      गृह-युद्ध के पहले के लिए अंतोनियो प्रिमो का लेखन हैं जो फ्रांकोवाद के प्रारंभिक दिनों को परिभाषित करता है। फ्रांको और उसके अनुयायियों के भाषण भी स्रोत हैं। पी.ए. मारकोथ ने भी राष्ट्रवादी-सिंडीकलवादी स्पेन' पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। इसके अलावा, फलांज कार्यक्रम फासीवादी और नात्सीवादी कार्यक्रमों से भी ज्यादा विचारधारात्मक सरोकार प्रस्तुत करते हैं।
इसके बावजूद कि दस्तावेजों की प्रचुरता है, कार्य ठीक से नहीं हुआहर आंदोलन अपने राष्ट्रीय मूल से गहराई से प्रभावित है, और विचारधारा के स्तर पर विशिष्ट लगता है। नात्सीवाद में नस्लवाद की व्याप्ति, जो और कहीं नहीं है, आंदोलनों की विशिष्टता को चिन्हित करती है। शैली और प्रस्तुति की विभिन्नता उन्हें अलग करती है। जेंतील की सूक्ष्म और बारीक टिप्पणियों और रोजेनबर्ग के भडक़ीले लेखन के बीच कोई समानता नहीं हैं। इसी तरह इतालवी विश्वकोष में फासीवादी विचारों की प्रगतिशील प्रस्तुति और 'माइन कांफ' के तथ्यों और विचारों (उदारवाद विरोध) या तो किसी दूसरे सिध्दांत के रू-ब-रू एक नकारात्मक सैध्दांतिक अवस्थिति (जैसे 'वर्ग संघर्ष' के रू-ब-रू सभी के उत्पादक होने की अवधारणा) मनुष्यों की समानता के रू-ब-रू श्रेणी बध्दता का सिध्दांत है।
समाहार करते हुए मुझे लगता है कि इन आंदोलनों के बीच एक वांछित विचारधारात्मक समान आधार चिह्नित कर पाना कठिन होगा। एक ही संभावना दिखती है। इन तीनों ही आंदोलनों में किसी एक दूसरे सिद्धांत के प्रति एक उग्र प्रतिकार है।
यहां एक तथ्य उल्लेखनीय है। विचारधारात्मक लेखन में प्राय: राष्ट्रवाद अंतर्राष्ट्रीयतावाद के प्रति और राष्ट्र का विनाश करने वाले वर्ग संघर्ष के प्रति संपूर्ण प्रतिकार के माध्यम से ही परिभाषित होता है, कम से कम इसी अर्थ में वह सद्गुण संपन्न लगता है। क्या आंदोलन किसी के पक्ष में होने के पहले, और मुख्य रूप से, विपक्ष में नहीं होते? क्या मुख्य विचारधारा किसी विशेष विरोधी के विरोध में ही नहीं विकसित होती?’’
 रोज़े ने लिखा है फासीवाद का प्रधान लक्ष्य है मार्क्सवाद को पीछे धकेलना। विभिन्न रंगत के फासीवादी संगठन भारत में भी कम्युनिस्टों को परास्त करने के लिए एकजुट हो जाते हैं। खासकर संघ परिवार और उससे जुड़े संगठनों का एकमात्र लक्ष्य है मार्क्सवाद के खिलाफ जहर उगलना।
रोज़े ने सही लिखा है कि ‘‘जहां तक मार्क्सवाद और मार्क्सवादी पार्टियों का संबंध है, फासीवादी आंदोलनों में प्रयुक्त शब्द बहुत सटीक नहीं है। फासीवादी जानबूझ कर गोलमोल शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। और 'मार्क्सवाद' 'समाजवाद' 'कम्युनिज्म' के बीच फर्क नहीं करते और कम्युनिस्ट आंदोलन और सोशल-डेमोक्रेसी के बीच भी फर्क नहीं करते। इन आंदोलनों के संस्थापक और विचारक जब अपने आंदोलन के सिद्धांत परिभाषित करते हैं तो मार्क्सवादी विचारों के नकार से ही शुरू करते हैं। इसके अनगिनत उदाहरण हैं।
    रोज़े ने सही लिखा है कि फासीवादी संगठनों का लक्ष्य है मार्क्सवाद का विरोध करना,साथ मार्क्सवादी  धारणाओं को विकृत करना और उनके बारे में विभ्रम पैदा करना। रोज़े ने अपनी किताब में विस्तार के साथ इटली.जर्मनी,स्पेन आदि के फासीवादी नेताओं के विचारों को उद्धृत करते हुए फासीवाद के विश्वव्यापी साझा कार्यक्रम का उदघाटन किया है।
    रोज़े ने इटली के फासीवादी शासक मुसोलिनी को उद्धृत करते हुए जिन बातों की ओर ध्यान खींचा है ,वे बातें आए दिन संघ परिवार के नेता अपने प्रकाशनों और राजनीतिक कार्यक्रम में व्यक्त करते हैं। रोज़े ने लिखा है-
‘‘21 जून 1921 को सत्ता प्राप्ति के पहले मुसोलिनी ने संसद में मार्क्सवाद के विध्वंस को सारभूत उद्देश्य के रूप में चिह्नित किया था :
'हम अपनी पूरी शक्ति के साथ समाजीकरण, राज्यीकरण और सामूहिकीकरण की कोशिशों का विरोध करेंगे। राजकीय समाजवाद से हम भर पाए। हम आपके जटिल सिद्धांतों, जिन्हें हम सत्य और नियतिविरोधी करार देते हैं, के विरुद्ध अपना सैद्धांतिक संघर्ष छोड़ेंगे नहीं। हम नकारते हैं कि दो वर्गों का अस्तित्व है, क्योंकि और बहुतों का भी अस्तित्व है। हम नकारते हैं कि आर्थिक नियतिवाद के जरिए समस्त मानव-इतिहास की व्याख्या की जा सकती है। हम आपके अतंर्राष्ट्रीयतावाद को नकारते हैं। क्योंकि यह एक बुध्दि-विलास है। इसे केवल उन्नत वर्ग व्यवहार में ला सकते हैं जबकि आम जनता हताश है और अपनी जन्मभूमि से जुड़ी हुई हैं। ’’
     भारत में संघ परिवार का प्रधान एजेण्डा वही है जो एक जमाने में इटली में फासीवादी महानायक मुसोलिनी का था। संघ परिवार और उसके संगठन सरकारीकरण,राष्ट्रीयकरण,सामूहिकीकरण आदि का जमकर प्रतिरोध करते रहे हैं। वे यह भी नहीं मानते कि भारतीय समाज वर्गों में बंटा है। उनके अनुसार भारत में वर्गों का नहीं  जाति और वर्ण का अस्तित्व है। वे यह मानते हैं कि सामाजिक,सांस्कृतिक,राजनीतिक परिवर्तनों को देखने के लिए आर्थिक कारकों को प्रधान और निर्णायक कारक नहीं माना जा सकता। वे कम्युनिस्टों के अंतर्राष्ट्रीयतावाद का विरोध करते हैं लेकिन फासीवादी संगठनों की विचारधारात्मक विश्वव्यापी एकजुटता का प्रच्छन्नतःसमर्थन करते हैं।  

  फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार
  लेखक-  रोजे बूर्दरों
प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092
         मूल्य -275  

शनिवार, 15 मई 2010

रामचरित मानस की अर्थ संरचनाएं



       रामचरित मानस लोक-महाकाव्य है। इसके उपयोग और दुरूपयोग की अनंत संभावनाए हैं।लोक-महाकाव्य एकायामी नहीं बल्कि बहुआयामी होता है,इसमें एक नहीं एकाधिक विचारधाराएं होती हैं। इसका पाठ संपूर्ण और बंद होता है किंतु अर्थ- संरचनाएं खुली होती हैं, इसके पाठ की स्वायत्तता पाठ की व्याख्या की समस्त धारणाओं के लिए आज भी चुनौती बनी हुई है। लोक-महाकाव्य का अर्थ कृति में नहीं सामाजिक के मन में होता है।पाठक के इच्छित-भाव की तुष्टि का यह सबसे बड़ा स्रोत है,इतिहास की रचना में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है।साथ ही इच्छित इतिहास के निर्माण के लिए इसका व्यापक स्तर पर उपयोग और दुरूपयोग होता रहा है।

हिन्दी में आलोचना खूब लिखी जाती है,किंतु ज्यादातर आलोचना 'कला के लिए कला' की तरह 'आलोचना के लिए आलोचना ' की तर्ज पर लिखी जाती है,हिन्दी में आलोचना की पध्दति और सैध्दान्तिकी का शास्त्र हम आज तक नहीं बना पाए हैं। हमारे पास अभी तक एक भी आलोचना की मुकम्मल किताब नहीं है,आलोचना के बारे में सम्मानजनक ढ़ंग से कहने के लिए कुछ निबंध हैं,कुछ समीक्षाएं हैं,कुछ बहस के लिए लिखी गयी वकीलों जैसी दलीलें हैं,जिनमें हमारे आलोचकगण अपने मुवक्किल की पैरवी करते नजर आते हैं। मसलन् हमारे यहां तुलसीदास के बारे में टनों पन्नो लिखे गए हैं, इसके बावजूद लेवीस्त्रास जैसी एक आलोचना की किताब नहीं है।जिसमें तुलसी के मिथकों का खुलासा किया गया हो और सैध्दान्तिकी भी बनायी गयी हो।

हमारे यहां आलोचना अभी 'केजुअल' कर्म है,मनमाना कार्य है। हिन्दी के आलोचक जब किसी विषय पर लिखते हैं तो 'केजुअल वर्कर' की तरह पेश आते हैं, उन्हें सिलटाने में दिलचस्पी ज्यादा है।वे अभी तक आलोचना को नियमित सैध्दान्तिकी के दर्जे तक नहीं पहुँचा सके हैं। उसका शास्त्र नहीं बना पाए हैं।यही वजह है कि हिन्दी में आलोचना लिखने के लिए अंग्रेजी में लिखी आलोचना के पास जाना होता है, हिन्दी का आलोचना साहित्य हमें किसी भी किस्म की आलोचनात्मक मदद या सलाह नहीं देता।हमें इस समस्या पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्यों हुआ कि हमारी आलोचना अभी तक गंभीर नहीं हो पायी।अंग्रेजी,जर्मन,फ्रेंच,रूसी आदि भाषाओं में आलोचना के महत्वपूर्ण स्कूल मिल जाएंगे,सैध्दान्तिक मॉडल मिल जाएंगे,शोध में सहारे के लिए अच्छे सैध्दान्तिक उध्दरण मिल जाएंगे,किंतु हिन्दी में इन सबका अकाल पड़ा हुआ है। आखिरकार आलोचना के क्षेत्र में हमसे कहां चूक हुई है ?इतनी बड़ी चूक को व्यक्तिगत मामला कहकर टाला नहीं जा सकता।इस दुर्दशा के लिए निश्चित रूप से आलोचकगण जिम्मेदार हैं,किंतु मामले का आलोचक एक छोटा सा हिस्सा है। आलोचना के लिए जिस तरह के संस्थान,अनुसंधान संरचना,माहौल,विवेक, और पध्दति की जरूरत होती है, अकादमिक अनुशासन ,इन्फ्रास्ट्रक्चर ,और शोधार्थी तैयार करने की जरूरत होती है,शोध को गंभीर बनाने और उसका सम्मान करने की जरूरत होती है,उसकी ओर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। जबकि हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होता है,सबसे ज्यादा पीएचडी लिखी जाती हैं,साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी में सबसे ज्यादा शिक्षक हैं,किंतु एक भी ऐसा अनुसंधान केन्द्र नहीं है जहां शोध की पध्दति और उसका शास्त्र सिखाया जाता हो ,और गंभीरता से अनुसंधान कार्य किया जाता हो।

हिन्दी में आलोचना का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की पहली शर्त है कि आलोचना और हिन्दी विभागों को गंभीरता से चेले बनाने,पट्ठे बनाने,पालने,उनकी नियुक्ति कराने के धंधे से मुक्त किया जाए,हिन्दी के विभागों में अकादमिक क्षमता और उसके आधार पर शोध के नए क्षेत्रों को खोला जाए,गंभीरता के साथ शोध की पध्दति और सैध्दान्तिकी के निर्माण की दिशा में प्रयास किए जाएं।

रामकथा के ऊपर विचार करते हुए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रश्न उठाया है कि 'राम का चरित्र ऊँचा है कि नीचा,लक्ष्मण का चरित्र हमें अच्छा लगता है कि बुरा,यह आलोचना काफी नहीं है।मौन होकर श्रध्दा के साथ विचा करना होगा कि समस्त भारतवर्ष में हजारों साल से इन्हें किस प्रकार ग्रहण किया है।' यानी रामकथा को किस प्रकार ग्रहण किया है।टैगोर ने लिखा है ' राम का चरित्र मनुष्य का चरित्र होने के नाते ही महिमा से मंडित है।' ... 'रामायण उसी नर चन्द्रमा की कथा है देवता की कथा नहीं।' रामायण में 'देवता ने अपने को छोटा करके मनुष्य को छोटा नहीं बनाया,मनुष्य ही अपने गुण से देवता हो उठा है।' इसी क्रम में रामकथा के एक नए आयाम को उद्धाटित करते हुए टैगोर ने लिखा 'रामायण की प्रधान विशेषता है कि उसने घर की बात को ही बड़ा करके दिखाया है।इसमें केवल कवि का परिचय ही नहीं ,भारतवर्ष का परिचय मिलता है।इससे समझ में आएगा कि गृह और गृहधर्म को भारतवर्ष कितना महत्व देता है।हमारे देश में गृहस्थ-आश्रम का जो इतना ऊँचा स्थान था,इस काव्य में उसी को प्रमाणित किया गया है।गृहस्थाश्रम हमारे सामने सुख के लिए सुविधा के लिए न था। गृहस्थाश्रम पूरे समाज को समेटकर रखता था और मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाता था।गृहस्थाश्रम भारतवर्षीय आर्य समाज की भित्तिा है।' इसी तरह मुक्तिबोध ने लिखा है, ' तत्कालीन मानव संबंध,विश्व-दृष्टि तथा जीवन-मूल्यों के सर्वोच्च प्रतीक राम की मानवता हमें प्रभावित करती है।'भक्ति- आंदोलन की तरह ही रामचरित मानस की केन्द्रीय अभिव्यक्ति प्रेम और ज्ञान केन्द्रित है। इन दोनों ही तत्वों का सामंतवाद से सीधा अन्तर्विरोध है।ज्ञान और प्रेम का संदेश आधुनिक बोध पैदा करता है।तुलसीदास को रामचरित मानस लिखने की प्रेरणा धर्मग्रंथों या देवोपासना से नहीं मिली थी,बल्कि दरिद्रता,भूख और सामाजिक उत्पीडन देखकर प्रेरणा मिली थी। आत्म सम्मान के साथ जीना और मनुष्य के आगे हाथ नहीं पसारना तुलसी की चिंताधारा का मुख्यबिंदु है।रामविलास शर्मा के अनुसार तुलसी की दृष्टि में सबसे बड़ा धर्म है दीनों की सेवा,सबसे बड़ा पाप है उनका उत्पीड़न।वे दुखानुभूति का साधारणीकरण करते हैं।

जिस समय हिन्दी भाषी क्षेत्र में आर्यसमाज के नेतृत्व में समाज-सुधार की लहर चल रही थी,उस समय स्वामी दयानंद सरस्वती की धूम मची हुई थी,सनातनियों के तर्कों का खण्डन करने के लिए उन्होंने उस समय एक किताब प्रकाशित की जिसका नाम था ''सत्यार्थप्रकाश'', इस किताब के अंत में स्वामीजी ने अस्पृश्य किताबों की एक सूची जारी की थी,इसमें तुलसीदास की कृति ''रामचरित मानस'' का पहला नम्बर था,यानी आर्यसमाज के नेता ''रामचरित मानस'' को समाज -सुधार में सबसे बड़ी बाधा मानते थे, वहीं दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को अपनी इतिहास दृष्टि के लिए सबसे बड़े कवि के रूप में तुलसीदास और कृति के रूप में ''रामचरित मानस'' महत्वपूर्ण लगा।प्रगतिशीलों में रामविलास शर्मा को तुलसी सबसे प्रिय हैं,जबकि रांगेय राघव के लिए सबसे अप्रिय लेखक हैं।मुक्तिबोध को तुलसी का रामचरित मानस सवर्णों के वर्चस्व का औजार लगा और भक्ति-आन्दोलन की निम्नवर्णोंन्मुख धारा को पलटने वाली कृति।उन्होंने तुलसी को सवर्णों के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में व्याख्यायित किया ।

हिन्दी आलोचना की नजर में रामचरित मानस एक ऐतिहासिक पाठ है,ऐतिहासिक पाठ के रूप में ही उसे देखने और व्याख्यायित करने की परंपरा है।मजेदार बात यह है कि 'रामचरित मानस' को जो आलोचक ऐतिहासिक पाठ मानते हैं,वे पाठालोचन के सिध्दान्तों का पालन नहीं करते,यह स्थिति कमोबेश सबके यहां है। हम यह भी कह सकते हैं हिन्दी की आलोचना को उत्पादन के प्रति जितना आकर्षण है,उतनी आलोचना निर्माण,आलोचना पध्दति के निर्माण में उतनी दिलचस्पी नहीं है।यही वजह है कि हिन्दी में पाठालोचन का अकादमिक जगत में एक भी स्कूल निर्मित नहीं हो पाया। बल्कि इसके विपरीत अकादमिक आलोचना के प्रति खास तरीके से घृणा पैदा की गयी।जिससे आलोचना अपनी कमियों से ध्यान हटा सके।

हिन्दी में अकादमिक आलोचना को सम्मान की बजाय घृणा की नजर से देखा गया। दूसरी ओर अकादमिक जगत ने भी इस स्थिति को दुरूस्त करने के लिए कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया। आलोचना के कठमुल्लेपन का ही यह परिणाम निकला कि जब नामवर सिंह ने 'दूसरी परंपरा' की बात कही तो रामविलासजी भड़क पड़े। यदि कोई व्यक्ति परंपरागत रामचन्द्र शुक्ल-रामविलास शर्मा पंथी आलोचना से इतर नयी साहित्य सैध्दान्तिकी के सहारे किसी कृति को पढ़ना चाहता है तो उसे त्याज्य घोषित कर दिया जाता है।आलोचना की इस मनोदशा में व्याख्या और पुनर्व्याख्या की दृष्टि से भिन्न खास किस्म का सामंतीभाव है जिसमें अन्य किस्म के नजरिए के लिए कोई जगह नहीं है।

हिन्दी में प्रगतिशील आलोचना में एक स्कूल ऐसे विचारकों का रहा है जिनके प्रतिनिधि रांगेय राघव हैं तो दूसरा ग्रुप रामविलास शर्मा का है,हिन्दी में रांगेय राघव की मूल्यांकन दृष्टि में तुलसी को गरियाने का भाव था,तुलसी को खारिज करने का भाव था,उपहास का भाव था,इसी के प्रत्युत्तर में रामविलास शर्मा ने अपने तुलसी संबंधी नजरिए का विकास किया और 'साहित्य समाज का दर्पण है' और 'साहित्य प्रतिबध्द' होता है ,इन दो धारणाओं के आधार पर तुलसी संबंधी अपने मूल्यांकन की आधारशिला रखी, इस क्रम में हिन्दी में मानस के बारे में प्रचलित अध्यात्मवादी मूल्यांकन और संकीर्णतावादी दृष्टियों का जमकर विरोध किया और तुलसी को लोकवादी और जन-जन के पक्षधर कवि के रूप में प्रतिष्ठित किया।

इस क्रम रामविलास शर्मा ने प्रगतिशील लेखक संघ के 1936 और 1938 के घोषणापत्रों में व्यक्त मध्यकालीन साहित्य संबंधी दृष्टिकोण्ा का भी खण्डन किया है। निश्चित रूप से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना के पैराडाइम को बदलने में रामविलास शर्मा का महत्वपूर्ण अवदान है।वहीं दूसरी ओर नामवर सिंह ने 'दूसरी परंपरा की खोज' में कबीर को प्रतिष्ठित करने के बहाने आलोचना के परंपरागत रूझान को परंपरा से ही काटने की कोशिश की,नामवर सिंह इस अर्थ में भिन्न हैं कि उन्होंने आलोचना में लकीर के फकीर बने रहने से इंकार किया।यह मूलत: भिन्नता का मार्ग है।

परंपराओं के मूल्यांकन की एकाधिक पध्दतियों को स्वीकार करने का दुस्साहस है,किंतु इसकी भी सीमाएं हैं,इसकी सबसे बड़ी सीमा है द्विवेदीजी के प्रति अनालोचनात्मक भाव।

रामविलास शर्मा के यहां परंपरा एक ही है,नामवर सिंह साहस करके 'दूसरी परंपरा' तक पहुँचते हैं,किंतु इसमें उन्हें अपने गुरू हजारीप्रसाद द्विवेदी से भिन्न परंपरा दिखाई नहीं देती,वरन यह कैसे हो सकता है कि परंपरा का सारा विवाद शुक्ल -द्विवेदी जी के इर्द-गिर्द ही परिक्रमा कर रहा है।दोनों आलोचकों में कई बुनियादी साम्य हैं,पहला साम्य यह है कि दोनों मिथकीय आधार पर दो काव्य धाराएं मानते हैं,रामभक्ति और कृष्णभक्तिधारा। निर्गुण और सगुण और राम और कृष्णभक्ति काव्य परंपरा के नाम पर स्त्री-दलित विरोधी पैराडाइम तैयार किया गया,इस पैराडाइम की धुरी है पितृसत्तात्मक विचारधारा।इस पैराडाइम को समग्रता में उद्धाटित करने की जरूरत है। हिन्दी की पहली और दूसरी परंपरा को तरह-तरह से खाद -पानी देने का काम हिन्दी आलोचना करती रही है।कायदे से हिन्दी में साहित्य,दलित साहित्य और स्त्री साहित्य ये तीन परंपराएं मिलती हैं।इनका स्वतंत्र आधार है साथ ही इनमें संपर्क भी है।रामविलास शर्मा-नामवर सिंह की आलोचना में दूसरा साम्य यह है कि दोनों स्त्री और दलित काव्य परंपरा को अस्वीकार करते हैं, तीसरा साम्य यह है दोनों ने विचारधारा के रूप में पितृसत्ता की उपेक्षा की है।मजेदार बात यह है एक को तुलसी पसंद है तो दूसरे को कबीर, दोनों ने मीराबाई को केन्द्र में नहीं रखा, कबीर को महान् बनाने के नाम पर कबीर को दलित परंपरा के बाहर ले जाकर हजम करने का प्रयास किया गया,कबीर को साहित्य के पैराडाइम पर रखकर परखा गया,जबकि कबीर को दलित साहित्य के पैराडाइम पर रखकर देखा जाना चाहिए। सवाल यह है कि क्या साहित्य की आलोचना का धर्मनिरपेक्ष आधार स्त्री,दलित और पितृसत्ता के बिना तैयार होता है ?जी नहीं,धर्मनिरपेक्ष आलोचना परंपरा के निर्माण के लिए स्त्री,दलित और पितृसत्ता की उपेक्षा संभव नहीं है। इन तीनों से रहित आलोचना को धर्मनिरपेक्ष आलोचना नहीं कहा जा सकता है।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

डिजिटल युग में लघुपत्रिकाओं की समस्याएं

        डिजिटल की दुनिया ने हमारे रचना संसार के सभी उपकरणों पर कब्जा जमा लिया है। लघुपत्रिका अथवा साहित्यिक पत्रकारिता जब शुरू हुई थी तो हमने यह सोचा ही नहीं था कि ये पत्रिकाएं क्या करने जा रही हैं। हमारी पत्रकारिता और पत्रकारिता के इतिहासकारों ने कभी गंभीरता से मीडिया तकनीक के चरित्र की गंभीरता से मीमांसा नहीं की। हम अभी तक नहीं जानते कि आखिरकार ऐसा क्या घटा जिसके कारण लघु पत्रिकाएं अभी भी निकल रही हैं।
      आर्थिक दृष्टि से लघु पत्रिका निकालना घाटे का सौदा साबित हुआ है। लघु पत्रिका प्रकाशन अभी भी निजी प्रकाशन है। इस अर्थ में लघु पत्रिका प्रकाशन को निजी क्षेत्र की गैर-कारपोरेट उपलब्धि कहा जा सकता है। संभवत: निजी क्षेत्र में इतनी सफलता अन्य किसी रचनात्मक प्रयास को नहीं मिली। लघु पत्रिकाओं क प्रकाशन को वस्तुत: गैर-व्यावसायिक पेशेवर प्रकाशन कहना ज्यादा सही होगा। समाज में अभी भी अनेक लोग हैं जो लघुपत्रिका को व्यवसाय के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे लघुपत्रिका आंदोलन कहना पसंद करते हैं। वे क्यों इसे लघुपत्रिका आंदोलन कहते हैं ,यह बात किसी भी तर्क से प्रकाशन की मीडिया कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
   लघु पत्रिका प्रकाशन की अपनी दुनिया वहीं है जो प्रकाशन की दुनिया है। फ़र्क इसके चरित्र और भूमिका को लेकर है। आप जितना बेहतर और वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रिंट टैकनोलॉजी के इतिहास से वाकिफ होंगे। उतने ही बेहतर ढ़ंग से लघुपत्रिका प्रकाशन को समझ सकते हैं। लघु पत्रिकाओं की आवश्यकता हमारे यहां आज भी है, कल भी थी, भविष्य में भी होगी। लघुपत्रिका का सबसे बड़ा गुण है कि इसने संपादक और लेखक की अस्मिता को सुरक्षित रखा है। हमें जानना चाहिए कि कैसे संपादक की सत्ता और लेखक की पहचान का प्रतिष्ठानी प्रेस अथवा व्यावसायिक प्रेस में लोप हो गया ?
    आज प्रतिष्ठानी प्रेस में संपादक है ,लेखक हैं ,किंतु उनकी कलम और बुद्धि पर नियंत्रण किसी और का है,विज्ञापन कंपनियों का है। संपादक लेखक,स्तंभकार और संवाददाता  की सत्ता को विज्ञापन एजेंसियों ने रूपान्तरित कर दिया है। आज विज्ञापन एजेंसियां तय करती हैं कि किस तरह की खबरें होंगी, किस साइज में खबरें होंगी, किन विषयों पर संपादकीय सामग्री होगी ? किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस समूची प्रक्रिया के व्यवसायिक समाचारपत्र और पत्रिका जगत पर क्या असर हुए हैं, इसके बारे में हमने कभी गंभीरता के साथ विचार नहीं किया। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि जब पहलीबार समाचारपत्र आया तो उसने क्या किया और जब समाचारपत्र में विज्ञापन दाखिल हो गया तो क्या बदलाव आने शुरू हुए, लघु पत्रिका प्रकाशन भी इस प्रक्रिया से प्रभावित हुआ है। इन सबको लेकर हमारे पास कुछ अनुभव हैं, कुछ संस्मरण हैं। कुछ किंदन्तियां हैं। किंतु भारत के कम्युनिकेशन तकनीक के इतिहास और उसके परिणामों की कभी गंभीरता से पड़ताल नहीं की। लंबे समय तक हम साहित्य के एक हिस्से के तौर पर लघपत्रिकाओं अथवा साहित्यिक पत्रिकाओं को देखते रहे, उनमें प्रकाशित सामग्री का हमने मीडिया सैध्दान्तिकी अथवा आलोचना के नजरिए से कभी मूल्यांकन ही नहीं किया। यहां तक कि एक स्वतंत्र मीडिया रूप के तौर पर पत्रिकाओं की सत्ता को हमने कभी स्वीकार नहीं किया।
  आज जब हम बातें कर रहे हैं तो स्थिति में कोई मूलगामी किस्म का परिवर्तन नहीं आया है। सिर्फ एक परिवर्तन आया है हमने पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास को साहित्य के इतिहास से अलग करके स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता के इतिहास के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया है। पत्र-पत्रिकाओं को स्वतंत्र रूप से पढ़ाने से मामला हल नहीं हो जाता, बल्कि और भी पेचीदा हो उठा है।
    समाचारपत्र का इतिहास हो या लघुपत्रिका का इतिहा हो, इसकी सही समझ तब ही बनेगी जब हम कम्युनिकेशन तकनीक के इतिहास से वाकिफ होंगे। हमारी मुश्किल अभी यहीं पर बनी हुई है, हमें साहित्य से प्रेम है, पत्रिकाओं से प्रेम है, किंतु तकनीक से प्रेम नहीं है। अगर हमारा तकनीक से प्रेम होता तो हम उसके इतिहास को जानने की कोशिश करते।
    हिन्दी में संपादक - लेखकों का एक तबका तैयार हुआ है जो धंधेखोरों की तरह लघुपत्रिका आंदोलन के नाम पर टटुपूंजिया दुकानदारी कर रहा है। इसके बावजूद ये स्वनाम-धन्य विद्वान यह मानकर चल रहे हैं कि लघुपत्रिकाओं के सबसे बड़े हितचिन्तक वे हैं। जबकि सच यह है कि ऐसे संपादकों की बाजार में कोई साख नहीं है। वे अपनी किताबों की बिक्री तक नहीं कर पाते। अपनी पत्रिका को बेच तक नहीं पाते। हमें यह देखना होगा कि लघुपत्रिकाएं क्या साहित्यिक अभिरूचि पैदा करने का काम कर रही हैं अथवा कुछ और काम कर रही हैं ? क्या हमारी लघु पत्रिकाओं ने कभी इस तथ्य पर गौर किया कि कैसे विगत तीस सालों में भारत के पत्रिका प्रकाशन में विस्फोट हुआ है।
   आज पत्रिका प्रकाशन सबसे प्रभावी व्यवसाय है। एक जमाना था जब सारिका,दिनमान, धर्मयुग आदि को विभिन्न बहाने बनाकर बंद किया गया था, किंतु आज स्थिति यह है कि पत्रिका प्रकाशन अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है। आज बाजार में सभी भाषाओं में पत्रिकाओं की बाढ़ आई हुई है। बड़े पैमाने पर पत्रिकाएं बिक रही हैं। अपना बाजार बना रही हैं। लघुपत्रिका का प्रकाशन अभी कम मात्रा में होता है। हंस,पहल,उद्भावना,आलोचना जैसी पत्रिकाएं पांच-सात हजार का आंकड़ा पार नहीं कर पायी हैं। जबकि छोटे से कस्बे से निकलने वाली धार्मिक पत्रिका लाखों की तादाद में बिक रही हैं। हमें बेचने की कला को धार्मिक पत्रिकाओं से सीखना चाहिए। बड़े प्रतिष्ठानी प्रेस ने धार्मिक पत्रिकाओं से यह गुण सीखा है और आज बाजार में हर विषय की एकाधिक पत्रिकाएं मिल जाएंगी ,जिनकी साधारण तौर पर इनकी बिक्री हमारी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से कई गुना ज्यादा है। धार्मिक पत्रिकाओं से सीखने की बात मैं इसलिए कर रहा हूँ कि आप पत्रिका निकालना यदि चाहते हैं तो दूसरों से सीख लें।
   लघुपत्रिका की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अपने पाठक की अभिरूचियों को नहीं जानती, अपने पाठक को नहीं जानती, वह सिर्फ साहित्य ,विचारधारा और साहित्यकार को जानती है, उसमे भी वह संकुचित भाव से चयन करती है। यह तो कुल मिलाकर कंगाली में आटा गीला वाली कहावत चरितार्थ हो गयी।
    हमारी लघु पत्रिकाओं का समूचा नजरिया विधा केन्द्रित सामग्री प्रस्तुति पर ही केन्द्रित रहा है। हमने विधा केन्द्रित पैमाना 19वीं  शताब्दी में चुना था, वह पैमाना आज भी बरकरार है, उसमें परिवर्तन की रूरत हमने महसूस नहीं की। हम यह भूल ही गए कि पाठक की भी अभिरूचियां होती हैं। पाठक का भी नजरिया होता है, हम संपादक की रूचि जानते हैं, लेखक का नजरिया जानते हैं किंतु लघु पत्रिकाओं को पढ़कर आप पाठक को नहीं जान सकते। हमें इस सवाल पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि क्या गैर-पेशेवर ढ़ंग से लघु पत्रिका प्रकाशन संभव है ? क्या उसका कोई भविष्य है।
   हमें पाठक की अभिरूचि और साहित्य की स्वायत्तता को केन्द्र में रखकर लघुपत्रिका प्रकाशन करना चाहिए। साथ ही इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए कि साहित्य की परिभाषा बदल गयी है ? आज साहित्य की वही परिभाषा नहीं रह गई है जो आज से पचास या पच्चीस साल पहले थी। लघु पत्रिका का संसार साहित्य के बदले हुए स्वरूप को परिभाषित किए बिना आगे चला जा रहा है। इस संदर्भ में आलोचना पत्रिका के पुनर्प्रकाशन को प्रस्थान बिंदु के रूप में विश्लेषित करने की जरूरत है। आलोचना पत्रिका का जब पुनर्प्रकाशित हुई तो उसका पहला अंक फासीवाद पर आया। सवाल किया जाना चाहिए कि इस अंक से पहले भी अनेक राजनीतिफिनोमिना आए किंतु उन पर कभी आलोचना पत्रिका के संपाक का ध्यान नहीं गया। मेरा इशारा आपात्काल की तरफ है, आलोचना पत्रिका के द्वारा आपात्काल के बारे में एकदम चुप्पी और साम्प्रदायिकता पर  विशेष अंक इसका क्या अर्थ है ? इस प्रसंग को इसलिए सामने पेश कर रह हूँ कि आप यह जान लें कि विगत पच्चीस वर्षों लघु पत्रिकाएं आम तौर पर उन विषयों पर सामग्री देती रही हैं जो सत्ता प्रतिष्ठानों ने हमारे लिए तैयार किए हैं।
    लघुपत्रिका का विमर्श सत्ता विमर्श नहीं है। लघुपत्रिकाएं  पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं। ये पत्रिकाएं मौलिक सृजन का मंच हैं। साम्प्रदायिकता का सवाल हो या धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो अथवा ग्लोबलाईजेशन का प्रश्न हो हमारी पत्रिकाएं सत्ता विमर्श को ही परोसती रही हैं। सत्ता विमर्श कैसे परोसा जाता है इसका आदर्श नमूना है लघु पत्रिकाओं में चलताऊ ढ़ंग से सामयिक प्रश्नों पर छपने वाली टिप्पणियां। लघु पत्रिका का चरित्र सत्ता के चरित्र से भिन्न होता है, यह बात सबसे पहले भारतेन्दु ने समझी किंतु हमारे नए संपादकगण अभी तक नहीं समझ पाए हैं। लघुपत्रिका की हमारी अवधारणा में भी गंभीर समस्याएं हैं। लघु पत्रिकाओं में कारपोरेट जगत की पत्रिकाओं की समस्त बीमारियां घर कर गयी हैं। जिस तरह कारपोरेट घरानों की पत्रिकाओं में पक्षपात होता है,खासकर रचना के चयन को लेकर, लेखक के चयन को लेकर, जिस तरह कारपोरेट पत्रिकाओं के लिए विज्ञापनदाता महत्वपूर्ण और निर्णायक होता है। उसके आधार पर पक्षपात होता है ,ठीक वैसे ही लघु पत्रिकाओं में भी पक्षपात का गुण विचारधारा विशेष के प्रति आग्रह के रुप में कैंसर की तरह घर कर चुका है।
     लघुपत्रिकाओं को दो कमजोरियों से मुक्त करने की जरूरत है , पहला है 'विचारधारात्मक पक्षपात', दूसरा है ' निर्भरता'। ये दोनों ही तत्व लघुपत्रिकाओं के स्वाभाविक विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं।  दूसरी प्रधान समस्या है जो लघुपत्रिका की धारणा से जुड़ी है। अभी हम जिस लघुपत्रिका को निकाल रहे हैं उसके केन्द्र में संस्कृति है। संस्कृति को ही संदर्भ बनाकर हम साहित्य का चयन करते हैं। जबकि सारी दुनिया में संस्कृति के संदर्भ के आधार पर चयन नहीं हो रह, बल्कि अभिरूचि और जीवनशैली के आधार पर सामग्री चयन हो रहा है।
    यदि लघुपत्रिकाएं साहित्य,राजनीति, अर्थनीति, विज्ञान आदि पर केन्द्रित सामग्री प्रकाशित करती हैं तो उन्हें इस संदर्भ में पेशेवर र विशेषज्ञता को ख्याल में रखना चाहिए। हिन्दी के लेखकों का आलम यह है कि वे सभी विषयों के ऊपर लिख सकते हैं और वेकिसी भी क्षेत्र की विशेष जानकारी हासिल नहीं कना चाहते। मौलिक लेखन के नाम पर प्रतिष्ठित लघुपत्रिकाओं में जिस तरह की घटिया और स्तरहीन सामग्री प्रकाशित होती है इसने पाठकों को लघुपत्रिकाओं से दूर किया है। आज स्थिति यह है कि विशेषज्ञान के बिना काम चलने वाला नहीं है। विशेषज्ञता हासिल किए बिना आप स्वीकृति नहीं पा सकते।
   आखिरी समस्या सबसे गंभीर समस्या है जिस  पर गौर किया जाना चाहिए। आज हम डिजिटल के युग में आ गए हैं। हमें पत्रिका को डिजिटल रूप में प्रकाशित करना चाहिए, सीडी और वेबसाइट पत्रिका के रूप में प्रकाशित करना चाहिए।  डिजिटल प्रकाशन पत्रिका प्रकाशन से सस्ता और व्यापक है। इसकी पहुँच दूर-दूर तक है। आप चाहें तो अपनी वेब पत्रिका के लिए सस्ते विज्ञापन भी ले सकते हैं। हमें यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि मौजूदा दौर लाइब्रेरी का नहीं है, डिजिटल लाइब्रेरी का है।