हिन्दी आलोचना की नजर में रामचरित मानस एक ऐतिहासिक पाठ है,ऐतिहासिक पाठ के रूप में ही उसे देखने और व्याख्यायित करने की परंपरा है।मजेदार बात यह है कि 'रामचरित मानस' को जो आलोचक ऐतिहासिक पाठ मानते हैं,वे पाठालोचन के सिध्दान्तों का पालन नहीं करते,यह स्थिति कमोबेश सबके यहां है। हम यह भी कह सकते हैं हिन्दी की आलोचना को उत्पादन के प्रति जितना आकर्षण है,उतनी आलोचना निर्माण,आलोचना पध्दति के निर्माण में उतनी दिलचस्पी नहीं है।यही वजह है कि हिन्दी में पाठालोचन का अकादमिक जगत में एक भी स्कूल निर्मित नहीं हो पाया। बल्कि इसके विपरीत अकादमिक आलोचना के प्रति खास तरीके से घृणा पैदा की गयी।जिससे आलोचना अपनी कमियों से ध्यान हटा सके।हिन्दी में अकादमिक आलोचना को सम्मान की बजाय घृणा की नजर से देखा गया। दूसरी ओर अकादमिक जगत ने भी इस स्थिति को दुरूस्त करने के लिए कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया। आलोचना के कठमुल्लेपन का ही यह परिणाम निकला कि जब नामवर सिंह ने 'दूसरी परंपरा' की बात कही तो रामविलासजी भड़क पड़े। यदि कोई व्यक्ति परंपरागत रामचन्द्र शुक्ल-रामविलास शर्मा पंथी आलोचना से इतर नयी साहित्य सैध्दान्तिकी के सहारे किसी कृति को पढ़ना चाहता है तो उसे त्याज्य घोषित कर दिया जाता है।आलोचना की इस मनोदशा में व्याख्या और पुनर्व्याख्या की दृष्टि से भिन्न खास किस्म का सामंतीभाव है जिसमें अन्य किस्म के नजरिए के लिए कोई जगह नहीं है।हिन्दी में प्रगतिशील आलोचना में एक स्कूल ऐसे विचारकों का रहा है जिनके प्रतिनिधि रांगेय राघव हैं तो दूसरा ग्रुप रामविलास शर्मा का है,हिन्दी में रांगेय राघव की मूल्यांकन दृष्टि में तुलसी को गरियाने का भाव था,तुलसी को खारिज करने का भाव था,उपहास का भाव था,इसी के प्रत्युत्तर में रामविलास शर्मा ने अपने तुलसी संबंधी नजरिए का विकास किया और 'साहित्य समाज का दर्पण है' और 'साहित्य प्रतिबध्द' होता है ,इन दो धारणाओं के आधार पर तुलसी संबंधी अपने मूल्यांकन की आधारशिला रखी, इस क्रम में हिन्दी में मानस के बारे में प्रचलित अध्यात्मवादी मूल्यांकन और संकीर्णतावादी दृष्टियों का जमकर विरोध किया और तुलसी को लोकवादी और जन-जन के पक्षधर कवि के रूप में प्रतिष्ठित किया।इस क्रम रामविलास शर्मा ने प्रगतिशील लेखक संघ के 1936 और 1938 के घोषणापत्रों में व्यक्त मध्यकालीन साहित्य संबंधी दृष्टिकोण्ा का भी खण्डन किया है। निश्चित रूप से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना के पैराडाइम को बदलने में रामविलास शर्मा का महत्वपूर्ण अवदान है।वहीं दूसरी ओर नामवर सिंह ने 'दूसरी परंपरा की खोज' में कबीर को प्रतिष्ठित करने के बहाने आलोचना के परंपरागत रूझान को परंपरा से ही काटने की कोशिश की,नामवर सिंह इस अर्थ में भिन्ना हैं कि उन्होंने आलोचना में लकीर के फकीर बने रहने से इंकार किया।यह मूलत: भिन्नाता का मार्ग है।परंपराओं के मूल्यांकन की एकाधिक पध्दतियों को स्वीकार करने का दुस्साहस है,किंतु इसकी भी सीमाएं हैं,इसकी सबसे बड़ी सीमा है द्विवेदीजी के प्रति अनालोचनात्मक भाव। रामविलास शर्मा के यहां परंपरा एक ही है,नामवर सिंह साहस करके 'दूसरी परंपरा' तक पहुँचते हैं,किंतु इसमें उन्हें अपने गुरू हजारीप्रसाद द्विवेदी से भिन्ना परंपरा दिखाई नहीं देती,वरन यह कैसे हो सकता है कि परंपरा का सारा विवाद शुक्ल -द्विवेदी जी के इर्द-गिर्द ही परिक्रमा कर रहा है।दोनों आलोचकों में कई बुनियादी साम्य हैं,पहला साम्य यह है कि दोनों मिथकीय आधार पर दो काव्य धाराएं मानते हैं,रामभक्ति और कृष्णभक्तिधारा। निर्गुण और सगुण्ा और राम और कृष्णभक्ति काव्य परंपरा के नाम पर स्त्री-दलित विरोधी पैराडाइम तैयार किया गया,इस पैराडाइम की धुरी है पितृसत्ताात्मक विचारधारा।इस पैराडाइम को समग्रता में उद्धाटित करने की जरूरत है। हिन्दी की पहली और दूसरी परंपरा को तरह-तरह से खाद -पानी देने का काम हिन्दी आलोचना करती रही है।कायदे से हिन्दी में साहित्य,दलित साहित्य और स्त्री साहित्य ये तीन परंपराएं मिलती हैं।इनका स्वतंत्र आधार है साथ ही इनमें संपर्क भी है।रामविलास शर्मा-नामवर सिंह की आलोचना में दूसरा साम्य यह है कि दोनों स्त्री और दलित काव्य परंपरा को अस्वीकार करते हैं, तीसरा साम्य यह है दोनों ने विचारधारा के रूप में पितृसत्ताा की उपेक्षा की है।मजेदार बात यह है एक को तुलसी पसंद है तो दूसरे को कबीर, दोनों ने मीराबाई को केन्द्र में नहीं रखा, कबीर को महान् बनाने के नाम पर कबीर को दलित परंपरा के बाहर ले जाकर हजम करने का प्रयास किया गया,कबीर को साहित्य के पैराडाइम पर रखकर परखा गया,जबकि कबीर को दलित साहित्य के पैराडाइम पर रखकर देखा जाना चाहिए। सवाल यह है कि क्या साहित्य की आलोचना का धर्मनिरपेक्ष आधार स्त्री,दलित और पितृसत्ता के बिना तैयार होता है ?जी नहीं,धर्मनिरपेक्ष आलोचना परंपरा के निर्माण के लिए स्त्री,दलित और पितृसत्ता की उपेक्षा संभव नहीं है। इन तीनों से रहित आलोचना को धर्मनिरपेक्ष आलोचना नहीं कहा जा सकता है।
मंगलवार, 13 अप्रैल 2010
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
तुलसी की दृष्टि में सबसे बड़ा धर्म है दीनों की सेवा,सबसे बड़ा पाप है उनका उत्पीड़न
रामचरित मानस लोक-महाकाव्य है। इसके उपयोग और दुरूपयोग की अनंत संभावनाए हैं।लोक-महाकाव्य एकायामी नहीं बल्कि बहुआयामी होता है,इसमें एक नहीं एकाधिक विचारधाराएं होती हैं। इसका पाठ संपूर्ण और बंद होता है किंतु अर्थ- संरचनाएं खुली होती हैं, इसके पाठ की स्वायत्तता पाठ की व्याख्या की समस्त धारणाओं के लिए आज भी चुनौती बनी हुई है। लोक-महाकाव्य का अर्थ कृति में नहीं सामाजिक के मन में होता है।पाठक के इच्छित-भाव की तुष्टि का यह सबसे बड़ा स्रोत है,इतिहास की रचना में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है।साथ ही इच्छित इतिहास के निर्माण के लिए इसका व्यापक स्तर पर उपयोग और दुरूपयोग होता रहा है।
हिन्दी में आलोचना खूब लिखी जाती है,किंतु ज्यादातर आलोचना 'कला के लिए कला' की तरह 'आलोचना के लिए आलोचना ' की तर्ज पर लिखी जाती है,हिन्दी में आलोचना की पद्धति और सैध्दान्तिकी का शास्त्र हम आज तक नहीं बना पाए हैं। हमारे पास अभी तक एक भी आलोचना की मुकम्मल किताब नहीं है,आलोचना के बारे में सम्मानजनक ढ़ंग से कहने के लिए कुछ निबंध हैं,कुछ समीक्षाएं हैं,कुछ बहस के लिए लिखी गयी वकीलों जैसी दलीलें हैं,जिनमें हमारे आलोचकगण अपने मुवक्किल की पैरवी करते नजर आते हैं। मसलन् हमारे यहां तुलसीदास के बारे में टनों पन्नो लिखे गए हैं, इसके बावजूद लेवीस्त्रास जैसी एक आलोचना की किताब नहीं है।जिसमें तुलसी के मिथकों का खुलासा किया गया हो और सैध्दान्तिकी भी बनायी गयी हो।
हमारे यहां आलोचना अभी 'केजुअल' कर्म है,मनमाना कार्य है। हिन्दी के आलोचक जब किसी विषय पर लिखते हैं तो 'केजुअल वर्कर' की तरह पेश आते हैं, उन्हें सिलटाने में दिलचस्पी ज्यादा है।वे अभी तक आलोचना को नियमित सैध्दान्तिकी के दर्जे तक नहीं पहुँचा सके हैं। उसका शास्त्र नहीं बना पाए हैं।यही वजह है कि हिन्दी में आलोचना लिखने के लिए अंग्रेजी में लिखी आलोचना के पास जाना होता है, हिन्दी का आलोचना साहित्य हमें किसी भी किस्म की आलोचनात्मक मदद या सलाह नहीं देता।हमें इस समस्या पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्यों हुआ कि हमारी आलोचना अभी तक गंभीर नहीं हो पायी।
अंग्रेजी,जर्मन,फ्रेंच,रूसी आदि भाषाओं में आलोचना के महत्वपूर्ण स्कूल मिल जाएंगे,सैध्दान्तिक मॉडल मिल जाएंगे,शोध में सहारे के लिए अच्छे सैध्दान्तिक उध्दरण मिल जाएंगे,किंतु हिन्दी में इन सबका अकाल पड़ा हुआ है। आखिरकार आलोचना के क्षेत्र में हमसे कहां चूक हुई है ?इतनी बड़ी चूक को व्यक्तिगत मामला कहकर टाला नहीं जा सकता।इस दुर्दशा के लिए निश्चित रूप से आलोचकगण जिम्मेदार हैं,किंतु मामले का आलोचक एक छोटा सा हिस्सा है। आलोचना के लिए जिस तरह के संस्थान,अनुसंधान संरचना,माहौल,विवेक, और पध्दति की जरूरत होती है, अकादमिक अनुशासन ,इन्फ्रास्ट्रक्चर ,और शोधार्थी तैयार करने की जरूरत होती है,शोध को गंभीर बनाने और उसका सम्मान करने की जरूरत होती है,उसकी ओर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। जबकि हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होता है,सबसे ज्यादा पीएचडी लिखी जाती हैं,साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी में सबसे ज्यादा शिक्षक हैं,किंतु एक भी ऐसा अनुसंधान केन्द्र नहीं है जहां शोध की पध्दति और उसका शास्त्र सिखाया जाता हो ,और गंभीरता से अनुसंधान कार्य किया जाता हो।
हिन्दी में आलोचना का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की पहली शर्त है कि आलोचना और हिन्दी विभागों को गंभीरता से चेले बनाने,पट्ठे बनाने,पालने,उनकी नियुक्ति कराने के धंधे से मुक्त किया जाए,हिन्दी के विभागों में अकादमिक क्षमता और उसके आधार पर शोध के नए क्षेत्रों को खोला जाए,गंभीरता के साथ शोध की पध्दति और सैध्दान्तिकी के निर्माण की दिशा में प्रयास किए जाएं।
रामकथा के ऊपर विचार करते हुए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रश्न उठाया है कि 'राम का चरित्र ऊँचा है कि नीचा,लक्ष्मण का चरित्र हमें अच्छा लगता है कि बुरा,यह आलोचना काफी नहीं है।मौन होकर श्रध्दा के साथ विचा करना होगा कि समस्त भारतवर्ष में हजारों साल से इन्हें किस प्रकार ग्रहण किया है।' यानी रामकथा को किस प्रकार ग्रहण किया है।टैगोर ने लिखा है ' राम का चरित्र मनुष्य का चरित्र होने के नाते ही महिमा से मंडित है।' ... 'रामायण उसी नर चन्द्रमा की कथा है देवता की कथा नहीं।' रामायण में 'देवता ने अपने को छोटा करके मनुष्य को छोटा नहीं बनाया,मनुष्य ही अपने गुण से देवता हो उठा है।'
रामकथा के ऊपर विचार करते हुए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रश्न उठाया है कि 'राम का चरित्र ऊँचा है कि नीचा,लक्ष्मण का चरित्र हमें अच्छा लगता है कि बुरा,यह आलोचना काफी नहीं है।मौन होकर श्रध्दा के साथ विचा करना होगा कि समस्त भारतवर्ष में हजारों साल से इन्हें किस प्रकार ग्रहण किया है।' यानी रामकथा को किस प्रकार ग्रहण किया है।टैगोर ने लिखा है ' राम का चरित्र मनुष्य का चरित्र होने के नाते ही महिमा से मंडित है।' ... 'रामायण उसी नर चन्द्रमा की कथा है देवता की कथा नहीं।' रामायण में 'देवता ने अपने को छोटा करके मनुष्य को छोटा नहीं बनाया,मनुष्य ही अपने गुण से देवता हो उठा है।'
इसी क्रम में रामकथा के एक नए आयाम को उद्धाटित करते हुए टैगोर ने लिखा 'रामायण की प्रधान विशेषता है कि उसने घर की बात को ही बड़ा करके दिखाया है।इसमें केवल कवि का परिचय ही नहीं ,भारतवर्ष का परिचय मिलता है।इससे समझ में आएगा कि गृह और गृहधर्म को भारतवर्ष कितना महत्व देता है।हमारे देश में गृहस्थ-आश्रम का जो इतना ऊँचा स्थान था,इस काव्य में उसी को प्रमाणित किया गया है।गृहस्थाश्रम हमारे सामने सुख के लिए सुविधा के लिए न था। गृहस्थाश्रम पूरे समाज को समेटकर रखता था और मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाता था।गृहस्थाश्रम भारतवर्षीय आर्य समाज की भित्तिा है।'
इसी तरह मुक्तिबोध ने लिखा है, ' तत्कालीन मानव संबंध,विश्व-दृष्टि तथा जीवन-मूल्यों के सर्वोच्च प्रतीक राम की मानवता हमें प्रभावित करती है।'भक्ति- आंदोलन की तरह ही रामचरित मानस की केन्द्रीय अभिव्यक्ति प्रेम और ज्ञान केन्द्रित है। इन दोनों ही तत्वों का सामंतवाद से सीधा अन्तर्विरोध है।ज्ञान और प्रेम का संदेश आधुनिक बोध पैदा करता है।तुलसीदास को रामचरित मानस लिखने की प्रेरणा धर्मग्रंथों या देवोपासना से नहीं मिली थी,बल्कि दरिद्रता,भूख और सामाजिक उत्पीडन देखकर प्रेरणा मिली थी। आत्म सम्मान के साथ जीना और मनुष्य के आगे हाथ नहीं पसारना तुलसी की चिंताधारा का मुख्यबिंदु है।रामविलास शर्मा के अनुसार तुलसी की दृष्टि में सबसे बड़ा धर्म है दीनों की सेवा,सबसे बड़ा पाप है उनका उत्पीड़न।वे दुखानुभूति का साधारणीकरण करते हैं।
जिस समय हिन्दीभाषी क्षेत्र में आर्यसमाज के नेतृत्व में समाज-सुधार की लहर चल रही थी,उस समय स्वामी दयानंद सरस्वती की धूम मची हुई थी,सनातनियों के तर्कों का खण्डन करने के लिए उन्होंने उस समय एक किताब प्रकाशित की जिसका नाम था ''सत्यार्थप्रकाश'', इस किताब के अंत में स्वामीजी ने अस्पृश्य किताबों की एक सूची जारी की थी,इसमें तुलसीदास की कृति ''रामचरित मानस'' का पहला नम्बर था,यानी आर्यसमाज के नेता ''रामचरित मानस'' को समाज -सुधार में सबसे बड़ी बाधा मानते थे, वहीं दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को अपनी इतिहास दृष्टि के लिए सबसे बड़े कवि के रूप में तुलसीदास और कृति के रूप में ''रामचरित मानस'' महत्वपूर्ण लगा।प्रगतिशीलों में रामविलास शर्मा को तुलसी सबसे प्रिय हैं,जबकि रांगेय राघव के लिए सबसे अप्रिय लेखक हैं।मुक्तिबोध को तुलसी का रामचरित मानस सवर्णों के वर्चस्व का औजार लगा और भक्ति-आन्दोलन की निम्नवर्णोंन्मुख धारा को पलटने वाली कृति।उन्होंने तुलसी को सवर्णों के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में व्याख्यायित किया ।
जिस समय हिन्दीभाषी क्षेत्र में आर्यसमाज के नेतृत्व में समाज-सुधार की लहर चल रही थी,उस समय स्वामी दयानंद सरस्वती की धूम मची हुई थी,सनातनियों के तर्कों का खण्डन करने के लिए उन्होंने उस समय एक किताब प्रकाशित की जिसका नाम था ''सत्यार्थप्रकाश'', इस किताब के अंत में स्वामीजी ने अस्पृश्य किताबों की एक सूची जारी की थी,इसमें तुलसीदास की कृति ''रामचरित मानस'' का पहला नम्बर था,यानी आर्यसमाज के नेता ''रामचरित मानस'' को समाज -सुधार में सबसे बड़ी बाधा मानते थे, वहीं दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को अपनी इतिहास दृष्टि के लिए सबसे बड़े कवि के रूप में तुलसीदास और कृति के रूप में ''रामचरित मानस'' महत्वपूर्ण लगा।प्रगतिशीलों में रामविलास शर्मा को तुलसी सबसे प्रिय हैं,जबकि रांगेय राघव के लिए सबसे अप्रिय लेखक हैं।मुक्तिबोध को तुलसी का रामचरित मानस सवर्णों के वर्चस्व का औजार लगा और भक्ति-आन्दोलन की निम्नवर्णोंन्मुख धारा को पलटने वाली कृति।उन्होंने तुलसी को सवर्णों के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में व्याख्यायित किया ।
रविवार, 11 अप्रैल 2010
जनतंत्र में मार्क्सवाद और उत्तर-मार्क्सवाद
(कार्ल मार्क्स)
आलोचना में जनतंत्र का अर्थ है खोज अथवा अनुपलब्ध अथवा अदृश्य सत्य को पाना। एकाधिक अर्थ की खोज करना। सत्य एक नहीं अनेक है, इस तत्व को रेखांकित करना। जनतंत्र को आलोचना में पाने का अर्थ है मार्क्सवाद या किसी भी विचारधारा विशेष के परे जाकर सोचना और देखना। इसका अर्थ यह नहीं है कि मार्क्सवाद के आधार पर हम जनतंत्र के बारे में सोच नहीं सकते,बल्कि सच यह है कि मार्क्सवाद में जनतंत्र का सैद्धान्तिक विमर्श तैयार ही नहीं हुआ। स्वयं मार्क्स-एंगेल्स ने भी कभी जनतंत्र के बारे में विस्तार से सोचा नहीं था, मानवाधिकारों के बारे में सोचा नहीं था।
सारी दुनिया में मार्क्सवाद ने आलोचना में जनतंत्र का विकास इतिहास और परंपरा के साथ संवाद करते हुए किया है। मार्क्सवादी आलोचकों ने परंपरा से संवाद करते हुए कठमुल्ला अथवा प्राचीनतापंथी आलोचना की इस धारणा को चुनौती दी है कि परंपराएं 'टाइमलेस' होती हैं।
इधर तीस सालों से समाजवाद के खिलाफ वैचारिक अंधड़ चल रहा है,इसके कारण मार्क्सवादी आलोचना के प्रति संशय का भाव और अप्रासंगिकता की बातें तेज हो गई हैं। इस संदर्भ में सबसे प्रमुख तर्क क्या हैं ? मार्क्सवादी मानते रहे हैं समाजवाद इतिहास का एकीकरण है।
यह विचार अनेक लोगों को भयभीत करता रहा है।भयभीत लोगों के लिए सर्वसत्ताकरण (टोटलाइजेशन) और सर्वसत्तावाद (टोटेलिटेरिनिज्म) किसी चीज के लिए प्रयुक्त एक ही जैसे शब्द हैं,वे मार्क्सवाद को सर्वसत्तावादी कहकर कलंकित करते रहे हैं,जबकि सच यह है मार्क्सवाद सबको एकजुट करके रखने वाली और पूंजी संचय के रूपों को विकेन्द्रित करने वाली शक्ति है। आलोचना में मार्क्र्सवाद की बहस को हमें सिर्फ मार्क्सवाद तक सीमित नहीं रखना चाहिए,बल्कि उत्तर-मार्क्सवाद तक ले जाना चाहिए। उत्तर-मार्क्सवाद का अर्थ मार्क्सवाद का अस्वीकार नहीं है,बल्कि उत्तर-मार्क्सवाद तो मार्क्सवाद की समझ का नए परिदृश्य में सर्जनात्मक विकास है।
उत्तर- मार्क्सवाद का दूसरा आयाम यह है कि मार्क्सवाद के एकाधिक रूपों की स्वीकृति। जिस तरह लोकतंत्र बहुलतावादी है उसी तरह मार्क्सवाद भी एक नहीं है बल्कि सारी दुनिया में बहुलतावादी मार्क्सवाद है। इसमें विकास की ज्यादा संभावनाएं हैं। मार्क्सवाद में बहुलतावाद का आना मार्क्सवाद के लोचदार होने का प्रमाण है इसे मार्क्सवाद से विचलन न समझा जाए। मार्क्सवाद एक नहीं अनेक है। जिस तरह यथार्थ एक नहीं अनेक है।
लोकतंत्र के विकास ने एकायामिता के सभी रूपों को चौतरफा बदलने के लिए मजबूर किया। बहुलतावाद हमारी मार्क्सवाद संबंधी संकुचित धारणाओं से मुक्ति दिलाने में मदद करता है।जब आप मार्क्सवाद की निर्धारित परंपरा के प्रति सवाल खड़े करते हैं तो उत्तर-मार्क्सवाद की कोटि में स्वत: ही पहुँच जाते हैं। मसलन् इस परंपरा में 'ग्रीन मूवमेंट' के लोग आते हैं,ये वे लोग हैं जो मार्क्सवाद की 'प्रकृति के स्वामित्व' की को चुनौती देते हैं,इस परंपरा के निर्माताओं में रूडोल्फ बारो,आन्द्रे गुर्ज,क़ोहेन-बेनडिट आदि आते हैं। इन लोगों ने साठ के दशक से आंदोलन चलाया और लाल को हरा बनाया।
यही बात ब्रिटिश सांस्कृतिक स्टैडीज के लोगों के बारे में कही जा सकती है,इन्होंने परंपरागत मार्क्सवाद से आगे जाकर राज्य की अधिरचनाओं और उप-संस्कृतियों का अध्ययन किया,यही बात स्त्रीवादी और उत्तर-संरचनावादी सैद्धान्तिकी के बारे में कही जा सकती है। इन दोनों सैद्धान्तिकियों के जरिए मार्क्सवाद के अंदर निहित पूर्वाग्रहों खासकर पितृसत्ता और यूरो-केन्द्रिकता का विरोध किया गया। उत्तर -संरचनावाद के तहत अनेक किस्म का मार्क्सवादी लेखन सामने आया है, जिसके कारण आलोचना का जनतंत्र समृध्द हुआ है।
आलोचना में लोकतंत्र 'जानने' की प्रक्रिया में समृद्ध होता है,'जानने' के क्रम में ही मार्क्सवाद के बारे में भी सवाल उठाए गए और मार्क्सवाद को चुनौती दी गयी।यहां तक कि 'सैद्धान्तिकी' के प्रति भी सवाल उठे हैं। यह काम संरचनावाद और उत्तर-संरचनावाद ने किया। 'जानने' की धारणा के आधार पर ही उत्तर-संरचनावादियों ने 'इम्पीरिसिज्म' को चुनौती दी, इसके जरिए विज्ञान ,वस्तुगतता तटस्थता और साम्राज्यवादी शक्ति के अन्तस्संबंध की खोज की गई।
मार्क्सवादी विचारकों का मानना था दुनिया बदल सकती है किंतु मार्क्सवाद नहीं बदलेगा। यह मार्क्सवाद के प्रति गैर मार्क्सवादी नजरिया है। स्वयं मार्क्स का मानना था दुनिया में सब कुछ परिवर्तनीय है यदि कोई चीज अपरिवर्तनीय है तो वह है परिवर्तन का नियम। मार्क्सवाद में से परिवर्तन के नियम को निकालकर हमने मार्क्सवाद को अचल बना दिया,अपरिवर्तनीय बना दिया। मार्क्सवाद पर पिछले पचास सालों में जो हमले हुए हैं उनमें यह भी कहा गया मार्क्सवाद रिडक्शनिज्म है,फंक्शनलिज्म है,एशेंसियलिज्म है, यूनीवर्सलिज्म है। ये सारे वर्गीकरण सही नहीं हैं। मार्क्सवाद विज्ञान है और जीवन को बदलने का विज्ञान है।
यह कहना भी सही नहीं है कि मार्क्सवादी नजरिया सिर्फ मजदूर वर्ग या सिर्फ वर्गों का ही मूल्यांकन करता है, मार्क्सवाद का अर्थ वर्गवाद नहीं है।बल्कि वह तो इसका विलोम है। इसी तरह आर्थिक उत्पादन के रूपों का अध्ययन करना ही मार्क्सवाद नहीं है,बल्कि मार्क्सवाद (फंक्शनलिज्म) इसका भी विलोम है। मार्क्सवाद अंश पर समग्रता में ही विचार करता है।
मार्क्सवाद मजदूरवर्ग के बारे में पूंजीवाद के समग्र परिप्रेक्ष्य में विचार करता है,मजदूरवर्ग उस संरचना का हिस्सा है जिसमें वह काम करता है और जीता है, इसी तरह इस सैद्धान्तिकी में सार्वभौमत्व हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता,मार्क्सवाद यदि सार्वभौम होता तो प्रत्येक देश में कई रूपों में मार्क्सवाद नहीं होता। जिस तरह मार्क्सवाद के विरोधी एक-जैसे नहीं हैं,उसी तरह मार्क्सवाद भी एक जैसा नहीं है,उसमें सार्वभौम जैसा कोई तत्व नहीं है,जो चीज सार्वभौम है वह है दुनिया को बदलने का नजरिया। सभी रंगत के मार्क्सवादी यही चाहते हैं कि पूंजीवादी दुनिया से मुक्ति मिलनी चाहिए।
मार्क्सवाद विरोधियों के बारे में हमें यह तथ्य सब समय ध्यान रखना चाहिए कि इनमें अधिकांश ऐसे हैं जो मार्क्सवाद की परंपरा से एकदम अनभिज्ञ हैं।वे माक्र्सवाद का सरलीकरण करते हैं ,योजनाबद्ध बनाते हैं और फिर उसका विरोध करते हैं। माक्र्सवाद की केन्द्रीय विशेषता है कि वह वर्ग सचेतनता पर जोर देता है। जब वे वर्गसचेतनता पर जोर दे रहे होते हैं तो स्वाभाविक रूप से वर्ग से जोड़ रहे होते हैं। मार्क्सवाद का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम यह है कि इसका बार-बार नए सिरे से मूल्यांकन करने की जरूरत होती है,मार्क्सवाद स्थिर या जड़ विचारधारा नहीं है। इसका बदली हुई परिस्थितियों में पुनर्मूल्यांकन किया जाना जरूरी है,इसके कारण ही मार्क्सवाद अपने को समृद्ध करता है,ज्यादा यथार्थपरक बनाता है,जनतंत्र के ज्यादा करीब आता है। स्थिर मार्क्सवाद स्वभावत: जनतंत्र को स्वीकार नहीं करता,उसके लिए किताबें वेदवाक्य हैं,नेता या पार्टी के बयान अंतिम सत्य हैं, मार्क्सवाद के प्रति इस तरह का सोच न तो वैज्ञानिक है और न जनतांत्रिक है।
आलोचना में जनतंत्र के विकास के लिए जरूरी है असहमति, सामंजस्य और सह-अस्तित्व। इन तीनों के बिना आलोचना में जनतंत्र का वातावरण नहीं बनता। जिस समाज में असहमति का सम्मान और संरक्षण नहीं होता ,वह समाज बिखर जाता है। कई समाजवादी देशों में मार्क्सवाद के जो प्रयोग बिखर गए उनका प्रधान कारण है इन तीनों चीजों का अभाव । जिस तरह बुर्जुआ समाज में जनतंत्र जरूरी है,असहमति जरूरी है और सह-अस्तित्व जरूरी है। उसी तरह यह भी ध्यान रहे मार्क्सवाद मुकम्मल ज्ञान नहीं है, ऐसा ज्ञान नहीं है जिसके बारे में दुबारा सोचा न जाए। इसके विपरीत मार्क्सवाद विकासशील ज्ञान-विज्ञान है,विभिन्न देशों में अलग-अलग रूपों में इसकी व्याख्या हो रही है और अलग-अलग ढ़ंग से इसे लागू किया जा रहा है।
इधर तीस सालों से समाजवाद के खिलाफ वैचारिक अंधड़ चल रहा है,इसके कारण मार्क्सवादी आलोचना के प्रति संशय का भाव और अप्रासंगिकता की बातें तेज हो गई हैं। इस संदर्भ में सबसे प्रमुख तर्क क्या हैं ? मार्क्सवादी मानते रहे हैं समाजवाद इतिहास का एकीकरण है।
यह विचार अनेक लोगों को भयभीत करता रहा है।भयभीत लोगों के लिए सर्वसत्ताकरण (टोटलाइजेशन) और सर्वसत्तावाद (टोटेलिटेरिनिज्म) किसी चीज के लिए प्रयुक्त एक ही जैसे शब्द हैं,वे मार्क्सवाद को सर्वसत्तावादी कहकर कलंकित करते रहे हैं,जबकि सच यह है मार्क्सवाद सबको एकजुट करके रखने वाली और पूंजी संचय के रूपों को विकेन्द्रित करने वाली शक्ति है। आलोचना में मार्क्र्सवाद की बहस को हमें सिर्फ मार्क्सवाद तक सीमित नहीं रखना चाहिए,बल्कि उत्तर-मार्क्सवाद तक ले जाना चाहिए। उत्तर-मार्क्सवाद का अर्थ मार्क्सवाद का अस्वीकार नहीं है,बल्कि उत्तर-मार्क्सवाद तो मार्क्सवाद की समझ का नए परिदृश्य में सर्जनात्मक विकास है।
उत्तर- मार्क्सवाद का दूसरा आयाम यह है कि मार्क्सवाद के एकाधिक रूपों की स्वीकृति। जिस तरह लोकतंत्र बहुलतावादी है उसी तरह मार्क्सवाद भी एक नहीं है बल्कि सारी दुनिया में बहुलतावादी मार्क्सवाद है। इसमें विकास की ज्यादा संभावनाएं हैं। मार्क्सवाद में बहुलतावाद का आना मार्क्सवाद के लोचदार होने का प्रमाण है इसे मार्क्सवाद से विचलन न समझा जाए। मार्क्सवाद एक नहीं अनेक है। जिस तरह यथार्थ एक नहीं अनेक है।
लोकतंत्र के विकास ने एकायामिता के सभी रूपों को चौतरफा बदलने के लिए मजबूर किया। बहुलतावाद हमारी मार्क्सवाद संबंधी संकुचित धारणाओं से मुक्ति दिलाने में मदद करता है।जब आप मार्क्सवाद की निर्धारित परंपरा के प्रति सवाल खड़े करते हैं तो उत्तर-मार्क्सवाद की कोटि में स्वत: ही पहुँच जाते हैं। मसलन् इस परंपरा में 'ग्रीन मूवमेंट' के लोग आते हैं,ये वे लोग हैं जो मार्क्सवाद की 'प्रकृति के स्वामित्व' की को चुनौती देते हैं,इस परंपरा के निर्माताओं में रूडोल्फ बारो,आन्द्रे गुर्ज,क़ोहेन-बेनडिट आदि आते हैं। इन लोगों ने साठ के दशक से आंदोलन चलाया और लाल को हरा बनाया।
यही बात ब्रिटिश सांस्कृतिक स्टैडीज के लोगों के बारे में कही जा सकती है,इन्होंने परंपरागत मार्क्सवाद से आगे जाकर राज्य की अधिरचनाओं और उप-संस्कृतियों का अध्ययन किया,यही बात स्त्रीवादी और उत्तर-संरचनावादी सैद्धान्तिकी के बारे में कही जा सकती है। इन दोनों सैद्धान्तिकियों के जरिए मार्क्सवाद के अंदर निहित पूर्वाग्रहों खासकर पितृसत्ता और यूरो-केन्द्रिकता का विरोध किया गया। उत्तर -संरचनावाद के तहत अनेक किस्म का मार्क्सवादी लेखन सामने आया है, जिसके कारण आलोचना का जनतंत्र समृध्द हुआ है।
आलोचना में लोकतंत्र 'जानने' की प्रक्रिया में समृद्ध होता है,'जानने' के क्रम में ही मार्क्सवाद के बारे में भी सवाल उठाए गए और मार्क्सवाद को चुनौती दी गयी।यहां तक कि 'सैद्धान्तिकी' के प्रति भी सवाल उठे हैं। यह काम संरचनावाद और उत्तर-संरचनावाद ने किया। 'जानने' की धारणा के आधार पर ही उत्तर-संरचनावादियों ने 'इम्पीरिसिज्म' को चुनौती दी, इसके जरिए विज्ञान ,वस्तुगतता तटस्थता और साम्राज्यवादी शक्ति के अन्तस्संबंध की खोज की गई।
मार्क्सवादी विचारकों का मानना था दुनिया बदल सकती है किंतु मार्क्सवाद नहीं बदलेगा। यह मार्क्सवाद के प्रति गैर मार्क्सवादी नजरिया है। स्वयं मार्क्स का मानना था दुनिया में सब कुछ परिवर्तनीय है यदि कोई चीज अपरिवर्तनीय है तो वह है परिवर्तन का नियम। मार्क्सवाद में से परिवर्तन के नियम को निकालकर हमने मार्क्सवाद को अचल बना दिया,अपरिवर्तनीय बना दिया। मार्क्सवाद पर पिछले पचास सालों में जो हमले हुए हैं उनमें यह भी कहा गया मार्क्सवाद रिडक्शनिज्म है,फंक्शनलिज्म है,एशेंसियलिज्म है, यूनीवर्सलिज्म है। ये सारे वर्गीकरण सही नहीं हैं। मार्क्सवाद विज्ञान है और जीवन को बदलने का विज्ञान है।
यह कहना भी सही नहीं है कि मार्क्सवादी नजरिया सिर्फ मजदूर वर्ग या सिर्फ वर्गों का ही मूल्यांकन करता है, मार्क्सवाद का अर्थ वर्गवाद नहीं है।बल्कि वह तो इसका विलोम है। इसी तरह आर्थिक उत्पादन के रूपों का अध्ययन करना ही मार्क्सवाद नहीं है,बल्कि मार्क्सवाद (फंक्शनलिज्म) इसका भी विलोम है। मार्क्सवाद अंश पर समग्रता में ही विचार करता है।
मार्क्सवाद मजदूरवर्ग के बारे में पूंजीवाद के समग्र परिप्रेक्ष्य में विचार करता है,मजदूरवर्ग उस संरचना का हिस्सा है जिसमें वह काम करता है और जीता है, इसी तरह इस सैद्धान्तिकी में सार्वभौमत्व हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता,मार्क्सवाद यदि सार्वभौम होता तो प्रत्येक देश में कई रूपों में मार्क्सवाद नहीं होता। जिस तरह मार्क्सवाद के विरोधी एक-जैसे नहीं हैं,उसी तरह मार्क्सवाद भी एक जैसा नहीं है,उसमें सार्वभौम जैसा कोई तत्व नहीं है,जो चीज सार्वभौम है वह है दुनिया को बदलने का नजरिया। सभी रंगत के मार्क्सवादी यही चाहते हैं कि पूंजीवादी दुनिया से मुक्ति मिलनी चाहिए।
मार्क्सवाद विरोधियों के बारे में हमें यह तथ्य सब समय ध्यान रखना चाहिए कि इनमें अधिकांश ऐसे हैं जो मार्क्सवाद की परंपरा से एकदम अनभिज्ञ हैं।वे माक्र्सवाद का सरलीकरण करते हैं ,योजनाबद्ध बनाते हैं और फिर उसका विरोध करते हैं। माक्र्सवाद की केन्द्रीय विशेषता है कि वह वर्ग सचेतनता पर जोर देता है। जब वे वर्गसचेतनता पर जोर दे रहे होते हैं तो स्वाभाविक रूप से वर्ग से जोड़ रहे होते हैं। मार्क्सवाद का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम यह है कि इसका बार-बार नए सिरे से मूल्यांकन करने की जरूरत होती है,मार्क्सवाद स्थिर या जड़ विचारधारा नहीं है। इसका बदली हुई परिस्थितियों में पुनर्मूल्यांकन किया जाना जरूरी है,इसके कारण ही मार्क्सवाद अपने को समृद्ध करता है,ज्यादा यथार्थपरक बनाता है,जनतंत्र के ज्यादा करीब आता है। स्थिर मार्क्सवाद स्वभावत: जनतंत्र को स्वीकार नहीं करता,उसके लिए किताबें वेदवाक्य हैं,नेता या पार्टी के बयान अंतिम सत्य हैं, मार्क्सवाद के प्रति इस तरह का सोच न तो वैज्ञानिक है और न जनतांत्रिक है।
आलोचना में जनतंत्र के विकास के लिए जरूरी है असहमति, सामंजस्य और सह-अस्तित्व। इन तीनों के बिना आलोचना में जनतंत्र का वातावरण नहीं बनता। जिस समाज में असहमति का सम्मान और संरक्षण नहीं होता ,वह समाज बिखर जाता है। कई समाजवादी देशों में मार्क्सवाद के जो प्रयोग बिखर गए उनका प्रधान कारण है इन तीनों चीजों का अभाव । जिस तरह बुर्जुआ समाज में जनतंत्र जरूरी है,असहमति जरूरी है और सह-अस्तित्व जरूरी है। उसी तरह यह भी ध्यान रहे मार्क्सवाद मुकम्मल ज्ञान नहीं है, ऐसा ज्ञान नहीं है जिसके बारे में दुबारा सोचा न जाए। इसके विपरीत मार्क्सवाद विकासशील ज्ञान-विज्ञान है,विभिन्न देशों में अलग-अलग रूपों में इसकी व्याख्या हो रही है और अलग-अलग ढ़ंग से इसे लागू किया जा रहा है।
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
रामचरित मानस की व्याख्या-कुव्याख्या के परिणाम
रामचरित मानस लोक-महाकाव्य है। इसके उपयोग और दुरूपयोग की अनंत संभावनाए हैं।लोक-महाकाव्य एकायामी नहींहै बल्कि बहुआयामी होता है,इसमें एक नहीं एकाधिक विचारधाराएं होती हैं। इसका पाठ संपूर्ण और बंद होता है किंतु अर्थ- संरचनाएं खुली होती हैं, इसके पाठ की स्वायत्तता पाठ की व्याख्या की समस्त धारणाओं के लिए आज भी चुनौती बनी हुई है। लोक-महाकाव्य का अर्थ कृति में नहीं सामाजिक के मन में होता है।पाठक के इच्छित-भाव की तुष्टि का यह सबसे बड़ा स्रोत है,इतिहास की रचना में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है।साथ ही इच्छित इतिहास के निर्माण के लिए इसका व्यापक स्तर पर उपयोग और दुरूपयोग होता रहा है।
हिन्दी में आलोचना खूब लिखी जाती है,किंतु ज्यादातर आलोचना 'कला के लिए कला' की तरह 'आलोचना के लिए आलोचना ' की तर्ज पर लिखी जाती है,हिन्दी में आलोचना की पध्दति और सैध्दान्तिकी का शास्त्र हम आज तक नहीं बना पाए हैं। हमारे पास अभी तक एक भी आलोचना की मुकम्मल किताब नहीं है,आलोचना के बारे में सम्मानजनक ढ़ंग से कहने के लिए कुछ निबंध हैं,कुछ समीक्षाएं हैं,कुछ बहस के लिए लिखी गयी वकीलों जैसी दलीलें हैं,जिनमें हमारे आलोचकगण अपने मुवक्किल की पैरवी करते नजर आते हैं। मसलन् हमारे यहां तुलसीदास के बारे में टनों पन्नो लिखे गए हैं, इसके बावजूद लेवीस्त्रास जैसी एक आलोचना की किताब नहीं है।जिसमें तुलसी के मिथकों का खुलासा किया गया हो और सैध्दान्तिकी भी बनायी गयी हो।
हमारे यहां आलोचना अभी 'केजुअल' कर्म है,मनमाना कार्य है। हिन्दी के आलोचक जब किसी विषय पर लिखते हैं तो 'केजुअल वर्कर' की तरह पेश आते हैं, उन्हें सिलटाने में दिलचस्पी ज्यादा है।वे अभी तक आलोचना को नियमित सैध्दान्तिकी के दर्जे तक नहीं पहुँचा सके हैं। उसका शास्त्र नहीं बना पाए हैं।यही वजह है कि हिन्दी में आलोचना लिखने के लिए अंग्रेजी में लिखी आलोचना के पास जाना होता है, हिन्दी का आलोचना साहित्य हमें किसी भी किस्म की आलोचनात्मक मदद या सलाह नहीं देता।हमें इस समस्या पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्यों हुआ कि हमारी आलोचना अभी तक गंभीर नहीं हो पायी।अंग्रेजी,जर्मन,फ्रेंच,रूसी आदि भाषाओं में आलोचना के महत्वपूर्ण स्कूल मिल जाएंगे,सैध्दान्तिक मॉडल मिल जाएंगे,शोध में सहारे के लिए अच्छे सैध्दान्तिक उध्दरण मिल जाएंगे,किंतु हिन्दी में इन सबका अकाल पड़ा हुआ है। आखिरकार आलोचना के क्षेत्र में हमसे कहां चूक हुई है ?इतनी बड़ी चूक को व्यक्तिगत मामला कहकर टाला नहीं जा सकता।इस दुर्दशा के लिए निश्चित रूप से आलोचकगण जिम्मेदार हैं,किंतु मामले का आलोचक एक छोटा सा हिस्सा है। आलोचना के लिए जिस तरह के संस्थान,अनुसंधान संरचना,माहौल,विवेक, और पध्दति की जरूरत होती है, अकादमिक अनुशासन ,इन्फ्रास्ट्रक्चर ,और शोधार्थी तैयार करने की जरूरत होती है,शोध को गंभीर बनाने और उसका सम्मान करने की जरूरत होती है,उसकी ओर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। जबकि हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होता है,सबसे ज्यादा पीएचडी लिखी जाती हैं,साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी में सबसे ज्यादा शिक्षक हैं,किंतु एक भी ऐसा अनुसंधान केन्द्र नहीं है जहां शोध की पध्दति और उसका शास्त्र सिखाया जाता हो ,और गंभीरता से अनुसंधान कार्य किया जाता हो।
हिन्दी में आलोचना का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की पहली शर्त है कि आलोचना और हिन्दी विभागों को गंभीरता से चेले बनाने,पट्ठे बनाने,पालने,उनकी नियुक्ति कराने के धंधे से मुक्त किया जाए,हिन्दी के विभागों में अकादमिक क्षमता और उसके आधार पर शोध के नए क्षेत्रों को खोला जाए,गंभीरता के साथ शोध की पध्दति और सैध्दान्तिकी के निर्माण की दिशा में प्रयास किए जाएं।
रामकथा के ऊपर विचार करते हुए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रश्न उठाया है कि 'राम का चरित्र ऊँचा है कि नीचा,लक्ष्मण का चरित्र हमें अच्छा लगता है कि बुरा,यह आलोचना काफी नहीं है।मौन होकर श्रध्दा के साथ विचा करना होगा कि समस्त भारतवर्ष में हजारों साल से इन्हें किस प्रकार ग्रहण किया है।' यानी रामकथा को किस प्रकार ग्रहण किया है।टैगोर ने लिखा है ' राम का चरित्र मनुष्य का चरित्र होने के नाते ही महिमा से मंडित है।' ... 'रामायण उसी नर चन्द्रमा की कथा है देवता की कथा नहीं।' रामायण में 'देवता ने अपने को छोटा करके मनुष्य को छोटा नहीं बनाया,मनुष्य ही अपने गुण से देवता हो उठा है।' इसी क्रम में रामकथा के एक नए आयाम को उद्धाटित करते हुए टैगोर ने लिखा 'रामायण की प्रधान विशेषता है कि उसने घर की बात को ही बड़ा करके दिखाया है।इसमें केवल कवि का परिचय ही नहीं ,भारतवर्ष का परिचय मिलता है।इससे समझ में आएगा कि गृह और गृहधर्म को भारतवर्ष कितना महत्व देता है।हमारे देश में गृहस्थ-आश्रम का जो इतना ऊँचा स्थान था,इस काव्य में उसी को प्रमाणित किया गया है।गृहस्थाश्रम हमारे सामने सुख के लिए सुविधा के लिए न था। गृहस्थाश्रम पूरे समाज को समेटकर रखता था और मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाता था।गृहस्थाश्रम भारतवर्षीय आर्य समाज की भित्ति है।'
इसी तरह मुक्तिबोध ने लिखा है, ' तत्कालीन मानव संबंध,विश्व-दृष्टि तथा जीवन-मूल्यों के सर्वोच्च प्रतीक राम की मानवता हमें प्रभावित करती है।'भक्ति- आंदोलन की तरह ही रामचरित मानस की केन्द्रीय अभिव्यक्ति प्रेम और ज्ञान केन्द्रित है। इन दोनों ही तत्वों का सामंतवाद से सीधा अन्तर्विरोध है।ज्ञान और प्रेम का संदेश आधुनिक बोध पैदा करता है।तुलसीदास को रामचरित मानस लिखने की प्रेरणा धर्मग्रंथों या देवोपासना से नहीं मिली थी,बल्कि दरिद्रता,भूख और सामाजिक उत्पीडन देखकर प्रेरणा मिली थी। आत्म सम्मान के साथ जीना और मनुष्य के आगे हाथ नहीं पसारना तुलसी की चिंताधारा का मुख्यबिंदु है।रामविलास शर्मा के अनुसार तुलसी की दृष्टि में सबसे बड़ा धर्म है दीनों की सेवा,सबसे बड़ा पाप है उनका उत्पीड़न।वे दुखानुभूति का साधारणीकरण करते हैं।
जिस समय हिन्दी भाषी क्षेत्र में आर्यसमाज के नेतृत्व में समाज-सुधार की लहर चल रही थी,उस समय स्वामी दयानंद सरस्वती की धूम मची हुई थी,सनातनियों के तर्कों का खण्डन करने के लिए उन्होंने उस समय एक किताब प्रकाशित की जिसका नाम था ''सत्यार्थप्रकाश'', इस किताब के अंत में स्वामीजी ने अस्पृश्य किताबों की एक सूची जारी की थी,इसमें तुलसीदास की कृति ''रामचरित मानस'' का पहला नम्बर था,यानी आर्यसमाज के नेता ''रामचरित मानस'' को समाज -सुधार में सबसे बड़ी बाधा मानते थे, वहीं दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को अपनी इतिहास दृष्टि के लिए सबसे बड़े कवि के रूप में तुलसीदास और कृति के रूप में ''रामचरित मानस'' महत्वपूर्ण लगा।प्रगतिशीलों में रामविलास शर्मा को तुलसी सबसे प्रिय हैं,जबकि रांगेय राघव के लिए सबसे अप्रिय लेखक हैं।मुक्तिबोध को तुलसी का रामचरित मानस सवर्णों के वर्चस्व का औजार लगा और भक्ति-आन्दोलन की निम्नवर्णोंन्मुख धारा को पलटने वाली कृति।उन्होंने तुलसी को सवर्णों के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में व्याख्यायित किया ।
जिस समय हिन्दी भाषी क्षेत्र में आर्यसमाज के नेतृत्व में समाज-सुधार की लहर चल रही थी,उस समय स्वामी दयानंद सरस्वती की धूम मची हुई थी,सनातनियों के तर्कों का खण्डन करने के लिए उन्होंने उस समय एक किताब प्रकाशित की जिसका नाम था ''सत्यार्थप्रकाश'', इस किताब के अंत में स्वामीजी ने अस्पृश्य किताबों की एक सूची जारी की थी,इसमें तुलसीदास की कृति ''रामचरित मानस'' का पहला नम्बर था,यानी आर्यसमाज के नेता ''रामचरित मानस'' को समाज -सुधार में सबसे बड़ी बाधा मानते थे, वहीं दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को अपनी इतिहास दृष्टि के लिए सबसे बड़े कवि के रूप में तुलसीदास और कृति के रूप में ''रामचरित मानस'' महत्वपूर्ण लगा।प्रगतिशीलों में रामविलास शर्मा को तुलसी सबसे प्रिय हैं,जबकि रांगेय राघव के लिए सबसे अप्रिय लेखक हैं।मुक्तिबोध को तुलसी का रामचरित मानस सवर्णों के वर्चस्व का औजार लगा और भक्ति-आन्दोलन की निम्नवर्णोंन्मुख धारा को पलटने वाली कृति।उन्होंने तुलसी को सवर्णों के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में व्याख्यायित किया ।
लेबल:
तुलसीदास,
रामचरितमानस,
हिन्दी आलोचना
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
कारपोरेट मीडिया संस्कृति की देन है लोकतंत्र में कठमुल्लापन
जिस तरह सामंतकाल में रुढ़िवाद था वैसे ही पूंजीवाद में भी रुढ़िवाद होता है। पूंजीवाद में ऱुढ़िवाद का प्रधान रुप है चीजों,वस्तुओं,विचारों संस्थानों आदि को देवत्व प्रदान करना,उन्हें पूजा की चीज बना देना।अपरिवर्तनीय और अपरिहार्य बना देना।
रुढ़िवाद का एक रुप यह भी है कि आप किसी बात की अतिरिक्त पुनरावृत्ति करने लगें। बहुलतावाद के नाम पर पूजा करने लगें। हमने लोकतंत्र के साथ यही किया है। हमने लोकतंत्र को लोचदार या उदार बनाने की बजाय कठमुल्ला बनाया है। कठमुल्ला लोकतंत्र अंततः अनुदारवादी ताकतों की सेवा करता है। लोकतंत्र को अनुदार बनाने में मीडिया के पूजाभाव और पुनरावृत्ति की केन्द्रीय भूमिका है। लोकतंत्र के कठमुल्लेपन का कारपोरेट मीडिया संस्कृति के विकास के साथ गहरा संबंध है।कारपोरेट मीडिया का जितना विकास होगा उसी गति से लोकतंत्र में कठमुल्लापन भी बढ़ेगा।सानिया मिर्जा की शादी का सवाल हो या सर्वखाप पंचायतों या ऐसा ही पंचायती न्याय हो ,इस तरह के प्रसंग आना और मीडिया का उन्हें महिमामंडित करना,एक अंतहीन कठमुल्लावाद को जन्म देता है। कारपोरेट मीडिया खबरों की आजादी के नाम पर सामान्य को असामान्य, साधारण को असाधारण,मूल्यवान को मूल्यहीन,बेवकूफ को महान,घटिया को बढ़िया, तर्क को अतर्क में बदल रहा है। यह समूची प्रक्रिया लोकतंत्र को कठमुल्लातंत्र में तब्दील कर रही है।
लोकतंत्र को पढ़ने के कई तरीके प्रचलन में हैं, एक तरीका परंपरावादी है जो यह मानकर चलता है कि जनतंत्र का अर्थ सभी के लिए जनतंत्र,बोलने की आजादी,मनमाफिक काम करने की आजादी,सबके लिए समान स्थान,अवसर आदि है। जनतंत्र का यह नजरिया सबसे बोगस नजरिया है इसका जनतंत्र विरोधी ताकतें अपने हितों के विस्तार के लिए इस्तेमाल करती रही है। इसी को हम जब आलोचना में रूपान्तरित होते देखते हैं तो हमारे हाथ-पैर फूलने लगते हैं हर किस्म की आलोचना अपने को आलोचना मानने लगी है, पत्र-पत्रिका में छपने वाला प्रत्येक लेख आलोचना की कोटि में रखा जाने लगा है।
आलोचना में लोकतंत्र का एक रूप वह भी है जो पिछले दिनों वैचारिक आग्रह के साथ सामने आया है जिसमें हर चीज और प्रत्येक क्षेत्र में जनतंत्र की मांग को सर्वोपरि स्थान दे दिया गया। इसमें बड़े ही फूहड़ ढ़ंग से जनतंत्र में प्रचलित राजनीतिक कोटियों और अवधारणाओं को आलोचना के मानक के रूप में यांत्रिक रूप से इस्तेमाल किया गया, इस वर्ग के आलोचकों ने जनतंत्र के दैनन्दिन क्रिया-कलापों के साथ साहित्यालोचना का रिश्ता इस कदर नत्थी किया कि इससे आलोचना की समीक्षा से विदाई हो गयी ,आलोचना की भाषा राजनीतिक भाषा में तब्दील हो गयी। हो सकता है इस तरह के प्रयासों में कोई ईमानदार कोशिश भी रही हो,किंतु समग्रता में देखें तो आलोचना की क्षति हुई है।
बगैर भावुक हुए विचार करें कि क्या जनवादी आलोचना के नाम पर जो बहस चली है उससे आलोचना समृद्ध हुई है ? आलोचना में जनतंत्र का अर्थ राजनीतिक जनतंत्र की कोटियों और अवधारणाओं का यांत्रिक प्रयोग नहीं है। यह तो भौंड़ी आलोचना है। यांत्रिक जनवादी समीक्षा है। इस तरह की आलोचना विगत वर्षों में बहुत लिखी गयी है।
आलोचना में लोकतंत्र का अर्थ अनालोचनात्मक ढ़ंग से सब कुछ स्वीकार कर लेना नहीं है। सबको संतुष्ट करना,वोट बैंक की राजनीति करना इसका लक्ष्य नहीं है। बल्कि आलोचना में लोकतंत्र का अर्थ है आलोचना में आत्मालोचनात्मक विवेक पैदा करना,आलोचना की अवधारणाओं का सही ढ़ंग से प्रयोग करना, आलोचना के बृहत्तर सैद्धान्तिक प्रश्नों को उठाना,साहित्य और जीवन में सही और गलत का फर्क करने का बोध पैदा करना। साहित्य और आलोचना को पारदर्शी बनाना, उसके आंतरिक तत्वों को ज्यादा लोचदार और पारदर्श बनाना,पाठक को शिरकत का अवसर देना,असहमति को जगह देना,आलोचना में लोकतंत्र का अर्थ है साहित्य और आलोचना के प्रति अभिरूचि पैदा करना,कृति ,कृतिकार और पाठक के बीच जनतांत्रिक संबंध बनाना।
मजेदार बात यह है कि हमने साहित्य में जनतंत्र का बिगुल बजाया ,किंतु आलोचना में जनतंत्र के प्रति कोई जगह नहीं छोड़ी। इस समस्या को रखने का अर्थ किसी वाद या आलोचकों के समूह की आलोचना करना नहीं है,अपितु उस बृहत्तर प्रश्न की ओर ध्यान खींचना है जिससे हम भाग रहे हैं।
आलोचना में लोकतंत्र का अर्थ काफी व्यापक है इसका मूलाधार है जनतंत्र ,पाठक और संचार तकनीकी । इनकी सही समझ ही हमें इसकी जटिलताओं को खोलने में मदद करेगी। हमने जनतंत्र की आधी-अधूरी समझ तो पैदा की है,किंतु पाठक और तकनीकी,खासकर मीडिया और संचार तकनीक की समझ अभी तक नहीं बना पाए हैं,बल्कि सच तो यह है कि इनसे भागते रहे हैं।
लोकतंत्र को पढ़ने के कई तरीके प्रचलन में हैं, एक तरीका परंपरावादी है जो यह मानकर चलता है कि जनतंत्र का अर्थ सभी के लिए जनतंत्र,बोलने की आजादी,मनमाफिक काम करने की आजादी,सबके लिए समान स्थान,अवसर आदि है। जनतंत्र का यह नजरिया सबसे बोगस नजरिया है इसका जनतंत्र विरोधी ताकतें अपने हितों के विस्तार के लिए इस्तेमाल करती रही है। इसी को हम जब आलोचना में रूपान्तरित होते देखते हैं तो हमारे हाथ-पैर फूलने लगते हैं हर किस्म की आलोचना अपने को आलोचना मानने लगी है, पत्र-पत्रिका में छपने वाला प्रत्येक लेख आलोचना की कोटि में रखा जाने लगा है।
आलोचना में लोकतंत्र का एक रूप वह भी है जो पिछले दिनों वैचारिक आग्रह के साथ सामने आया है जिसमें हर चीज और प्रत्येक क्षेत्र में जनतंत्र की मांग को सर्वोपरि स्थान दे दिया गया। इसमें बड़े ही फूहड़ ढ़ंग से जनतंत्र में प्रचलित राजनीतिक कोटियों और अवधारणाओं को आलोचना के मानक के रूप में यांत्रिक रूप से इस्तेमाल किया गया, इस वर्ग के आलोचकों ने जनतंत्र के दैनन्दिन क्रिया-कलापों के साथ साहित्यालोचना का रिश्ता इस कदर नत्थी किया कि इससे आलोचना की समीक्षा से विदाई हो गयी ,आलोचना की भाषा राजनीतिक भाषा में तब्दील हो गयी। हो सकता है इस तरह के प्रयासों में कोई ईमानदार कोशिश भी रही हो,किंतु समग्रता में देखें तो आलोचना की क्षति हुई है।
बगैर भावुक हुए विचार करें कि क्या जनवादी आलोचना के नाम पर जो बहस चली है उससे आलोचना समृद्ध हुई है ? आलोचना में जनतंत्र का अर्थ राजनीतिक जनतंत्र की कोटियों और अवधारणाओं का यांत्रिक प्रयोग नहीं है। यह तो भौंड़ी आलोचना है। यांत्रिक जनवादी समीक्षा है। इस तरह की आलोचना विगत वर्षों में बहुत लिखी गयी है।
आलोचना में लोकतंत्र का अर्थ अनालोचनात्मक ढ़ंग से सब कुछ स्वीकार कर लेना नहीं है। सबको संतुष्ट करना,वोट बैंक की राजनीति करना इसका लक्ष्य नहीं है। बल्कि आलोचना में लोकतंत्र का अर्थ है आलोचना में आत्मालोचनात्मक विवेक पैदा करना,आलोचना की अवधारणाओं का सही ढ़ंग से प्रयोग करना, आलोचना के बृहत्तर सैद्धान्तिक प्रश्नों को उठाना,साहित्य और जीवन में सही और गलत का फर्क करने का बोध पैदा करना। साहित्य और आलोचना को पारदर्शी बनाना, उसके आंतरिक तत्वों को ज्यादा लोचदार और पारदर्श बनाना,पाठक को शिरकत का अवसर देना,असहमति को जगह देना,आलोचना में लोकतंत्र का अर्थ है साहित्य और आलोचना के प्रति अभिरूचि पैदा करना,कृति ,कृतिकार और पाठक के बीच जनतांत्रिक संबंध बनाना।
मजेदार बात यह है कि हमने साहित्य में जनतंत्र का बिगुल बजाया ,किंतु आलोचना में जनतंत्र के प्रति कोई जगह नहीं छोड़ी। इस समस्या को रखने का अर्थ किसी वाद या आलोचकों के समूह की आलोचना करना नहीं है,अपितु उस बृहत्तर प्रश्न की ओर ध्यान खींचना है जिससे हम भाग रहे हैं।
आलोचना में लोकतंत्र का अर्थ काफी व्यापक है इसका मूलाधार है जनतंत्र ,पाठक और संचार तकनीकी । इनकी सही समझ ही हमें इसकी जटिलताओं को खोलने में मदद करेगी। हमने जनतंत्र की आधी-अधूरी समझ तो पैदा की है,किंतु पाठक और तकनीकी,खासकर मीडिया और संचार तकनीक की समझ अभी तक नहीं बना पाए हैं,बल्कि सच तो यह है कि इनसे भागते रहे हैं।
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